35. राज्य व्यापार और गुणवत्ता नियंत्रण (STATE TRADING AND QUALITY CONTROL)

राज्य व्यापार (State Trading)

सरकार की जिम्मेदारियों में से एक लोगों को आवश्यक वस्तुओं (essential commodities) की आपूर्ति सुनिश्चित करना है। इसके लिए कृषि वस्तुओं के व्यापार में सरकार के सीधे हस्तक्षेप (direct intervention) की आवश्यकता हो सकती है।

उद्देश्य (Objectives)

राज्य व्यापार के उद्देश्य निम्नलिखित हैं:

  1. नियमित आधार पर उपभोक्ताओं को उचित मूल्य (reasonable prices) पर आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति उपलब्ध कराना।
  2. किसानों को उपज का उचित मूल्य (fair price) सुनिश्चित करना ताकि उत्पादन बढ़ाने के लिए पर्याप्त प्रोत्साहन मिल सके।
  3. आपूर्ति और मांग में मौसमी बदलावों (seasonal variations) के परिणामस्वरूप होने वाले भारी मूल्य उतार-चढ़ाव (price fluctuations) को कम करना।
  4. उर्वरकों (fertilizers) और कीटनाशकों (insecticides) जैसे इनपुट की आपूर्ति की व्यवस्था करना ताकि बढ़ा हुआ उत्पादन बना रहे।
  5. जब भी और जहाँ भी आवश्यक हो, बफर स्टॉक (buffer stock) की खरीद, रखरखाव और उनका वितरण करना।
  6. भंडारण (storage), परिवहन (transportation), पैकेजिंग (packaging) और प्रसंस्करण (processing) की व्यवस्था करना।
  7. सर्वेक्षण करना और सरकार को आवश्यक आंकड़े (statistics) प्रदान करना ताकि वह किसानों की स्थिति में सुधार कर सके।
  8. जमाखोरी (hoarding), कालाबाजारी (black-marketing) और मुनाफाखोरी (profiteering) पर रोक लगाना।

राज्य व्यापार के प्रकार (Types of State Trading)

सरकार द्वारा वांछित हस्तक्षेप की सीमा (extent of intervention) के आधार पर, राज्य व्यापार आंशिक (partial) या पूर्ण (complete) हो सकता है।

(i) आंशिक राज्य व्यापार (Partial State Trading):
आंशिक राज्य व्यापार में, निजी व्यापारी (private traders) और सरकार दोनों सह-अस्तित्व (coexist) में होते हैं। व्यापारी बाजार में खरीदने और बेचने के लिए स्वतंत्र हैं। सरकार उन पर कुछ प्रतिबंध (restrictions) लगा सकती है, जैसे स्टॉक की घोषणा, एक समय में रखे जा सकने वाले स्टॉक की सीमा और नियमित खातों का प्रस्तुतीकरण। सरकार अधिसूचित खरीद मूल्य (procurement price) पर सीधे उत्पादकों से वस्तुओं की खरीद के लिए बाजार में प्रवेश करती है। यह उचित मूल्य की दुकानों (fair price shops) के नेटवर्क के माध्यम से उपभोक्ताओं को वस्तुओं का वितरण करती है।

(ii) पूर्ण राज्य व्यापार (Complete State Trading):
यह सरकार द्वारा अपनाए जाने वाले व्यापार का चरम रूप (extreme form) है जब आंशिक राज्य व्यापार उत्पादकों को उचित मूल्य सुनिश्चित करने और उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर सामान उपलब्ध कराने में विफल रहता है। वस्तुओं की खरीद और बिक्री पूरी तरह से सरकार या उसकी एजेंसियों द्वारा की जाती है। निजी व्यापारियों को खरीद या बिक्री के लिए बाजार में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है। भारत में, 1973 में गेहूं के पूर्ण थोक व्यापार (wholesale trade) को सरकार ने अपने हाथ में ले लिया था; लेकिन इसे बहुत जल्द छोड़ना पड़ा।

गेहूं के थोक व्यापार अधिग्रहण का अनुभव (Experience of Wholesale Trade Takeover in Wheat)

फरवरी, 1973 में आयोजित मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन की सिफारिश पर, 1972-73 के रबी मौसम से सरकार द्वारा गेहूं और धान के थोक व्यापार को अपने हाथ में ले लिया गया था। इसका उद्देश्य उन थोक विक्रेताओं (wholesalers) को खत्म करना था, जिन्हें कीमतें बढ़ाने के उद्देश्य से जमाखोरी (hoarding) करके कृत्रिम कमी (artificial scarcity) पैदा करने के लिए जिम्मेदार माना जाता था।

पूर्ण अधिग्रहण के उद्देश्य:

  1. बिचौलियों (middlemen) के अनुचित मुनाफे (unwarranted profits) को खत्म करना।
  2. उत्पादकों को लाभकारी मूल्य (remunerative prices) सुनिश्चित करना।
  3. उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर खाद्यान्न की सुनिश्चित आपूर्ति की गारंटी देना।
  4. मूल्य वृद्धि (price rise) को रोकना।

गेहूं के थोक व्यापार अधिग्रहण की योजना सफल नहीं हुई (The scheme did not succeed) और इसे तुरंत वापस ले लिया गया। विफलता के कारण थे:

भारत के राज्य व्यापार निगम (State Trading Corporation of India - STC)

भारत से निर्यात (Exports from India)

STC दुनिया भर के कई गंतव्यों (destinations) के लिए वस्तुओं की एक विविध श्रृंखला (diverse range) का निर्यात करता है। STC द्वारा निर्यात पारंपरिक कृषि वस्तुओं से लेकर परिष्कृत निर्मित उत्पादों (manufactured products) तक भिन्न होता है। बातचीत, अनुबंध और शिपिंग (shipping) के अलावा, STC नए उत्पादों को पेश करना, नए बाजारों का पता लगाना और उत्पाद विकास, वित्तपोषण, गुणवत्ता नियंत्रण (Quality Control) और निर्यात उत्पादन के लिए मशीनरी और कच्चे माल का आयात जैसे कई सहायक कार्य (ancillary functions) करता है।

निर्यात की प्रमुख कृषि वस्तुएं (Principal Items of Export - Agricultural Commodities):
गेहूं (Wheat), काजू (Cashew), कॉफी (Coffee), चावल (Rice), चाय (Tea), तंबाकू और रबर (Tobacco & Rubber), चीनी निष्कर्षण (Sugar Extractions), अफीम (Opium), HPS मूंगफली (Groundnut), मसाले (Spices), अरंडी का तेल और बीज (Castor oil & Seeds), जूट का सामान (Jute Goods)।

निर्मित उत्पादों का निर्यात (Export of Manufactured Products):
रसायन (Chemicals), दवाएं (Drugs), उपभोक्ता उत्पाद (Consumer Products), कपड़ा और वस्त्र (Textiles and Garments), प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ (Processed Foods) आदि।

भारत में आयात (Imports into India)

STC घरेलू कमियों (domestic shortfalls) को पूरा करने और मूल्य रेखा को बनाए रखने के लिए कई आवश्यक वस्तुओं (essential commodities) का आयात करता है। STC सबसे अधिक प्रतिस्पर्धी कीमतों (competitive prices) पर समय पर आयात की व्यवस्था करके राष्ट्रीय उद्देश्य की सेवा करता है।

आयात की प्रमुख कृषि वस्तुएं (Principal Items of Import - Agricultural Commodities):
खाद्य तेल (Edible oils), चीनी (Sugar), गेहूं (Wheat), फैटी एसिड (Fatty Acids), दालें (Pulses)।

STC द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाएं (Services)

खाद्य तेल (Edible Oil)

खाद्य तेलों का आयात STC की प्रमुख गतिविधियों में से एक है। PDS के लिए तेलों के आयात के अलावा, STC वास्तविक उपयोगकर्ताओं सहित घरेलू खरीदारों (domestic buyers) के लिए वाणिज्यिक खाते (commercial account) पर विभिन्न तेलों का आयात कर रहा है। पूरी प्रक्रिया वास्तविक लागत के साथ-साथ STC द्वारा लगाए गए एक निश्चित सेवा मार्जिन (fixed service margin) पर आधारित है।

कृषि उत्पादों में गुणवत्ता नियंत्रण (Quality Control in Agricultural Products)

कृषि वस्तुओं (agricultural commodities) का गुणवत्ता नियंत्रण विपणन और निरीक्षण निदेशालय (Directorate of Marketing and Inspection) की जिम्मेदारी है। निदेशालय ने कृषि उपज ग्रेडिंग और अंकन अधिनियम (Agricultural Produce Grading and Marking Act), 1937 के तहत विभिन्न कृषि उत्पादों के लिए ग्रेड मानक (grade standards) निर्धारित किए हैं। ग्रेडेड उत्पादों पर एगमार्क (AGMARK) लेबल होता है, जो उत्पाद की शुद्धता और गुणवत्ता (purity and quality) को दर्शाता है।

निर्मित उत्पाद (Manufactured Products)

निर्मित उत्पादों (Manufactured products) को भारतीय मानक संस्थान (Indian Standards Institution - ISI), जो अब भारतीय मानक ब्यूरो (Bureau of Indian Standards - BIS) है, द्वारा निर्धारित मानकों के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है और उन पर ISI लेबल होता है। निर्माताओं (Manufacturers) को निर्दिष्ट अनुपात में उचित सामग्री का उपयोग करना चाहिए और मानकों में दी गई निर्माण तकनीक (technique of manufacture) का पालन करना चाहिए। ISI लेबल उत्पाद की अच्छी गुणवत्ता का एक संकेतक है।

भारतीय मानक संस्थान (Indian Standards Institution - ISI)

भारत में एक संगठित आधार पर मानकीकरण (Standardization) की शुरुआत भारतीय मानक संस्थान की स्थापना के साथ हुई। इस संस्था को 1947 में देश के औद्योगिक, वैज्ञानिक और तकनीकी संगठनों के सक्रिय समर्थन से स्थापित किया गया था। यह संसद के एक अधिनियम (ISI प्रमाणन चिह्न अधिनियम - ISI Certification Marks Act) के तहत संचालित होता है, जिसके तहत निर्मित वस्तुओं पर प्रमाणीकरण (certification) के ISI चिह्न की मुहर लगाई जाती है। यह चिह्न क्रेता (purchaser) के लिए एक गारंटी के रूप में कार्य करता है कि माल प्रासंगिक भारतीय मानकों के प्रावधानों के अनुसार उत्पादित किया गया है।

ISI के उद्देश्य और कार्य (Aims and objects of the ISI):

प्रभावी कार्यान्वयन के लिए, संस्था ISI (प्रमाणन चिह्न) अधिनियम के तहत एक प्रमाणन चिह्न योजना (certification marks scheme) संचालित कर रही है। यह अधिनियम ISI को निर्माताओं (manufacturers) को अपने उत्पादों पर ISI चिह्न का उपयोग करने के लिए लाइसेंस (licences) देने में सक्षम बनाता है। यह योजना 1955-56 में शुरू की गई थी।

ISI ने उपभोक्ताओं (consumers) के साथ-साथ निर्माताओं (manufacturers) दोनों को लाभान्वित किया है। यह उत्पादकता बढ़ाकर और लागत को कम करके बर्बादी को कम करता है। यह सुनिश्चित गुणवत्ता (assured quality) के माध्यम से उपभोक्ताओं की रक्षा करता है।

भारतीय मानक ब्यूरो (Bureau of Indian Standards - BIS)

1 अप्रैल, 1987 से भारतीय मानक संस्थान का नाम बदलकर भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) कर दिया गया है। इसके नाम में बदलाव के साथ-साथ इसका दर्जा और गतिविधियों का दायरा भी बढ़ गया है। BIS, ISI के सभी कार्यों को पहले की तरह उपभोक्ता संरक्षण (consumer protection) और भारतीय उत्पादों की गुणवत्ता के स्तर में सुधार करने पर अधिक जोर देकर करता है।

ब्यूरो को भारतीय मानक ब्यूरो अधिनियम, 1986 द्वारा स्थापित किया गया है और यह एक वैधानिक निकाय (statutory body) बन गया है। पिछले पांच दशकों में, इसने 17,000 से अधिक भारतीय मानक (Indian Standards) बनाए हैं।

BIS गतिविधियों के कुछ नवीनतम मुख्य अंश (latest highlights) हैं:

उपभोक्ता संरक्षण (Consumer Protection)

उपभोक्ताओं (consumers) के हितों की रक्षा करने का अर्थ है उन्हें स्वस्थ, स्वच्छ रूप से तैयार और पूर्व-परीक्षण किए गए गुणवत्तापूर्ण उत्पाद (quality products) प्रदान करना। उपभोक्ताओं को अक्सर भ्रामक और दोषपूर्ण वजन और माप (defective weights and measures) और मिलावट (adulteration) के माध्यम से धोखा दिया जाता है।
उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए सरकार द्वारा समय-समय पर विभिन्न अधिनियम (Acts) बनाए गए हैं:

  1. भारतीय माल बिक्री अधिनियम (Indian Sale of Goods Act), 1930.
  2. कृषि उपज (ग्रेडिंग और अंकन) अधिनियम (Agricultural Produce (Grading & Marking) Act), 1937.
  3. औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम (Drugs and Cosmetics Act), 1940.
  4. आवश्यक वस्तु अधिनियम (Essential Commodities Act), 1955.
  5. उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (Consumer's Protection Act), 1986.

खाद्य पदार्थों में गुणवत्ता प्रबंधन (Quality Management in Food)

(a) HACCP (Hazard Analysis and Critical Control Points)
HACCP और जोखिम विश्लेषण (Risk Analysis) भोजन की वस्तुओं पर लागू गुणवत्ता प्रबंधन की एक आधुनिक अवधारणा है। खाद्य सुरक्षा खतरों (food safety hazards) को पहचानने और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है।
यह निवारक प्रणाली (preventive system) मूल रूप से 1960 के दशक में NASA (National Aeronautics and Space Administration) द्वारा अंतरिक्ष यात्रियों के भोजन के लिए विकसित की गई थी। अंतर्राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मानक (International food safety standards) कोडेक्स एलिमेंटेरियस कमीशन (CODEX) द्वारा विकसित किए जाते हैं, जो FAO और WHO का एक संयुक्त आयोग है।

(b) ईकोमार्क (ECOMARK)
भारत सरकार ने फरवरी 1991 में पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों (environment friendly products) को लेबल करने के लिए ECOMARK के रूप में जानी जाने वाली एक योजना शुरू की। इस योजना का प्रबंधन भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा किया जाता है। ईकोमार्क उन उत्पादों को दिया जाता है जो भारतीय मानकों के साथ-साथ पर्यावरण के अनुकूल प्रकृति के लिए अतिरिक्त आवश्यकताओं को पूरा करते हैं।

(c) शाकाहारी/मांसाहारी खाद्य उत्पादों को पहचानने का चिह्न (Mark to Identify Vegetarian/Non-Vegetarian Food Products)
भारत सरकार ने खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम (Prevention of Food Adulteration Act), 1955 में संशोधन करके पैक किए गए खाद्य उत्पादों पर लेबल लगाना अनिवार्य कर दिया है।
हरे रंग (green colour) के वर्ग में एक बिंदु (dot in a square) का निशान शाकाहारी उत्पाद (vegetarian product) का सूचक है और भूरे रंग (brown colour) का निशान मांसाहारी भोजन (non-vegetarian food) का सूचक है।

(d) FPO का चिह्न (Mark of FPO)
फलों और सब्जियों के प्रसंस्कृत उत्पादों (processed products) के पैक किए गए कंटेनरों पर दो लटकती पट्टियों के साथ एक अंडाकार (oval) में FPO का निशान होना अनिवार्य है। यह उत्पाद की गुणवत्ता को इंगित करता है।

उपभोक्ता शिक्षा और अनुसंधान केंद्र (Consumer Education and Research Centre - CERC)

उपभोक्ता शिक्षा और अनुसंधान केंद्र (CERC) अहमदाबाद में स्थित एक गैर-लाभकारी संगठन है। यह गुजरात सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त उपभोक्ता संगठन है। इसके मुख्य उद्देश्य जनसंचार माध्यमों (mass media) के माध्यम से उपभोक्ता चेतना (consumer consciousness) पैदा करना, शोध (research) करना, उपभोक्ता संरक्षण के लिए लोगों को प्रशिक्षित करना और समाज में विभिन्न बुराइयों से उपभोक्ताओं की सुरक्षा (protection of consumers) के लिए लोगों और स्वैच्छिक संगठनों (voluntary organizations) को प्रेरित करना है।

अस्वीकरण (Disclaimer):
यह स्टडी मटेरियल ICAR के मूल कंटेंट का हिंदी अनुवाद है। हम इसकी पूर्ण सटीकता के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। यह फाइल अभी केवल सुधार और परीक्षण (Improvement Purpose) के लिए यहाँ उपलब्ध कराई गई है। बहुत जल्द हम इसे डाउनलोड करने के लिए PDF फॉर्मेट में अपडेट करेंगे।

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