27. कृषि सहकारिता - दर्शन और सिद्धांत (AGRICULTURAL COOPERATION - PHILOSOPHY AND PRINCIPLES)

सहकारिता और सहकारी ऋण (Co-operation and Co-operative Credit)

कैल्वर्ट (Calvert) के अनुसार, "सहकारिता आर्थिक संगठन (economic organization) का एक विशेष रूप है जिसमें लोग अपने सामान्य आर्थिक हितों (common economic interests) को बढ़ावा देने के लिए समानता के आधार पर स्वेच्छा से (voluntarily) एक साथ जुड़ते हैं।"

एक सहकारी समिति (Co-operative Society) उपयोगकर्ताओं (users) के एक संघ द्वारा गठित और निर्देशित एक उद्यम है, जो अपने भीतर लोकतंत्र (democracy) के नियमों को लागू करता है, और सीधे अपने सदस्यों और पूरे समुदाय दोनों की सेवा करने का इरादा रखता है - लैम्बर्ट (Lambert)।

सहकारिता के सिद्धांत (Principles of Co-operation)

एक सहकारी समिति संगठन के अन्य रूपों से अलग एक विशेष प्रकार का व्यावसायिक संगठन (business organization) है। सहकारी समिति के लक्षण / सिद्धांत हैं:

i) खुली सदस्यता / सार्वभौमिकता (Open Membership / Universality)

एक सहकारी समिति की सदस्यता उन सभी के लिए खुली है जिनके समान हित (common interest) हैं, जो इसके लाभों से आश्वस्त हैं और जो ऐसी सदस्यता में शामिल लाभों और जिम्मेदारियों (responsibilities) को साझा करने के लिए तैयार हैं। एक सहकारी समिति बनाने के लिए कम से कम दस सदस्यों (minimum of ten members) की आवश्यकता होती है। सहकारी समितियां अधिनियम किसी भी सहकारी समिति के लिए सदस्यों की अधिकतम संख्या निर्दिष्ट (specify) नहीं करता है। हालांकि, समिति के गठन (formation) के बाद, सदस्य सदस्यों की अधिकतम संख्या निर्दिष्ट कर सकते हैं।

ii) एकता या राजनीतिक और धार्मिक तटस्थता (Unity or Political and Religious Neutrality)

एकता (Unity) सभी सहकारी संगठनों (co-operative organizations) के पीछे मौलिक शक्ति (fundamental force) है। यह सभी मान्यताओं (beliefs), विश्वासों (faiths) और धारणाओं (convictions) से ऊपर है।

iii) स्वैच्छिक संघ (Voluntary Association)

सदस्य स्वेच्छा से यानी अपनी पसंद से सहकारी समिति में शामिल होते हैं। एक सदस्य जब चाहे तब समिति में शामिल हो सकता है, जब तक चाहे तब तक जारी रह सकता है, और अपनी इच्छा से (at will) समिति छोड़ सकता है।

iv) राज्य नियंत्रण (State Control)

सदस्यों के हितों की रक्षा के लिए, सहकारी समितियों को पंजीकरण (registration) के माध्यम से राज्य के नियंत्रण में रखा जाता है। पंजीकृत (registered) होते समय, एक समिति को सदस्यों और उसके द्वारा किए जाने वाले व्यवसाय (business) के बारे में विवरण (details) जमा करना होता है। इसे खातों की किताबें (books of accounts) रखनी होती हैं, जिनका सरकारी लेखा परीक्षकों (government auditors) द्वारा ऑडिट (audited) किया जाना होता है।

v) वित्त के स्रोत (Sources of Finance)

एक सहकारी समिति में, पूंजी सभी सदस्यों द्वारा योगदान (contributed) की जाती है। हालांकि, यह पंजीकरण के बाद सरकार से आसानी से ऋण जुटा सकती है और अनुदान (grants) सुरक्षित कर सकती है।

vi) लोकतांत्रिक प्रबंधन (Democratic Management)

सहकारी समितियों का प्रबंधन (managed) लोकतांत्रिक तर्ज (democratic lines) पर किया जाता है। समिति का प्रबंधन एक समूह द्वारा किया जाता है जिसे "निदेशक मंडल" (Board of Directors) कहते हैं। निदेशक मंडल के सदस्य समिति के निर्वाचित प्रतिनिधि (elected representatives) होते हैं। प्रत्येक सदस्य के पास एक ही वोट (single vote) होता है, चाहे उसके पास कितने भी शेयर (shares) हों। उदाहरण के लिए, एक ग्राम ऋण समिति (village credit society) में एक शेयर वाले छोटे किसान (small farmer) को 20 शेयर वाले जमींदार (landlord) के समान मतदान का अधिकार (voting right) होता है।

vii) सेवा का उद्देश्य / पूंजी पर सीमित ब्याज (Service Motive / Limited Interest on Capital)

समिति का मुख्य उद्देश्य (main aim) असामान्य लाभ (abnormal profit) कमाना नहीं है बल्कि सदस्यों को अपनी आर्थिक स्थिति (economic conditions) सुधारने में सक्षम बनाना है। यदि कोई अतिरिक्त आय (excess income) होती है, तो इसका उपयोग अप्रत्याशित नुकसान (unforeseen loss) को पूरा करने या समिति के धन (funds) को मजबूत करने के लिए किया जाएगा ताकि सदस्यों को सस्ती सेवाएं (cheaper services) उपलब्ध कराई जा सकें।

viii) अलग कानूनी इकाई (Separate Legal Entity)

एक सहकारी समिति सहकारी समितियां अधिनियम (Co-operative Societies Act) के तहत पंजीकृत होती है। पंजीकरण के बाद एक समिति एक अलग कानूनी इकाई बन जाती है, जिसमें इसके सदस्यों की सीमित देयता (limited liability) होती है। किसी सदस्य की मृत्यु, दिवालियापन (insolvency) या पागलपन (lunacy) समिति के अस्तित्व को प्रभावित नहीं करता है।

ix) अधिशेष का वितरण (Distribution of Surplus)

प्रत्येक सहकारी समिति अपने सदस्यों को सेवाएं प्रदान करने के अलावा, व्यापार का संचालन करते समय कुछ लाभ भी उत्पन्न करती है। उत्पन्न लाभ (Profit generated) सदस्यों को उनके द्वारा रखे गए शेयरों के आधार पर (शेयरों पर लाभांश - dividend on their shares) वितरित नहीं किया जाता है, बल्कि समिति के व्यवसाय में सदस्यों की भागीदारी (participation) के आधार पर वितरित किया जाता है (खरीद बोनस - purchase bonus)।

x) आपसी सहयोग के माध्यम से स्व-सहायता (Self-help through Mutual Cooperation)

सहकारी समितियां आपसी मदद (mutual help) के सिद्धांत पर पनपती हैं। वे समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के संगठन हैं। "प्रत्येक सभी के लिए और सभी प्रत्येक के लिए" (Each for all and all for each) के सिद्धांत पर संयुक्त रूप से काम करके ही सदस्य शोषण (exploitation) से लड़ सकते हैं।

xi) प्रचार के सिद्धांत (Principles of Publicity)

सहकारी संगठन अपने कामकाज और प्रगति (working and progress) के बारे में गोपनीयता (secrecy) बनाए रखने में विश्वास नहीं करते हैं।

xii) समर्पण और सेवा की भावना (Spirit of Dedication and Service)

सदस्यों में पूर्ण ईमानदारी (absolute honesty) और निर्विवाद सत्यनिष्ठा (unquestionable integrity) के साथ समर्पण और सेवा की भावना होनी चाहिए।

सहकारी आंदोलन का इतिहास (History of Co-operative Movement)

रॉबर्ट ओवेन (Robert Owen - 1771–1858) को सहकारी आंदोलन (cooperative movement) का जनक माना जाता है। ओवेन ने अपने विचारों को न्यू लानार्क, स्कॉटलैंड (New Lanark, Scotland) की कपास मिलों (cotton mills) में सफलतापूर्वक लागू किया। यहीं पर पहला सहकारी स्टोर (co-operative store) खोला गया था।

1901 के अकाल आयोग (Famine Commission) ने यूरोप के म्यूचुअल क्रेडिट एसोसिएशन (Mutual Credit Association of Europe) की तर्ज पर कृषि बैंकों (Agricultural Banks) की स्थापना की सिफारिश की। सर एडवर्ड लॉ (Sir Edward Law) की अध्यक्षता में एक समिति ने 25 मार्च, 1904 को सहकारी ऋण समितियां अधिनियम (Co-operative Credit Societies Act) पारित किया। इसमें 'रायफ़ेसेन मॉडल' (Raiffeisen Model - असीमित देयता / unlimited liability) और 'शुलज़ डेलिट्ज़ पैटर्न' (Schulze Delitzch Pattern - सीमित देयता / limited liability) का पालन किया गया।

1904 के अधिनियम में पाई गई कमियों (जैसे गैर-ऋण उद्देश्यों के लिए कोई प्रावधान नहीं और असीमित देयता) को दूर करने के लिए, सरकार ने सहकारी समितियां अधिनियम, 1912 (Co-operative Societies Act, 1912) पारित किया। 1914 में, सर एडवर्ड मैक्लेगन (Sir Edward Maclagan) के तहत एक समिति ने आंदोलन की प्रगति की जांच की और त्रि-स्तरीय प्रणाली (three-tier system) के गठन की सिफारिश की:

सहकारी समितियों की प्रगति (Progress of Co-operative Societies)
वर्ष समितियों की संख्या (Number of Societies) सदस्य (Members in 000's) कार्यशील पूंजी (Amount of Working Capital - Rs. Crores)
1906-0784390.8440.25
1911-128177403.3183.36
1914-1517327824.46912.23
1921-22521821974.29031.12
1929-301041874181.90489.52
1939-401370006080.000107.10
1945-461720009160.000164.00

1935 में कृषि ऋण विभाग (Agricultural Credit Department) के साथ भारतीय रिज़र्व बैंक (Reserve Bank of India) की स्थापना की गई थी। प्रो. डी.आर. गाडगिल (Prof. D.R. Gadgil) समिति (1944) और सहकारी योजना समिति (Cooperative Planning Committee - 1945) ने ऋण को विपणन (marketing) के साथ जोड़ने की सिफारिश की।

स्वतंत्रता के बाद की अवधि में सहकारी समितियों का विकास (Development of Co-operatives during Post Independence Period)

अखिल भारतीय ग्रामीण ऋण सर्वेक्षण (All India Rural Credit Survey - AIRCS) समिति (1951) ने एकीकृत ग्रामीण ऋण योजना (Integrated Scheme of Rural Credit) की सिफारिश की। 1956 में राष्ट्रीय सहकारी विकास और भंडारण बोर्ड (National Co-operative Development and Ware Housing Board) की स्थापना की गई। 1969 में अखिल भारतीय ग्रामीण ऋण समीक्षा समिति (All India Rural Credit Review Committee - AIRCRC) की सिफारिश के अनुसार 45 लघु किसान विकास एजेंसियां (Small Farmers’ Development Agencies - SFDAs) स्थापित की गईं।

सहकारी ऋण संस्थान (Co-operative Credit Institutions)

भारत में सहकारी ऋण संरचना (co-operative credit structure) को दो प्रकार के संस्थानों की विशेषता है: एक जो अल्पावधि और मध्यावधि ऋण (short and medium term credit) प्रदान करता है, और दूसरा जो दीर्घावधि ऋण (long term credit) प्रदान करता है।

a) प्राथमिक कृषि ऋण समितियां

इन समितियों का गठन 1904 में हुआ था। इसका उद्देश्य किसानों को सस्ते ऋण (cheap credit) प्रदान करना था ताकि उन्हें साहूकारों (money lenders) के चंगुल से मुक्त किया जा सके। कई PACS कृषि आदानों (agricultural inputs) की बिक्री जैसी कई गतिविधियां भी करते हैं और कई सार्वजनिक वितरण प्रणाली (Public Distribution System - PDS) के तहत राशन वस्तुओं के वितरक (distributors) के रूप में कार्य करते हैं।

प्रबंधन: आम सभा (general body) एक प्रबंध समिति (managing committee) का चुनाव करती है जिसमें 5 से 9 सदस्य होते हैं और एक अध्यक्ष (President), सचिव (Secretary) और एक कोषाध्यक्ष (Treasurer) का चुनाव करती है।
सदस्यता (Membership): गांवों के सभी कृषक (agriculturists), खेतिहर मजदूर (agricultural labourers), कारीगर (artisans) और छोटे व्यापारी (small traders) समिति के सदस्य बन सकते हैं।
शेयर पूंजी (Share Capital): PACS अपने सदस्यों को 10 रुपये और 50 रुपये के छोटे मूल्य के साधारण शेयर (ordinary shares) जारी करते हैं।
देयता (Liability): शुरू में, समितियां असीमित देयता (unlimited liability) के साथ बनाई गई थीं। बाद में इन्हें सीमित देयता समितियों में बदल दिया गया।
धन के स्रोत (Sources of Funds): शेयर पूंजी, प्रवेश शुल्क (entrance fee), जमा (deposits), आरक्षित निधि (reserve fund), और उच्च संस्थानों (DCCB या SCB) से ऋण।
ऋण नीतियां (Loaning Policies): PACS उधारकर्ताओं की व्यक्तिगत सुरक्षा (personal security) पर अल्पकालिक ऋण (short-term credit) की आपूर्ति करते हैं, जबकि मध्यम अवधि का ऋण (medium term credit) उनकी अचल संपत्तियों (immovable assets) या बंधक (mortgages) पर प्रभार बनाकर दिया जाता है।

प्राथमिक कृषि ऋण समितियों के चुनिंदा संकेतक - क्षेत्र-वार (Select Indicators of PACS – Region - wise) (As at end-March 2008) (Amount in Rs. Crores)
क्षेत्र (Regions) कुल PACS (Total No. of PACS) कुल उधारकर्ता (Total No. of Borrowers) कुल उधार (Total borrowings) कुल जमा (Total Deposits) कुल बकाया ऋण (Total Loans Outstanding) मांग पर बकाया का प्रतिशत (% of overdues to Demand)
मध्य क्षेत्र (Central Region)14,058 (14.81%)6805 (8.57%)3894 (8.14%)542 (2.13%)4345 (6.62%)45.02
पूर्वी क्षेत्र (Eastern Region)17,843 (18.79%)15513 (19.54%)4273 (8.93%)3496 (13.74%)5721 (8.71%)35.23
पूर्वोत्तर क्षेत्र (North-Eastern)3,511 (3.70%)316 (0.40%)432 (0.90%)130 (0.51%)528 (0.80%)49.88
उत्तरी क्षेत्र (Northern Region)15,337 (16.15%)5604 (7.05%)12033 (25.15%)3572 (14.04%)13761 (20.96%)36.08
दक्षिणी क्षेत्र (Southern Region)14,850 (15.64%)18388 (23.16%)14331 (29.95%)17302 (67.98%)27793 (42.32%)26.07
पश्चिमी क्षेत्र (Western Region)29,351 (30.91%)32782 (41.28%)12884 (26.93%)407 (1.60%)13519 (20.59%)44.87
ALL INDIA TOTAL94,950 (100.0%)79408 (100.0%)47848 (100.0%)25449 (100.0%)65666 (100.0%)35.67

b) जिला केंद्रीय सहकारी बैंक (District Central Co-operative Banks - DCCBs)

DCCB प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PACS) और राज्य सहकारी बैंकों (SCB) के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी (important link) बनाते हैं। इनके मुख्य कार्य PACS की ऋण आवश्यकताओं को पूरा करना, बैंकिंग व्यवसाय करना और PACS का मार्गदर्शन और पर्यवेक्षण (guide and supervise) करना है। संचालन का क्षेत्र (area of operation) आम तौर पर एक जिला (district) होता है। ये बैंक शेयर पूंजी, जनता से जमा, SCB, सरकार, RBI, SBI और वाणिज्यिक बैंकों से ऋण द्वारा धन जुटाते हैं। ये बैंक कृषि गतिविधियों के वित्तपोषण के लिए PACS को अल्पावधि और मध्यावधि ऋण (short and medium term loans) प्रदान करते हैं।

c) राज्य सहकारी बैंक (State Co-operative Bank - SCB)

यह राज्य स्तर पर शीर्ष संस्थान (apex institution) है जो व्यापक रूप से बिखरे हुए PACS को मुद्रा बाजार (money market), भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) और सहकारी आंदोलन के साथ जोड़ता है। इसके कार्य DCCB के लिए बैंकर्स बैंक (bankers' bank) के रूप में कार्य करना, PACS को आवश्यक वित्तीय संसाधनों (financial resources) को जुटाना और सहकारी आंदोलन के लिए एकसमान ऋण नीतियां (uniform credit policies) तैयार करना और निष्पादित करना है। SCB कृषि कार्यों, कृषि उपज के विपणन और कृषि विकास के लिए अल्पावधि और मध्यावधि ऋण प्रदान करते हैं।

भूमि विकास बैंक (Land Development Banks - LDBs)

कृषि प्रौद्योगिकी (agricultural technology) में नए नवाचारों (innovations), व्यावसायिक कृषि में लाभप्रदता (profitability) आदि ने किसानों को महसूस कराया कि अधिक पूंजी निवेश (capital investment) के माध्यम से अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए भूमि पर सुधार करके कृषि को एक उद्योग के रूप में भी लिया जा सकता है। इसने दीर्घकालिक ऋण की मांग को बढ़ा दिया।

संगठनात्मक संरचना (Organizational Structure):

दीर्घावधि सहकारी ऋण संरचना पूरे देश में एक समान नहीं है। LDBs का संरचनात्मक पैटर्न (structural pattern) मुख्य रूप से संघीय प्रकार (Federal type) का है जिसमें शीर्ष पर केंद्रीय भूमि विकास बैंक (Central Land Development Bank - CLDB / SLDB) और आधार पर प्राथमिक भूमि विकास बैंक (Primary Land Development Bank - PLDB / PCARDB) होते हैं (जैसे आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, आदि में)। कुछ राज्यों में CLDB सीधे शाखाओं (branches) के माध्यम से किसानों को ऋण देते हैं।

LDB के ऋण कार्यक्रम (Lending programme of LDBs):

CLDB कृषि उत्पादन बढ़ाने और स्थायी भूमि सुधार करने के लिए PLDB और CLDB की शाखाओं के माध्यम से कृषकों को दीर्घकालिक ऋण (long-term loans) प्रदान करते हैं। छोटे किसानों (small farmers) और समाज के कमजोर वर्गों को भी प्राथमिकता दी जाती है।

बड़े आकार की आदिवासी बहुउद्देशीय सहकारी समितियां (Large-Sized Adivasi Multi-Purpose Co-operative Societies - LAMPS)

LAMPS मुख्य रूप से पहाड़ी और आदिवासी क्षेत्रों (hill and tribal areas) में काम करते हैं। इसका उद्देश्य एक ही छत के नीचे (under single roof) सभी प्रकार के ऋण और उपभोक्ता आवश्यकताएं प्रदान करना है, कृषि के आधुनिकीकरण (modernization) में तकनीकी मार्गदर्शन (technical guidance) प्रदान करना, और कृषि और लघु वनोपज (minor forest products) के विपणन की व्यवस्था करना है। इसमें 70 प्रतिशत सदस्य आदिवासी होने चाहिए।

किसान सेवा सोसायटी (Farmers' Service Society - FSS)

FSS का मुख्य उद्देश्य विशेष रूप से छोटे किसानों को उत्पादन बढ़ाने के लिए एक एकीकृत तरीके (integrated manner) से और एक संपर्क बिंदु (one contact point) पर सभी प्रकार के ऋण और सेवाओं और तकनीकी मार्गदर्शन का पूरा पैकेज (full package) प्रदान करना है। FSS का कार्यक्षेत्र PACS (5-8 गांव) की तुलना में बड़ा (10-20 गांव) होता है, और यह कृषि-प्रसंस्करण (agro-processing) सहित ऋण और गैर-ऋण (non-credit) दोनों कार्य करता है।

राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (National Cooperative Development Corporation - NCDC)

राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) की स्थापना 1963 में संसद के एक अधिनियम द्वारा कृषि मंत्रालय (Ministry of Agriculture) के तहत एक वैधानिक निगम (statutory Corporation) के रूप में की गई थी। इसके कार्य सहकारी समितियों के माध्यम से कृषि उपज, खाद्य पदार्थों, उर्वरकों, कीटनाशकों, कृषि मशीनरी आदि के उत्पादन, प्रसंस्करण, विपणन, भंडारण, निर्यात और आयात के लिए कार्यक्रमों की योजना बनाना, बढ़ावा देना और वित्तपोषण करना है।

भारतीय राष्ट्रीय सहकारी संघ (National Cooperative Union of India - NCUI)

भारतीय राष्ट्रीय सहकारी संघ (NCUI), भारतीय सहकारी आंदोलन (Indian Cooperative Movement) का शीर्ष संगठन (apex organization) है। इसकी उत्पत्ति 1929 में अखिल भारतीय प्रांतीय सहकारी संस्थान संघ (All India Provincial Cooperative Institutes’ Association) के रूप में हुई थी। इसके उद्देश्य भारत में सहकारी आंदोलन को बढ़ावा देना और विकसित करना, सहकारी क्षेत्र के निर्माण के लिए लोगों को शिक्षित करना (educate), मार्गदर्शन करना और सहायता करना है।

भारत में सहकारी ऋण समितियों की उपलब्धियां और कमजोरियां (Achievements and Weaknesses of Co-operative-Credit Societies in India)

उपलब्धियां (Achievements):

कमजोरियां (Weaknesses):

🔄 संस्करण 2.0 अद्यतन (Version 2.0 Update)
अंतिम अद्यतन (Last Updated): 28 अगस्त 2026
Your Feedback Can Help More Students

इस नोट्स के बारे में अपनी राय दें

आपकी एक राय से हम इन नोट्स को और बेहतर बना सकते हैं। कृपया नीचे रेटिंग दें।

रेटिंग देने के लिए ऊपर स्टार चुनें

आपकी राय सफलतापूर्वक दर्ज हो गई!

Agrigyan को सभी विद्यार्थियों के लिए और बेहतर बनाने में मदद करने के लिए धन्यवाद।

अस्वीकरण (Disclaimer):
यह स्टडी मटेरियल ICAR के मूल कंटेंट का हिंदी अनुवाद है। हम इसकी पूर्ण सटीकता की गारंटी नहीं देते। यह फाइल अभी सुधार और परीक्षण (Improvement Purpose) के लिए उपलब्ध है। बहुत जल्द हम इसे PDF फॉर्मेट में भी अपडेट करेंगे।

अगर इस नोट्स में कोई गलती दिखे या कोई सुधार चाहिए तो कृपया ऊपर दिए गए फीडबैक फॉर्म में अपनी राय ज़रूर दें — आपकी एक राय से यह नोट्स और भी बेहतर बन सकते हैं और दूसरे छात्रों की मदद हो सकती है।