16. सार्वजनिक वित्त (Public Finance) - सार्वजनिक राजस्व और व्यय; कराधान (Taxation) - कराधान के सिद्धांत
सार्वजनिक वित्त (PUBLIC FINANCE)
सार्वजनिक वित्त सार्वजनिक प्राधिकरणों (public authorities) द्वारा राजस्व (revenue) जुटाने और व्यय (expenditure) करने से संबंधित है। डाल्टन (Dalton) सार्वजनिक वित्त को उस विज्ञान के रूप में परिभाषित करते हैं जो सार्वजनिक प्राधिकरणों की आय (income) और व्यय और एक दूसरे के समायोजन (adjustment) से संबंधित है। सार्वजनिक प्राधिकरणों की मूल भूमिका करों (taxes), ऋणों (loans) आदि के माध्यम से संसाधनों (resources) को जुटाना और आर्थिक विकास (economic growth) में तेजी लाने के लिए और देश में आय और धन (income and wealth) के वांछित पुनर्वितरण (desired redistribution) को लाने के लिए इन संसाधनों का उपयोग करना है।
i) सार्वजनिक राजस्व (Public Revenue)
सार्वजनिक राजस्व सरकार (केंद्र सरकार, राज्य सरकार और स्थानीय निकायों) की आय है। सरकारी राजस्व को (a) कर राजस्व (tax revenue), और (b) गैर-कर राजस्व (non-tax revenue) में वर्गीकृत किया जा सकता है।
(a) कर राजस्व (Tax Revenue): कर (Taxes) सभी नागरिकों के सामान्य हितों (common interests) में खर्चों को पूरा करने के लिए राज्य द्वारा लगाया गया एक अनिवार्य योगदान (compulsory contribution) है। कर राजस्व को वर्गीकृत किया जा सकता है: (1) प्रत्यक्ष कर (direct taxes) और (2) अप्रत्यक्ष कर (indirect taxes)।
- प्रत्यक्ष कर (Direct Taxes): एक कर को प्रत्यक्ष कहा जाता है, यदि करदाता कर का बोझ (burden of the tax) वहन करता है। वह बोझ को किसी अन्य व्यक्ति पर नहीं डाल सकता है। उदाहरण के लिए आय कर (income tax), संपत्ति कर (wealth tax) और उपहार कर (gift tax)।
- लाभ (Advantages): i) यह भुगतान करने की क्षमता (ability to pay) के अनुसार भिन्न होता है और ii) कर संग्रह की लागत (Cost of tax collection) कम है।
- नुकसान (Disadvantages): i) कर की दरें सरकार द्वारा मनमाने ढंग (arbitrarily) से तय की जाती हैं और ii) कर चोरी (tax evasion) की संभावना होती है।
- अप्रत्यक्ष कर (Indirect Taxes): अप्रत्यक्ष कर का भुगतान करने वाले द्वारा इसे दूसरों पर स्थानांतरित (shifted) कर दिया जाता है। यदि चीनी पर बिक्री कर (sales tax) लगाया जाता है, तो निर्माता या व्यापारी जो इसका भुगतान करता है, वह इसे अगले खरीदार (buyer) को दे देता है और अंततः बोझ उपभोक्ता (consumer) द्वारा वहन किया जाता है। उदाहरण के लिए बिक्री कर।
- लाभ (Advantages): i) यह अधिक सुविधाजनक (convenient) है, यानी केवल वस्तु (commodity) का उपभोग करने वालों को ही कर का भुगतान करने की आवश्यकता होती है। ii) कोई कर चोरी (tax evasion) संभव नहीं है।
- नुकसान (Disadvantages): i) प्रत्येक उपभोक्ता, अमीर या गरीब, समान दर (same rate) पर कर का भुगतान करता है। ii) कर संग्रह की लागत बहुत अधिक है।
- सीमा शुल्क (Customs duties): यह देश में आने वाले या बाहर जाने वाले माल पर क्रमशः आयात या निर्यात शुल्क (import or export duties) लगाने को संदर्भित करता है। आयातकर्ता या निर्यातक (importers or exporters) जो ऐसे शुल्क का भुगतान करते हैं वे उपभोक्ताओं पर कर का बोझ डाल देंगे। एक शुल्क को विशिष्ट (Specific) कहा जाता है जब इसे वजन या माप (weight or measurement) के मानक के अनुसार लगाया जाता है, उदाहरण के लिए कपड़े के प्रति मीटर 50 पैसे या 40 किलो गेहूं के लिए एक रुपया आदि। शुल्क को मूल्यानुसार (ad valorem) कहा जाता है, जब इसे वस्तु के मूल्य (value) के अनुसार लगाया जाता है। उदाहरण के लिए मोटर कारों या टेलीविजन सेटों के मूल्य पर 100 प्रतिशत।
(b) गैर-कर राजस्व (Non-Tax Revenue)
इसमें शिक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य (public health) के लिए शुल्क, जुर्माना (fines), सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (public sector undertakings) से लाभ, सार्वजनिक भूमि (public lands), जंगल (forest), खदानों (mines) आदि से आय जैसी प्राप्तियां (receipts) शामिल हैं। केंद्र सरकार को राज्य सरकारों से ऋण पर ब्याज भी मिलता है।
- शुल्क (Fee): यह उन लोगों द्वारा दिया गया एक अनिवार्य योगदान है जो बदले में एक निश्चित सेवा (definite service) प्राप्त करते हैं, उदाहरण के लिए ट्यूशन शुल्क, अदालत शुल्क (court fee), आदि। संक्षेप में, मुख्य रूप से जनहित (public interest) में दी जाने वाली विशिष्ट सेवा के लिए शुल्क लिया जाता है।
- लाइसेंस शुल्क (License fee): सेवा की लागत से बहुत अधिक है और बदले में बहुत सकारात्मक सेवा (positive service) नहीं है।
- जुर्माना (Fine): न्यायालय किसी भी चूक या अनियमितता (default or irregularity) या कानून के उल्लंघन (violation of law) के लिए जुर्माना लगा सकता है।
- मूल्य (Price): एक व्यक्ति द्वारा राज्य द्वारा उसे प्रदान की जाने वाली विशिष्ट सेवा के लिए एक मूल्य का भुगतान किया जाता है। कई सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम अपनी वस्तुओं और सेवाओं की बिक्री से राजस्व प्राप्त करते हैं, उदाहरण के लिए पेट्रोल की बिक्री, रेलवे में यात्रा शुल्क (traveling charges), आदि। मूल्य की मुख्य विशेषता यह है कि यह उन लोगों द्वारा किया गया भुगतान है जो उस विशेष सेवा का उपयोग करना चाहते हैं। एक शुल्क जनहित में एकत्र किया जाता है जहां मूल्य व्यावसायिक प्रकृति (business character) की सेवा के लिए भुगतान होता है। आम लाभ (common benefit) के लिए कर का भुगतान किया जाता है जबकि विशिष्ट लाभों (specific benefits) के लिए शुल्क और मूल्य का भुगतान किया जाता है।
- अनुदान (Grant): वे उच्च-स्तरीय संस्थान द्वारा निम्न-स्तरीय संस्थान को दिए जाते हैं। उदाहरण के लिए केंद्र सरकार राज्य सरकार को अनुदान प्रदान करती है।
- उपहार (Gift): वे सरकार या निजी संस्थानों (private institutions) या व्यक्तियों से प्राप्त होते हैं। विदेशी सरकारों से भी उपहार मिलते हैं।
(c) कराधान के सामाजिक और आर्थिक उद्देश्य (Social and Economic Objectives of taxation):
- आय और धन (income and wealth) में असमानताओं (inequalities) को कम करना।
- आर्थिक विकास (economic growth) बढ़ाना।
- कीमतों का स्थिरीकरण (Stabilization of prices)।
(d) कराधान के तरीके (Methods of Taxation): कर आनुपातिक (proportional), प्रगतिशील (progressive), प्रतिगामी (regressive) और अवक्रमित (digressive) हो सकते हैं।
- आनुपातिक कराधान (Proportional Taxation): आय का आकार जो भी हो, समान दर (same rate) या कर का समान प्रतिशत लिया जाता है। कर की दर समान रहती है, लेकिन व्यक्ति की आय बढ़ने पर कर की राशि बढ़ जाती है। यदि आय पर 10 प्रतिशत कर लगाया जाता है, तो एक व्यक्ति जो एक वर्ष में 1,00,000 रुपये कमाता है, वह 10,000 रुपये कर के रूप में देगा, जबकि 50,000 रुपये प्रति वर्ष कमाने वाला व्यक्ति 5,000 रुपये कर के रूप में देगा।
- प्रगतिशील कराधान (Progressive Taxation): इस मामले में, आय में वृद्धि के साथ कर की दर बढ़ जाती है। यदि कोई व्यक्ति प्रति वर्ष 50,000 रुपये कमाता है, तो वह 10 प्रतिशत कर का भुगतान करेगा, अर्थात 5,000 रुपये, जबकि जिस व्यक्ति की आय 1,00,000 रुपये प्रति वर्ष है, वह 15 प्रतिशत कर का भुगतान करेगा। यानी 15,000 रुपये।
- प्रतिगामी कराधान (Regressive Taxation): यह प्रगतिशील कराधान के बिल्कुल विपरीत (opposite) है। इसका तात्पर्य कम आय वाले समूहों के लिए कर की उच्च दर (higher rates) और उच्च आय वाले समूहों के लिए कर की कम दर (lower rates) है।
- अवक्रमित कराधान (Digressive Taxation): आय की एक निश्चित सीमा या स्तर तक एक प्रगतिशील दर (progressive rate) पर कर लगाया जा सकता है, जिसके बाद एक समान दर (uniform rate) ली जाती है।
(e) कराधान के सिद्धांत (Canons of Taxation):
एक अच्छे कराधान में जो विशेषताएं या गुण (qualities) होने चाहिए, उन्हें कराधान के सिद्धांतों (canons of taxation) के रूप में वर्णित किया गया है। एडम स्मिथ (Adam Smith) ने कराधान के निम्नलिखित चार सिद्धांत दिए हैं:
- समानता का सिद्धांत (Canon of equality): कर की राशि करदाता की क्षमता (ability) के अनुपात में होनी चाहिए, अर्थात प्रगतिशील कराधान (progressive taxation) का पालन किया जाना चाहिए।
- निश्चितता का सिद्धांत (Canon of certainty): भुगतान का समय, भुगतान का तरीका और भुगतान की जाने वाली मात्रा करदाता को पहले से ही स्पष्ट कर दी जानी चाहिए और करों का मनमाना निर्धारण (arbitrary fixation) नहीं होना चाहिए।
- सुविधा का सिद्धांत (Canon of convenience): कर भुगतान को करदाता के लिए सुविधाजनक बनाया जाना चाहिए। भुगतान का समय और तरीका सुविधाजनक होना चाहिए। फसलों की कटाई (harvest of crops) के बाद किश्तों में भू-राजस्व (Land revenue) का भुगतान किया जा सकता है।
- अर्थव्यवस्था का सिद्धांत (Canon of Economy): कर संग्रह की लागत (Cost of tax collection) बहुत कम होनी चाहिए। कर संग्रह की लागत एकत्र किए गए कर की वास्तविक राशि का एक छोटा हिस्सा होना चाहिए।
(f) कराधान के अन्य सिद्धांत (Other canons of Taxation):
- उत्पादकता का सिद्धांत (Canon of Productivity): कुछ कर, जो बड़ा राजस्व (larger revenue) लाते हैं, कई करों से बेहतर होते हैं जो बहुत छोटा राजस्व लाते हैं।
- लोच का सिद्धांत (Canon of Elasticity): जैसे-जैसे राज्य की आवश्यकताएं बढ़ती हैं, राजस्व भी बढ़ना चाहिए। जब सरकार को वित्तीय संसाधनों की बहुत तत्काल (urgently) आवश्यकता हो, तो कुछ करों को अधिक राजस्व देने में सक्षम होना चाहिए, उदाहरण के लिए आय कर।
- सरलता और लचीलेपन का सिद्धांत (Canon of Simplicity and Flexibility): कर प्रणाली (Tax system) को समझना बहुत आसान होना चाहिए और इसे नई आर्थिक स्थितियों (new economic conditions) में समायोजित (adjusted) किया जाना चाहिए।
ii) सार्वजनिक व्यय (Public Expenditure)
सार्वजनिक अधिकारियों (public authorities) द्वारा किए गए व्यय को सार्वजनिक व्यय कहा जाता है। सार्वजनिक व्यय को न केवल समाज कल्याण (social welfare) प्रदान करना है बल्कि इसे आर्थिक स्थिरता और आर्थिक विकास (economic growth) भी सुनिश्चित करना है।
(a) सार्वजनिक व्यय के सिद्धांत (Canons of Public Expenditure):
- अधिकतम लाभ का सिद्धांत (Canon of Maximum Benefit): सार्वजनिक व्यय को समग्र रूप से समाज के अधिकतम कल्याण (maximum welfare) को बढ़ावा देना चाहिए।
- अर्थव्यवस्था का सिद्धांत (Canon of Economy): अनावश्यक व्यय (Unnecessary expenditure) और वित्तीय संसाधनों की बर्बादी से बचना चाहिए।
- मंजूरी का सिद्धांत (Canon of Sanction): सार्वजनिक व्यय वास्तव में खर्च होने से पहले एक सक्षम प्राधिकारी (competent authority) द्वारा स्वीकृत (sanctioned) होना चाहिए।
- लोच का सिद्धांत (Canon of Elasticity): सरकार के लिए आवश्यकता या परिस्थितियों (circumstances) के अनुसार व्यय में परिवर्तन (vary) करना संभव होना चाहिए।
- अधिशेष का सिद्धांत (Canon of Surplus): सार्वजनिक व्यय को हमेशा राज्य के राजस्व के भीतर (well within the revenue) रखा जाना चाहिए ताकि वर्ष के अंत में अधिशेष (surplus) बचा रहे। सरकार को घाटे के बजट (deficit budget) से बचना चाहिए जिसमें सार्वजनिक राजस्व सार्वजनिक व्यय से कम हो।
- आर्थिक विकास और स्थिरता को बढ़ावा देना (Promotion of Economic Growth and Stability): सार्वजनिक व्यय को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक विकास (economic development) और आर्थिक स्थिरता को बढ़ावा देना चाहिए।
E. अंतर्राष्ट्रीय व्यापार (INTERNATIONAL TRADE)
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार केवल इसलिए उत्पन्न होता है क्योंकि देश वस्तुओं की अपनी मांग (demand) और उनका उत्पादन करने की अपनी क्षमता (ability) में भिन्न होते हैं। मांग के पक्ष में एक देश किसी विशेष वस्तु का उत्पादन करने में सक्षम हो सकता है, लेकिन उस मात्रा में नहीं जिसकी उसे आवश्यकता है। उदाहरण के लिए भारत में कच्चे तेल (crude oil) का उत्पादन मांग से कम है। इसके विपरीत खाड़ी देशों (gulf countries) में कच्चे तेल का उत्पादन उनकी मांग से अधिक है। आपूर्ति पक्ष (supply side) पर, दुनिया भर में संसाधनों को समान रूप से वितरित (evenly distributed) नहीं किया जाता है। एक देश में भूमि की प्रचुरता (abundance of land) हो सकती है; दूसरे के पास कुशल श्रम शक्ति (skilled labour force) हो सकती है।
इन कारकों (factors) को एक देश से दूसरे देश में आसानी से स्थानांतरित (transferred) नहीं किया जा सकता है। चूंकि इन कारकों को स्थानांतरित करना मुश्किल है, इसलिए विकल्प (alternative), यानी, उन कारकों द्वारा बनाए गए सामानों को स्थानांतरित करना अपनाया जाता है। यदि व्यापार की शर्तें उपयुक्त हैं, तो कोई देश उन वस्तुओं के उत्पादन में विशेषज्ञ (specialize) हो सकता है जिनमें उन्हें सबसे बड़ा तुलनात्मक लाभ (comparative advantage) है, और उन्हें अन्य देशों से आवश्यक वस्तुओं के लिए विनिमय कर सकता है। इस प्रकार, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार उत्पन्न होता है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार देशों को अन्य देशों की विशेषज्ञता का लाभ प्राप्त करने में सक्षम बनाता है और सभी के लिए जीवन स्तर (standard of living) में सुधार करता है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार बाजार (market) का विस्तार करके, कई देशों को बड़े पैमाने पर उत्पादन (large-scale production) के लिए जाने में सक्षम बनाता है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार प्रतिस्पर्धा (competition) को बढ़ाता है और इस प्रकार उत्पादन में दक्षता (efficiency) को बढ़ावा देता है।
i) भुगतान संतुलन (Balance of Payment)
भुगतान संतुलन (BOP) एक निश्चित अवधि के दौरान शेष विश्व के साथ किसी देश के निवासियों के आर्थिक लेनदेन (economic transactions) का एक व्यापक रिकॉर्ड (comprehensive record) है। इसका उद्देश्य किसी देश के निवासियों द्वारा निर्यात किए गए माल, प्रदान की गई सेवाओं और प्राप्त पूंजी (capital received) से सभी प्राप्तियों (receipts), और आयातित वस्तुओं (goods imported), प्राप्त सेवाओं और देश के निवासियों द्वारा हस्तांतरित (transferred) पूंजी के भुगतानों का एक खाता (account) प्रस्तुत करना है।
ii) व्यापार संतुलन (Balance of Trade - BOT)
निर्यात (exported) की गई वस्तुओं के मूल्य और आयात (imported) की गई वस्तुओं के मूल्य के बीच के अंतर को व्यापार संतुलन के रूप में जाना जाता है। इन अभिलेखों (records) को रखने का मुख्य उद्देश्य सरकार को देश की अंतरराष्ट्रीय आर्थिक स्थिति (international economic position) के बारे में सूचित करना और एक ओर मौद्रिक और राजकोषीय नीतियों (monetary and fiscal policies) और दूसरी ओर व्यापार और भुगतान (trade and payment) संबंधी मामलों पर निर्णय (decisions) तक पहुंचने में मदद करना है।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह स्टडी मटेरियल ICAR के मूल कंटेंट का हिंदी अनुवाद है। हम इसकी पूर्ण सटीकता के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। यह फाइल अभी केवल
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