13. कारक मूल्य निर्धारण (Factor Pricing) - किराया, मजदूरी, ब्याज और लाभ
वितरण (DISTRIBUTION)
वितरण का सिद्धांत (theory of distribution) या कारक मूल्य निर्धारण (factor pricing) का सिद्धांत मजदूरी (wages), लगान/किराया (rents), ब्याज (interest) और लाभ (profit) जैसे कारक कीमतों के निर्धारण से संबंधित है।
i) वितरण का सीमांत उत्पादकता सिद्धांत (Marginal Productivity Theory of Distribution)
इस सिद्धांत के अनुसार, उत्पादन के किसी कारक की कीमत उसकी सीमांत उत्पादकता (marginal productivity) पर निर्भर करती है। उत्पादन के किसी कारक को कुल उत्पादन में उसके द्वारा किए गए योगदान (contribution) यानी उसकी सीमांत उत्पादकता के अनुसार ही उसका प्रतिफल (reward) मिलना चाहिए।
कारक की एक अतिरिक्त इकाई के उपयोग के परिणामस्वरूप राजस्व (revenue) में होने वाले परिवर्तन को सीमांत राजस्व उत्पाद (Marginal Revenue Product - MRP) या सीमांत उत्पाद का मूल्य (Value of Marginal Product - VMP) कहा जाता है और कारक की एक अतिरिक्त इकाई का उपयोग करने से कुल लागत में होने वाले परिवर्तन को सीमांत कारक लागत (Marginal Factor Cost - MFC) कहा जाता है।
- VMP = MRP = (कुल राजस्व में परिवर्तन / इनपुट में परिवर्तन) = (Δ TR / Δ X)
- MFC = (कुल लागत में परिवर्तन / इनपुट में परिवर्तन) = (Δ TC / Δ X)
कारक बाजार (factor market) में, किसी फर्म का संतुलन तब होता है जब MRP = MFC होता है। उत्पाद बाजार में, एक फर्म का संतुलन MR = MC पर होगा (MR सीमांत राजस्व है और MC सीमांत लागत है)।
आलोचना: यह सिद्धांत यह तो बताता है कि लाभ को अधिकतम करने के लिए फर्म एक निश्चित कीमत पर किसी कारक (इनपुट) की कितनी इकाइयों का उपयोग करेगी, लेकिन यह नहीं बताता कि मजदूरी (या कारक कीमत) स्वयं कैसे निर्धारित होती है। यह केवल कारक मूल्य निर्धारण के मांग पक्ष (demand side) से संबंधित है और आपूर्ति पक्ष (supply side) की पूरी तरह से उपेक्षा करता है। इसके विपरीत, वितरण का आधुनिक सिद्धांत (modern theory of distribution) कारक की मांग और आपूर्ति की शक्तियों की परस्पर क्रिया (interaction) द्वारा कीमत निर्धारित करता है।
ii) किराया या लगान (Rent)
डेविड रिकार्डो (David Ricardo) ने लगान को इस प्रकार परिभाषित किया है: "पृथ्वी की उपज का वह भाग जो मिट्टी की मूल और अविनाशी शक्तियों (original and indestructible powers) के उपयोग के लिए जमींदार को दिया जाता है"। इस प्रकार, लगान केवल भूमि के उपयोग के लिए किया जाने वाला भुगतान है।
a) लगान का रिकार्डियन सिद्धांत (Ricardian Theory of Rent)
रिकार्डो के अनुसार, लगान केवल भूमि के उपयोग के लिए किया गया भुगतान है। इसे शुद्ध लगान (pure rent) भी कहा जाता है। रिकार्डो का सिद्धांत निम्नलिखित मान्यताओं (assumptions) पर आधारित है:
- भूमि की उर्वरता (fertility) में भिन्नता होती है।
- सबसे उपजाऊ भूमि की आपूर्ति सीमित (limited in supply) है।
मान लीजिए कि भूमि के चार प्रकार हैं (A, B, C, D)। 'A' सबसे उपजाऊ है और 'D' सबसे कम। पहली बैच के लोग स्वाभाविक रूप से 'A' गुणवत्ता वाली भूमि पर खेती करेंगे (उपज 20 क्विंटल)। दूसरी बैच के पास दो विकल्प हैं - या तो मुफ़्त में 'B' गुणवत्ता वाली भूमि (उपज 18 क्विंटल) पर खेती करें या पहली बैच से किराए पर 'A' गुणवत्ता वाली भूमि लें। 'A' भूमि पर देय किराया 2 क्विंटल (20-18) के बराबर होगा, जो दोनों भूमियों की उर्वरता का अंतर है।
तालिका 6.1: भूमि की विभिन्न गुणवत्ता से रिटर्न (धान क्विंटल/एकड़)
| श्रम और पूंजी की खुराक | A | B | C | D |
| 1st | 20 | 18 | 16 | 14 |
| 2nd | 18 | 16 | 14 | 12 |
| 3rd | 16 | 14 | 12 | 10 |
| 4th | 14 | 12 | 10 | 8 |
इस उदाहरण में, 'D' गुणवत्ता वाली भूमि सीमांत या बिना किराए वाली भूमि (marginal or no-rent land) है, क्योंकि यह कोई किराया नहीं कमाती है। इस प्रकार, सीमांत भूमि के मुकाबले किसी भूमि के प्राकृतिक अंतर (उर्वरता या बेहतर स्थिति) के कारण किराया उत्पन्न होता है। रिकार्डो के अनुसार, "अनाज (corn) इसलिए महंगा नहीं है क्योंकि किराया चुकाया जाता है, बल्कि किराया इसलिए चुकाया जाता है क्योंकि अनाज महंगा है।"
चित्र 6.1 (a) रिकार्डियन लगान
(b) A Grade
(c) B Grade
(d) C Grade
(e) D Grade (No Rent)
b) लगान का आधुनिक सिद्धांत (Modern Theory of Rent)
आधुनिक सिद्धांत के अनुसार, किसी कारक का लगान उसकी वास्तविक कमाई (actual earnings) और हस्तांतरण कमाई (transfer earnings) के बीच का अंतर है (लगान = वर्तमान आय - अवसर लागत/हस्तांतरण आय)। हस्तांतरण आय (transfer earning) या अवसर लागत (opportunity cost) से तात्पर्य उस राशि से है जो उत्पादन का कोई कारक अपने अगले सबसे अच्छे उपयोग (next best-paid use) में कमा सकता है।
आपूर्ति की लोच के दृष्टिकोण से, तीन संभावनाएं हैं:
- पूर्णतया बेलोचदार आपूर्ति (Perfectly inelastic supply): भूमि की आपूर्ति निश्चित है। अतः भूमि से प्राप्त पूरी आय अधिशेष (surplus) है, और इसे लगान कहा जाता है। (चित्र 6.2)
- पूर्णतया लोचदार आपूर्ति (Perfectly elastic supply): यदि किसी कारक की आपूर्ति पूर्णतया लोचदार है, तो वास्तविक कमाई और अवसर लागत समान होगी, और कोई लगान (surplus) नहीं होगा। (चित्र 6.3)
- अपेक्षाकृत लोचदार आपूर्ति (Relatively elastic supply): इस मामले में, भूमि से होने वाली आय का एक हिस्सा लगान है। (चित्र 6.4)
चित्र 6.2
चित्र 6.3
चित्र 6.4
अर्ध-लगान (Quasi Rent):
अर्ध-लगान अल्पकाल (short run) में मशीनरी, भवन आदि जैसी पूंजीगत वस्तुओं (capital equipments) की कमाई है, जिनकी आपूर्ति बेलोचदार होती है। मार्शल के अनुसार, अर्ध-लगान अल्पकाल में एक अस्थायी अधिशेष (temporary surplus) है, जो मांग में वृद्धि के कारण होता है और दीर्घकाल में (आपूर्ति बढ़ने पर) गायब हो जाता है। (Quasi Rent = Total Revenue - Total Variable Costs)।
iii) मजदूरी (Wage)
मजदूरी वह कीमत है जो उत्पादन प्रक्रिया में मजदूर द्वारा दी गई सेवाओं के लिए चुकाई जाती है।
- नकद मजदूरी (Money wage): जब भुगतान नकद में किया जाता है।
- वास्तविक मजदूरी (Real wage): यह मजदूर की आय को वास्तविक लाभ (आवश्यकताओं, सुख-सुविधाओं) के रूप में संदर्भित करता है, यानी मजदूर द्वारा कमाए गए धन की क्रय शक्ति (purchasing power)।
मजदूरी के सिद्धांत (Theories of Wages):
- मजदूरी-कोष सिद्धांत (Wage-Fund Theory): जे.एस. मिल (J.S. Mill) द्वारा प्रतिपादित। मजदूरी = (मजदूरी कोष / श्रमिकों की संख्या)। चूंकि मजदूरी कोष निश्चित है, इसलिए मजदूरी केवल श्रमिकों की संख्या कम होने पर ही बढ़ सकती है। (इसकी आलोचना की गई है)।
- मजदूरी का सीमांत उत्पादकता सिद्धांत (Marginal Productivity Theory of Wages): मजदूरी श्रम की सीमांत उत्पादकता (marginal productivity) के मूल्य के बराबर होगी। यदि सीमांत उत्पाद मजदूरी से अधिक है, तो अधिक मजदूरों को काम पर रखना लाभदायक होगा।
चित्र 6.5: मजदूरी का निर्धारण (सीमांत उत्पादकता)
- मांग-आपूर्ति सिद्धांत (Demand-Supply Theory of Wages): मजदूरी श्रम की मांग और आपूर्ति की शक्तियों द्वारा निर्धारित होती है। संतुलन बिंदु (E) पर, जहाँ श्रम की मांग श्रम की आपूर्ति के बराबर होती है, मजदूरी दर (wage rate) निर्धारित होती है।
चित्र 6.6 (a) उद्योग में
चित्र 6.6 (b) फर्म में
iv) ब्याज (Interest)
उत्पादन में उपयोग की जाने वाली ऋण योग्य धनराशि (loanable funds/capital) के उपयोग के लिए चुकाई गई कीमत ब्याज है।
- शुद्ध ब्याज (Pure Interest): केवल उधार लिए गए धन या पूंजी की सेवाओं के लिए किया गया भुगतान।
- सकल ब्याज (Gross Interest): इसमें शुद्ध ब्याज के अलावा जोखिम (risk), असुविधा (inconvenience), और काम तथा चिंता (work and worry) के लिए भुगतान शामिल होता है।
ब्याज के सिद्धांत (Theories of Interest):
- ब्याज का ऋण योग्य निधि सिद्धांत (Loanable Funds Theory): ब्याज दर ऋण योग्य निधियों की मांग और आपूर्ति द्वारा निर्धारित होती है। आपूर्ति सकारात्मक रूप से ब्याज दर से संबंधित है, जबकि मांग व्युत्क्रमानुपाती (inversely related) है।
चित्र 6.7: ब्याज का निर्धारण (Loanable Funds)
- तरलता वरीयता सिद्धांत या कीनेसियन सिद्धांत (Liquidity Preference Theory - Keynes): लोग पैसे को तरल (कैश) के रूप में रखना पसंद करते हैं (लेन-देन, एहतियाती और सट्टा उद्देश्यों के लिए)। उधार देने का अर्थ है तरलता (liquidity) का त्याग करना। कीन्स के अनुसार, ब्याज तरलता (नकद) को छोड़ने का इनाम है।
चित्र 6.8: ब्याज का निर्धारण (Money Demand/Supply)
- ब्याज का आधुनिक सिद्धांत (Modern Theory / Neo-Keynesian / IS-LM): यह बचत, निवेश, तरलता वरीयता और पैसे की आपूर्ति को आय के साथ एकीकृत करता है। IS वक्र उत्पाद बाजार (product market) में संतुलन दिखाता है, और LM वक्र मुद्रा बाजार (money market) में संतुलन दिखाता है।
चित्र 6.9: ब्याज का निर्धारण (IS-LM वक्र)
v) लाभ (Profit)
लाभ (Profit) उत्पादन गतिविधि में उद्यमी (entrepreneur) द्वारा किए गए कार्यों के लिए उसे मिलने वाला इनाम है। यह एक अवशिष्ट आय (residual income) है, जो लगान, मजदूरी और ब्याज का भुगतान करने के बाद बचती है।
लाभ के सिद्धांत (Profit Theories):
- लाभ का सीमांत उत्पादकता सिद्धांत (Marginal Productivity Theory of Profit): यह मानता है कि उद्यमियों की सीमांत उत्पादकता मापी जा सकती है और लाभ इसी से निर्धारित होता है।
चित्र 6.10: लाभ का निर्धारण
- लाभ का जोखिम वहन सिद्धांत (Risk Bearing Theory of Profit): प्रोफेसर हॉले (Hawley) के अनुसार, लाभ जोखिम (risk) उठाने का इनाम है। उत्पादन में चोरी, क्षति, कीमत में बदलाव, हड़ताल आदि के जोखिम होते हैं।
- लाभ का अनिश्चितता-वहन सिद्धांत (Uncertainty-Bearing Theory of Profit): एफ.एच. नाइट (F.H. Knight) के अनुसार, लाभ बीमा योग्य (insurable) जोखिमों (जैसे आग) के लिए नहीं, बल्कि गैर-बीमा योग्य जोखिमों या अनिश्चितताओं (unforeseeable risks/uncertainties - जैसे प्रतिस्पर्धा, स्वाद में बदलाव) को वहन करने के लिए दिया जाता है।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह स्टडी मटेरियल ICAR के मूल कंटेंट का हिंदी अनुवाद है। हम इसकी पूर्ण सटीकता के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। यह फाइल अभी केवल
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