गोदाम या वेयरहाउस (Warehouses) वैज्ञानिक भंडारण संरचनाएं (scientific storage structures) हैं जिन्हें विशेष रूप से संग्रहीत उत्पादों की मात्रा और गुणवत्ता की सुरक्षा के लिए बनाया गया है। भंडारण को माल के भंडारण के लिए जिम्मेदारी लेने के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। इसे राष्ट्रीय संपत्ति का रक्षक (protector of national wealth) कहा जा सकता है, क्योंकि गोदामों में संग्रहीत उपज को कृंतकों (rodents), कीड़ों (insects), और नमी (moisture) के बुरे प्रभाव से संरक्षित किया जाता है।
भारत में भंडारण योजना वैज्ञानिक भंडारण, ग्रामीण ऋण, मूल्य स्थिरीकरण (price stabilization) और बाजार खुफिया जानकारी (market intelligence) की एक एकीकृत योजना है।
गोदामों के महत्वपूर्ण कार्य (functions of warehouses) हैं:
गोदामों को दो आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है:
1. स्वामित्व के आधार पर (On the Basis of Ownership)
(a) निजी गोदाम (Private Warehouses): ये वे गोदाम हैं जो सरकार के स्वामित्व में हैं और निर्धारित भंडारण शुल्क (storage charge) के बदले आम जनता के किसी भी सदस्य के माल के भंडारण के लिए हैं।
(b) बंधुआ गोदाम (Bonded Warehouses): ये गोदाम विशेष रूप से एक बंदरगाह (seaport) या हवाई अड्डे (airport) पर बनाए जाते हैं और आयातित सामानों (imported goods) के भंडारण के लिए तब तक स्वीकार किए जाते हैं जब तक कि माल के आयातक द्वारा सीमा शुल्क (customs) का भुगतान नहीं कर दिया जाता। ये सीमा शुल्क अधिकारियों (customs authorities) की कड़ी निगरानी में काम करते हैं।
2. संग्रहीत वस्तुओं के प्रकार के आधार पर (On the Basis of Type of Commodities Stored)
(a) सामान्य गोदाम (General Warehouses): ये अधिकांश खाद्यान्नों, उर्वरकों आदि के भंडारण के लिए उपयोग किए जाने वाले साधारण गोदाम हैं।
(b) विशेष वस्तु गोदाम (Special Commodity Warehouses): ये वे गोदाम हैं जो विशेष रूप से कपास, तंबाकू, ऊन और पेट्रोलियम उत्पादों जैसी विशिष्ट वस्तुओं के भंडारण के लिए बनाए गए हैं।
(c) प्रशीतित गोदाम (Refrigerated Warehouses): ये वे गोदाम हैं जिनमें तापमान आवश्यकताओं के अनुसार बनाए रखा जाता है और सब्जियों, फलों, मछली, अंडे और मांस जैसी खराब होने वाली वस्तुओं (perishable commodities) के लिए होते हैं।
ऑल-इंडिया रूरल क्रेडिट सर्वे कमेटी (All-India Rural Credit Survey Committee) की सिफारिशों के परिणामस्वरूप, भारत सरकार ने कृषि उपज (विकास और भंडारण) निगम अधिनियम (Agricultural Produce (Development and Warehousing) Corporations Act), 1956 अधिनियमित किया। इस अधिनियम ने निम्नलिखित के लिए प्रावधान किया:
केंद्रीय भंडारण निगम (Central Warehousing Corporation - CWC):
इस निगम की स्थापना 2 मार्च, 1957 को नई दिल्ली में एक वैधानिक निकाय (statutory body) के रूप में की गई थी। इसके मुख्य कार्य भारत में उपयुक्त स्थानों पर गोदाम और वेयरहाउस बनाना, कृषि उपज, बीज, उर्वरक आदि के भंडारण के लिए गोदाम चलाना, और सरकार के एजेंट के रूप में इन वस्तुओं की खरीद, बिक्री, भंडारण और वितरण करना है।
राज्य भंडारण निगम (State Warehousing Corporations - SWC):
भारतीय संघ के विभिन्न राज्यों में अलग-अलग भंडारण निगम भी स्थापित किए गए। पहला राज्य गोदाम 1956 में बिहार में स्थापित किया गया था। राज्य भंडारण निगमों के संचालन का क्षेत्र जिला महत्व (district importance) के केंद्र हैं।
| वर्ष (Year) | संख्या (CWC) | संख्या (SWC) | क्षमता (CWC - लाख टन) | क्षमता (SWC - लाख टन) |
|---|---|---|---|---|
| 1960-61 | 40 | 266 | 0.79 | 2.78 |
| 1980-81 | 330 | 1050 | 37.89 | 50.00 |
| 2000-01 | 466 | 1639 | 83.91 | 148.99 |
| 2001-02 | 475 | 1540 | 89.17 | 185.49 |
समाज के कमजोर वर्गों (vulnerable sections) को उचित मूल्य पर खाद्यान्न (food grains) का समान वितरण सुनिश्चित करने के लिए खाद्य अर्थव्यवस्था (food economy) का एक कुशल प्रबंधन आवश्यक है। संसद ने खाद्यान्नों में व्यापार के सरकार के कार्य को सार्वजनिक क्षेत्र (public sector) में स्थानांतरित करने का निर्णय लिया। कानून बनाया गया, और 1 जनवरी, 1965 को भारतीय खाद्य निगम (Food Corporation of India - FCI) का जन्म हुआ।
FCI नई दिल्ली में अपने कॉर्पोरेट कार्यालय, 5 क्षेत्रीय कार्यालयों (Zonal Offices), 23 क्षेत्रीय कार्यालयों (Regional Offices) (लगभग सभी राज्यों की राजधानियों में), 165 जिला कार्यालयों और 1470 डिपो (depots) के साथ देशव्यापी नेटवर्क के माध्यम से काम करता है।
(i) खरीद (Procurement):
FCI भारत सरकार और राज्य सरकारों की ओर से खाद्यान्नों की खरीद (procurement) का कार्य करता है। यह उत्पादकों को पूर्व निर्धारित खरीद/समर्थन मूल्य (predetermined procurement/support prices) सुनिश्चित करके संकट की बिक्री (distress sales) को रोकता है।
| वर्ष (Year) | चावल (Rice) | गेहूं (Wheat) | मोटे अनाज (Coarse grains) | कुल (Total) |
|---|---|---|---|---|
| 1970 | 3043 | 3183 | 488 | 6714 |
| 1980 | 5210 | 5866 | 102 | 11178 |
| 1990 | 12792 | 11094 | 105 | 23991 |
| 2000-01 | 20824 | 16356 | - | 37180 |
| 2008-09 | 22682 | 33683 | 1375 | 57740 |
(ii) भंडारण (Storage):
FCI का एक अन्य महत्वपूर्ण कार्य खरीद के समय से लेकर उनके वितरण तक खाद्यान्नों के लिए पर्याप्त और उचित वैज्ञानिक भंडारण सुविधाएं (scientific storage facilities) प्रदान करना है। खाद्यान्नों को उन गोदामों में संग्रहीत किया जाता है जो वैज्ञानिक रूप से नमी, चूहों और कवक से बचाने के लिए बनाए गए हैं। FCI के पास 28.30 मिलियन टन भंडारण क्षमता (storage capacity) है - जिसमें अच्छी तरह से निर्मित गोदाम, साइलो (silos) और CAP (Cover and Plinth) शामिल हैं।
(iii) परिवहन (Transportation):
FCI रेल और सड़क दोनों के माध्यम से खाद्यान्नों की त्वरित और बड़े पैमाने पर आवाजाही का आयोजन करता है, ताकि उपभोग और भंडारण के क्षेत्रों में समय पर आगमन सुनिश्चित हो सके।
(iv) वितरण (Distribution):
निगम का एक अन्य महत्वपूर्ण कार्य पूरे भारत में लगभग 4.91 लाख उचित मूल्य की दुकानों (fair price shops) के माध्यम से खरीदे/आयातित खाद्यान्नों का वितरण है।
(v) प्रसंस्करण (Processing):
FCI ने खाद्य प्रसंस्करण (food processing) के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। चावल की उपलब्धता बढ़ाने और राइस ब्रान (rice bran) से तेल निकालने के लिए इसने विभिन्न राज्यों में 24 आधुनिक राइस मिलें स्थापित की हैं। इसने बच्चों के लिए प्रोटीन युक्त भोजन 'बालहार' (Balahar) का भी उत्पादन किया है।
खाद्यान्नों के बफर स्टॉक (buffer stock) का तात्पर्य सरकार द्वारा बनाए गए खाद्यान्नों के स्टॉक से है, जिसका उपयोग आपूर्ति और मूल्य में उतार-चढ़ाव (fluctuating supply and price) के झटके को कम करने, आपातकालीन जरूरतों को पूरा करने और परिवहन बाधाओं, प्राकृतिक आपदाओं जैसे युद्ध, बाढ़, अकाल आदि से उत्पन्न होने वाली स्थितियों का सामना करने के लिए किया जाता है।
बफर स्टॉक बनाए रखने के मुख्य लाभ हैं:
सरकार बाजार में प्रवेश करती है और बफर स्टॉक के रखरखाव के लिए खाद्यान्न खरीदती है। इसे भारतीय खाद्य निगम द्वारा बनाए रखा जाता है। मध्य अस्सी के दशक में, 10 मिलियन टन का बफर स्टॉक पर्याप्त माना जाता था, जिसमें 5 मिलियन टन गेहूं और समान मात्रा में चावल शामिल था।
| वर्ष (Year) | कवर्ड (Covered) - Owned | कवर्ड (Covered) - Hired | कैप (CAP) | कुल (Total) |
|---|---|---|---|---|
| 1990-91 | 119.97 | 75.95 | 25.16 | 221.08 |
| 2001-02 | 126.10 | 141.07 | 83.38 | 350.55 |
कोल्ड स्टोरेज (cold storage) का तात्पर्य सब्जियों, फलों, मछली, अंडे, मांस, डेयरी उत्पादों आदि जैसी खराब होने वाली वस्तुओं (perishable commodities) के भंडारण के लिए एक प्रशीतित कक्ष (refrigerated chamber) से है। इन भंडारण संरचनाओं में, तापमान को नियंत्रित (controlled) और बनाए रखा जाता है ताकि संग्रहीत उत्पाद की गुणवत्ता खराब न हो। कोल्ड स्टोरेज में, तापमान -1.1°C से 10°C की सीमा में बनाए रखा जाता है। फ्रीजर स्टोरेज (freezer storage) में तापमान -1.1°C से नीचे रखा जाता है और उत्पाद जमी हुई अवस्था में रहता है।
कोल्ड स्टोरेज के लाभ:
आलू (Potato) मुख्य उत्पाद है जिसे कोल्ड स्टोरेज में संग्रहित किया जाता है। कुल क्षमता उपयोग का 88 प्रतिशत आलू के भंडारण के लिए उपयोग किया जाता है। भारत में 2001 तक 4199 कोल्ड स्टोरेज इकाइयां थीं जिनकी कुल क्षमता 153.85 लाख टन थी। अधिकांश कोल्ड स्टोरेज निजी क्षेत्र (private sector) में हैं।
| वस्तु (Commodity) | कोल्ड स्टोरेज इकाइयों की संख्या (%) | क्षमता उपयोग (Capacity utilization %) |
|---|---|---|
| आलू (Potato) | 63.0 | 88.3 |
| फल और सब्जियां (Fruits & Vegetables) | 1.1 | 0.4 |
| दूध और दूध उत्पाद (Milk & Milk Products) | 6.9 | 0.7 |
| मछली (Fish) | 11.3 | 0.9 |
| बहुउद्देशीय (Multi-purpose) | 9.7 | 8.0 |