कृषि में वित्त (Finance) उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि कृषि उत्पादन में उपयोग किए जा रहे अन्य इनपुट (inputs)। तकनीकी इनपुट किसान द्वारा तभी खरीदे और उपयोग किए जा सकते हैं जब उसके पास पैसा (funds) हो। लेकिन उसका अपना पैसा हमेशा अपर्याप्त (inadequate) होता है और उसे बाहरी वित्त या ऋण (credit) की आवश्यकता होती है। 1935 तक पेशेवर साहूकार (Professional money lenders) ही कृषि के लिए ऋण का एकमात्र स्रोत (source) थे। वे बहुत अधिक ब्याज दरें (high rates of interest) वसूलते थे और ऋण देते समय और उन्हें वसूलते समय गंभीर प्रथाओं (serious practices) का पालन करते थे। परिणामस्वरूप, किसानों पर कर्ज का भारी बोझ (heavily burdened with debts) पड़ गया और उनमें से कई कर्ज में डूब गए। भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम 1934 (Reserve Bank of India Act 1934), जिला केंद्रीय सहकारी बैंक अधिनियम (District Central Co-op. Banks Act) और भूमि विकास बैंक अधिनियम (Land Development Banks Act) के पारित होने के साथ, कृषि ऋण को बढ़ावा (impetus) मिला और कृषि ऋण में सुधार हुआ। एक शक्तिशाली वैकल्पिक एजेंसी (alternative agency) अस्तित्व में आई। ऋण देने और उनकी वसूली दोनों के संदर्भ में आसान शर्तों पर उचित ब्याज दरों (reasonable rates of interest) के साथ बड़े पैमाने पर ऋण (Large-scale credit) उपलब्ध हो गया। हालांकि सहकारी बैंकों (co-operative banks) ने 1930 के दशक में अपने प्रतिष्ठानों (establishments) के साथ कृषि का वित्तपोषण शुरू किया था, लेकिन वास्तविक प्रोत्साहन (real impetus) स्वतंत्रता (Independence) के बाद ही प्राप्त हुआ जब उपयुक्त कानून पारित किए गए और नीतियां बनाई गईं। उसके बाद, ग्रामीण क्षेत्रों में शाखाएं खोलकर और जमा (deposits) आकर्षित करके कृषि को बैंक ऋण (bank credit) ने अभूतपूर्व प्रगति (phenomenal progress) की।
1969 में 14 प्रमुख वाणिज्यिक बैंकों (commercial banks) का राष्ट्रीयकरण (nationalized) होने तक, सहकारी बैंक कृषि को वित्त प्रदान करने वाली मुख्य संस्थागत एजेंसियां (institutional agencies) थीं। राष्ट्रीयकरण के बाद, इन बैंकों के लिए कृषि को प्राथमिकता वाले क्षेत्र (priority sector) के रूप में वित्त प्रदान करना अनिवार्य (mandatory) कर दिया गया। इन बैंकों ने शाखा विस्तार (branch expansion) के विशेष कार्यक्रम शुरू किए और पूरे देश में बैंकिंग सेवाओं (banking services) का एक नेटवर्क बनाया और बड़े पैमाने पर कृषि का वित्तपोषण (financing) शुरू किया। इस प्रकार कृषि ऋण ने बहु-एजेंसी आयाम (multi-agency dimension) हासिल कर लिया। नई प्रौद्योगिकियों (new technologies) का विकास और अपनाना तथा वित्त की उपलब्धता (availability of finance) साथ-साथ चलते हैं। "हरित क्रांति" (Green Revolution), "श्वेत क्रांति" (White Revolution) और "पीली क्रांति" (Yellow Revolution) लाने में वित्त ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अब कृषि ऋण, बहु-एजेंसी दृष्टिकोण (multi agency approach) के माध्यम से स्थापित हो गया है।
विभिन्न उद्देश्यों (purposes) के लिए ऋण की प्रक्रियाओं (procedures) और राशि का मानकीकरण (standardized) किया गया है। विभिन्न उद्देश्यों में "फसल ऋण" (Crop loans) (अल्पावधि ऋण - Short-term loan) की बड़ी हिस्सेदारी है। इसके अलावा, किसानों को पंप के साथ इलेक्ट्रिक मोटर की खरीद, ट्रैक्टर और अन्य मशीनरी, कुएं खोदने (digging wells) या उबाऊ कुओं (boring wells), पाइप लाइनों की स्थापना, ड्रिप सिंचाई (drip irrigation), फलों के बाग लगाने (planting fruit orchards), डेयरी जानवरों की खरीद (purchase of dairy animals) और उनके लिए चारा (feeds/fodder), मुर्गी पालन (poultry), भेड़/बकरी पालन (sheep/goat keeping) और कई अन्य संबद्ध उद्यमों (allied enterprises) के लिए ऋण मिलता है।
किसानों को दो स्रोतों से बाहरी वित्तीय सहायता (external financial assistance) मिलती है, अर्थात्, i) गैर-संस्थागत (non-institutional) या असंगठित एजेंसियां (unorganized agencies), और ii) संस्थागत (institutional) या संगठित एजेंसियां (organized agencies)। यह एक तथ्य है कि कृषि को लंबे समय से गैर-संस्थागत एजेंसियों द्वारा वित्तपोषित किया गया है और संस्थागत एजेंसियों ने इस सदी की शुरुआत (early part of this century) में ही काम करना शुरू किया था।
गैर-संस्थागत स्रोतों में साहूकार (money lenders), जमींदार (land lords), व्यापारी (traders), कमीशन एजेंट (commission agents), दोस्त और रिश्तेदार (friends and relatives) शामिल हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में दो प्रकार के साहूकार होते हैं: a) कृषि साहूकार (agricultural money lenders) और b) पेशेवर साहूकार (professional money lender)। कृषि साहूकार का मुख्य व्यवसाय खेती (farming) है और पैसा उधार देना द्वितीयक (secondary) है। पेशेवर साहूकार का मुख्य पेशा पैसा उधार देना (money lending) है। हालांकि वर्षों से ग्रामीण गरीबों द्वारा साहूकार पर निर्भरता (reliance) में गिरावट आई है, यानी 1951 में उनकी कुल ऋण आवश्यकता (total credit requirement) के 80 प्रतिशत से 2002 में 30 प्रतिशत तक, साहूकारों द्वारा वितरित ऋण (disbursed credit) अभी भी किसानों द्वारा प्राप्त कुल ऋण का एक बड़ा हिस्सा (major portion) है।
लाभ (Advantages)
साहूकारों के अनुचित व्यवहार (Unfair Practices of Money Lenders)
साहूकार किसानों को कई तरह से धोखा (deceive) देते हैं जैसे:
| ऋण देने वाली एजेंसियां (Lending Agencies) | 1951 | 1961 | 1971 | 1981 | 1991 | 2002 |
|---|---|---|---|---|---|---|
| I. संगठित एजेंसियां (Organized Agencies) | ||||||
| 1. सरकार (Government) | 3.3 | 6.7 | 7.1 | 4.0 | 6.1 | 2.3 |
| 2. सहकारी समितियाँ (Co-operatives) | 3.1 | 11.4 | 22.0 | 29.0 | 21.6 | 27.3 |
| 3. वाणिज्यिक बैंक (Commercial Banks) | 0.9 | 0.3 | 2.4 | 28.0 | 33.7 | 24.5 |
| 4. बीमा, भविष्य निधि और अन्य (Insurance, Provident Fund and Other) | - | - | 0.2 | - | 2.6 | 3.0 |
| उप-योग (Sub-Total) | 7.3 | 18.4 | 31.7 | 61.0 | 64.0 | 57.1 |
| II. असंगठित एजेंसियां (Unorganized Agencies) | ||||||
| 1. जमींदार (Land Lords) | 1.5 | 0.9 | 8.1 | 4.0 | 4.0 | 1.0 |
| 2. कृषि साहूकार (Agricultural Money lenders) | 24.9 | 48.1 | 23.0 | 9.0 | 7.0 | 10.0 |
| 3. पेशेवर साहूकार (Professional Money lenders) | 44.8 | 13.8 | 13.1 | 8.0 | 10.5 | 19.6 |
| 4. व्यापारी और कमीशन एजेंट (Traders and Commission Agents) | 5.5 | 7.1 | 8.4 | 3.0 | 2.2 | 2.6 |
| 5. मित्र और रिश्तेदार (Friends and Relatives) | 14.2 | 5.2 | 13.1 | 9.0 | 5.5 | 7.1 |
| 6. अन्य (Others) | 1.8 | 6.5 | 2.6 | 6.0 | 6.8 | 2.6 |
| उप-योग (Sub-Total) | 92.7 | 81.6 | 68.3 | 39.0 | 36.0 | 42.9 |
| कुल (Total) | 100.0 | 100.0 | 100.0 | 100.0 | 100.0 | 100.0 |
* उधार लेना (Borrowing) बकाया नकद बकाया (outstanding cash dues) को संदर्भित करता है।
छोटे किसान और काश्तकार (tenants) अपने उत्पादक और अनुत्पादक खर्चों (productive and unproductive expenses) को पूरा करने के लिए वित्त के लिए जमींदारों (land lords) पर भरोसा करते हैं। वित्त के इस स्रोत में साहूकारों से जुड़े सभी दोष (defects) हैं। ब्याज दरें अत्यधिक (exorbitant) हैं। अक्सर छोटे किसानों को अपनी जमीन इन जमींदारों को बेचने के लिए मजबूर किया जाता है और वे भूमिहीन मजदूर (landless labourers) बन जाते हैं। भूमिहीन मजदूर बंधुआ मजदूर (bonded labourers) बन जाते हैं। किसानों द्वारा इस एजेंसी पर निर्भरता वर्षों में कम हो गई है, यानी 1951 में 1.5 प्रतिशत से 2002 में 1.0 प्रतिशत।
वे या तो अपने व्यापार के लिए उत्पादों की नियमित आपूर्ति (regular supply) प्राप्त करने के लिए कार्य कर रहे हैं या अन्य लेनदारों (creditors) द्वारा ऋण के प्रावधान पर नियंत्रण (control) रखने के लिए। हालांकि उनके द्वारा ली जाने वाली ब्याज दर साहूकारों द्वारा ली जाने वाली दर जितनी अधिक नहीं होती है, लेकिन वे रियायतों (concessions) और सेवा शुल्क (service charges) के रूप में अधिक शुल्क लेते हैं, वे ज्यादातर गन्ना, कपास, मूंगफली, तंबाकू, प्याज आदि जैसी वाणिज्यिक फसलों (commercial crops) की खेती के लिए वित्त प्रदान करते हैं। कुल ऋण (total credit) में इन एजेंसियों द्वारा प्रदान किए गए ऋण का हिस्सा 1951 में 5.5 प्रतिशत से घटकर 2002 में 2.5 प्रतिशत हो गया।
किसान अस्थायी आवश्यकताओं (temporary exigencies) के लिए अपने रिश्तेदारों (relatives) से उधार लेते हैं। यह एक आपसी मदद (mutual help) है। चूंकि सभी किसान समान परिस्थितियों (similar conditions) में रह रहे हैं, इसलिए वे ऋण के रूप में बड़ी रकम उधार नहीं दे सकते। आमतौर पर ऐसे ऋणों पर कोई ब्याज (interest) नहीं दिया जाता है। यद्यपि, निजी एजेंसियों (private agencies) ने ऋण की एक अच्छी प्रणाली (good system of credit) के कुछ मानदंडों (criteria) को पूरा किया, उनका ऋण उत्पादन उद्देश्यों (production purposes) से संबंधित नहीं था, उन्होंने कभी भी विस्तारित ऋण के अंतिम उपयोग (end use of the loan) की परवाह नहीं की और ऋण का उपयोग अक्सर व्यर्थ उद्देश्यों (wasteful purposes) के लिए किया जाता है। हालांकि, संस्थान ऋण प्रदान करते समय एक उत्पादक और उद्देश्य-उन्मुख ऋण नीति (productive and purpose oriented credit policy) अपनाते हैं। इसलिए इस नीति ने संस्थानों को उपभोग उद्देश्य (consumption purpose) के लिए ऋण के प्रावधान को हतोत्साहित (discourage) किया। लेकिन यह स्पष्ट है कि ग्रामीण परिवारों (rural households) में उपभोग ऋण की आवश्यकता (need for consumption loan) बनी हुई है। चूंकि संस्थाएं किसानों को उपभोग ऋण देने से इनकार करती हैं, इसलिए गैर-संस्थागत एजेंसी (non-institutional agency) ग्रामीण ऋण प्रणाली (rural credit system) पर हावी (dominate) रहती है। इसके अलावा, संस्थागत एजेंसियां किसानों की कुल ऋण आवश्यकताओं (total credit needs) का 60-65 प्रतिशत से अधिक प्रदान नहीं कर सकीं। इसलिए, निजी ऋण एजेंसियों (private credit agencies) को राज्य के नियमन की अधिक यथार्थवादी प्रणाली (realistic system of state regulation) के तहत लाया जाना चाहिए। अन्यथा, सरकार द्वारा उनकी आर्थिक स्थिति (economic conditions) के उत्थान के लिए किए गए विभिन्न प्रयासों के बावजूद ग्रामीण लोग कर्ज (indebtedness) से पीड़ित रहेंगे। 1951 में उनकी हिस्सेदारी 14.2 प्रतिशत से घटकर 2002 में 7.1 प्रतिशत हो गई है।
बहु-एजेंसी प्रणाली (multiagency system) के तहत ऋण आवश्यकताओं की मात्रा (quantum of credit requirement) और इन ऋण मांगों को पूरा करने के लिए संस्थानों की क्षमता (capacity of institutions) की तुलना में, ग्रामीण परिदृश्य (rural scene) से निजी एजेंसियों को पूरी तरह से मिटा देना (wipe out) असंभव है। बैंकिंग समिति (Banking committee, 1931) और बैंकिंग आयोग (Banking Commission, 1972) ने निजी उधार देने वाली एजेंसियों के बुरे पहलुओं (evil aspects) को दूर करने और उन्हें मजबूत ऋण प्रणाली (sound credit system) के तहत लाने के लिए सुझाव (suggestions) दिए। इन सुझावों को तब तक अपनाया जा सकता है जब तक कि संस्थागत एजेंसियां ऋण की पूरी मांग को पूरा करने की क्षमता (capacity to meet the full demand for credit) हासिल नहीं कर लेतीं।
कृषि क्षेत्र को ऋण की आपूर्ति करने वाले प्रमुख संस्थान हैं: i) सरकार (Government), ii) सहकारी समितियां (Co-operatives), iii) वाणिज्यिक बैंक (Commercial Banks), iv) क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (Regional Rural Banks), v) भारतीय रिजर्व बैंक (राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक - National Bank for Agricultural and Rural Development)।
सरकार कृषि क्षेत्र को प्रत्यक्ष (direct) और अप्रत्यक्ष (indirect) दोनों तरह का वित्त (finance) प्रदान करती है।
प्रत्यक्ष वित्त (Direct Finance): सरकार अकाल (famine), बाढ़ (flood), सूखा (drought) आदि जैसे संकट के समय (times of distress) में तकावी ऋण (taccavi loans) प्रदान करती है। भूमि सुधार अधिनियम 1883 (Land Improvement Act of 1883) और कृषक ऋण अधिनियम 1984 (Agriculturists Loans Act of 1984) कृषि विकास (agricultural development) और संकट के समय में राहत उपायों (relief measures) के रूप में किसानों को लंबी और छोटी अवधि (long and short term) की वित्तीय सहायता (financial assistance) प्रदान करने के लिए अधिनियमित (enacted) किए गए थे।
गुण (Merits)
दोष (Demerits)
इन कमियों (demerits) को देखते हुए, इन ऋणों को सहकारी समितियों (co-operatives) के माध्यम से चैनलाइज (channelize) करने की सिफारिश की गई थी।
a) सरकार द्वारा कृषि को अप्रत्यक्ष वित्त (Indirect Finance to Agriculture by Government)
फार्म क्रेडिट (form credit) प्रदान करने में प्रत्यक्ष भूमिका (direct role) निभाने के बजाय, सरकार संस्थागत ऋण (institutional credit) को बढ़ावा देने के लिए परिस्थितियाँ या बुनियादी सुविधाएँ (infra-structural facilities) बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका (vital role) निभा सकती है।