भारतीय कृषि - भारतीय अर्थव्यवस्था - राष्ट्रीय आय - प्रति व्यक्ति आय - जीडीपी में कृषि आय - कृषि और सशक्तिकरण में महिलाएं

भारतीय कृषि और अर्थव्यवस्था (Indian Agriculture and Economy)

भारतीय कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था (Indian economy) में सबसे महत्वपूर्ण योगदानकर्ताओं में से एक है। भारत में लगभग 60% नियोजित वर्ग (employed class) के लिए कृषि जीवन यापन (living) का एकमात्र साधन है। भारत के कृषि क्षेत्र ने भारत के भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 43% हिस्सा घेर रखा है। भारत के कृषि हिस्से में गिरावट के बाद भी कृषि भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP - 16%) में एकमात्र सबसे बड़ा योगदानकर्ता है। कृषि भारत में सामाजिक-आर्थिक (socio-economic) क्षेत्र के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

शुरुआती समय में, भारत खाद्य आयात (food imports) पर काफी हद तक निर्भर था, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था के कृषि क्षेत्र की क्रमिक कहानी (successive story) ने इसे अनाज उत्पादन (grain production) में आत्मनिर्भर (self-sufficing) बना दिया है। देश के पास इसके लिए पर्याप्त भंडार (substantial reserves) भी हैं। भारत कृषि क्षेत्र पर काफी हद तक निर्भर करता है, विशेष रूप से खाद्य क्षेत्र में 1960 के संकट के बाद खाद्य उत्पादन इकाई (food production unit) पर। तब से, भारत ने खाद्य उत्पादन में आत्मनिर्भर होने के लिए बहुत प्रयास किए हैं और भारत के इस प्रयास ने हरित क्रांति (Green Revolution) को जन्म दिया है। भारत में कृषि में सुधार के उद्देश्य से हरित क्रांति अस्तित्व में आई।

भारतीय अर्थव्यवस्था के कृषि क्षेत्र में हरित क्रांति द्वारा बढ़ाई गई सेवाएँ (services) इस प्रकार हैं:

हरित क्रांति द्वारा उठाए गए इन सभी उपायों से भारत की कृषि के गेहूं और चावल उत्पादन में भारी वृद्धि (alarming rise) हुई। भारत की कृषि की गेहूं और चावल उत्पादन इकाई (production unit) द्वारा देखी गई लंबी छलांग (quantum leap) को ध्यान में रखते हुए, किसानों को बेहतर तकनीकों (improved technologies) से परिचित कराने के उद्देश्य से 1986 में लगभग 13 राज्यों को कवर करने वाला एक राष्ट्रीय दलहन विकास कार्यक्रम (National Pulse Development Programme) स्थापित किया गया था। भारतीय अर्थव्यवस्था में तिलहन क्षेत्र (oilseeds sector) को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय दलहन विकास कार्यक्रम की सफलता के ठीक बाद 1986 में तिलहन पर एक प्रौद्योगिकी मिशन (Technology Mission on Oilseeds) शुरू किया गया था। दालें (Pulses) भी इसी कार्यक्रम के अंतर्गत आईं। फल, सब्जियां, तिलहन, दालों और फूलों के लिए बेहतर गुणवत्ता वाले बीज (superior quality seeds) और पौधे सामग्री तक प्रवेश (entree) प्रदान करने के लिए एक नई बीज नीति (seed policy) की योजना बनाई गई थी।

भारत सरकार ने भारतीय अर्थव्यवस्था के कृषि क्षेत्र को प्रोत्साहित (stimulate) करने और इसे अधिक आकर्षक (lucrative) बनाने के लिए खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय (Ministry of Food Processing Industries) की भी स्थापना की। भारत का कृषि क्षेत्र मानसून के मौसम (monsoon season) पर अत्यधिक निर्भर करता है क्योंकि इस दौरान भारी वर्षा (heavy rainfall) से फसल अच्छी होती है। लेकिन, पूरे साल की कृषि संभवतः केवल एक मौसम पर निर्भर नहीं रह सकती है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए, ऐसे प्रतिबंधों (restrictions) को दूर करने के लिए दूसरी हरित क्रांति (second Green Revolution) बनने की संभावना है। विकास दर (growth rate) और सिंचाई क्षेत्र में वृद्धि, बेहतर जल प्रबंधन, मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार और उच्च मूल्य वाले आउटपुट (high value outputs), फल, सब्जियों, जड़ी-बूटियों (herbs), फूलों, औषधीय पौधों (medicinal plants) और बायो-डीजल (bio-diesel) में विविधता लाना भी भारत में कृषि में सुधार के लिए हरित क्रांति द्वारा ली जाने वाली सेवाओं की सूची में हैं।

राष्ट्रीय आय (National income)

राष्ट्रीय आय निम्नलिखित कारणों से महत्वपूर्ण है:

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ देश धनी (wealthy) हैं, कुछ देश धनी नहीं हैं और कुछ देश बीच (in-between) में हैं। ऐसी परिस्थितियों में किसी अर्थव्यवस्था (economy) के प्रदर्शन (performance) का मूल्यांकन (evaluate) करना मुश्किल होगा। अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन अर्थव्यवस्था में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं (goods and services) की मात्रा के सीधे आनुपातिक (proportionate) है। अर्थव्यवस्था के भविष्य के पाठ्यक्रम (future course) को तैयार करने के लिए राष्ट्रीय आय को मापना भी महत्वपूर्ण है। यह लोगों के जीवन स्तर (standard of living) को भी मोटे तौर पर इंगित करता है। आय को सकल राष्ट्रीय उत्पाद (Gross National Product - GNP), सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product - GDP), सकल राष्ट्रीय आय (Gross National Income - GNI), शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (Net National Product - NNP) और शुद्ध राष्ट्रीय आय (Net National Income - NNI) द्वारा मापा जा सकता है। भारतीय अर्थव्यवस्था अमरीकी डालर विनिमय दर (USD exchange rate) के मामले में 12वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। भारत दुनिया की दूसरी सबसे तेजी से बढ़ती (fastest growing) अर्थव्यवस्था है। भारत की जीडीपी 1.25 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर (US$1.25 trillion) को छू गई है। 2007 में ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े (trillion dollar mark) को पार करने वाली भारतीय जीडीपी भारत को ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था वाले 12 देशों के कुलीन समूह (elite group) में रखती है। जबरदस्त विकास दर (tremendous growth rate) बेहतर व्यापक आर्थिक स्थिरता (macroeconomic stability) के साथ मेल खाती है। भारत ने सूचना प्रौद्योगिकी (information technology), उच्च अंत सेवाओं (high end services) और ज्ञान प्रक्रिया सेवाओं (knowledge process services) में उल्लेखनीय प्रगति (remarkable progress) की है।

जीडीपी में कृषि आय (Agricultural income in GDP)

कृषि क्षेत्र का योगदान 1990-91 में 32%, 2005-06 के दौरान 20% और अब लगभग 16% है। हालांकि भारत की जीडीपी आय में कृषि का योगदान है, यह बहुत अच्छी खबर है कि आज सेवा क्षेत्र (service sector) भारतीय जीडीपी के आधे से अधिक का योगदान दे रहा है। यह भारत को दुनिया की विकसित अर्थव्यवस्थाओं (developed economies) के एक कदम और करीब ले जाता है। पहले यह कृषि थी जो मुख्य रूप से भारतीय जीडीपी में योगदान करती थी। भारत सरकार अभी भी देश की जीडीपी में सुधार करने की कोशिश कर रही है और इसलिए अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। एफडीआई (FDI), सेज (SEZs) और एनआरआई निवेश (NRI investment) की नीतियां अर्थव्यवस्था और इसलिए जीडीपी को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई हैं।

कृषि प्रति व्यक्ति आय (Agriculture per capita income)

हाल के वर्षों के दौरान कृषि क्षेत्र की प्रति व्यक्ति आय (per capita income) राष्ट्रीय प्रति व्यक्ति आय (national per capita income) के 1/3 तक गिर गई है। 2010 में कृषि जनसंख्या की प्रति व्यक्ति आय लगभग रु. 10,865 अनुमानित (estimated) है, जो रु. 33,802/- की राष्ट्रीय प्रति व्यक्ति आय का लगभग 32% है। कृषि आबादी की प्रति व्यक्ति आय 1980 के दौरान रु. 11,433/- की राष्ट्रीय प्रति व्यक्ति आय के लगभग आधे (1/2) रु. 5,505 पर थी, हालांकि, यह 2000 के दौरान रु. 16,020/- की राष्ट्रीय प्रति व्यक्ति आय के लगभग 42% रु. 6,652/- तक नीचे आ गई।

कृषि क्षेत्र में आय वितरण (Income Distribution in Agriculture sector)

वर्ष/ अवधि (Year/ Period) जीडीपी में कृषि की हिस्सेदारी (Agriculture Share in GDP) कृषि पर निर्भर जनसंख्या (Population Dependent on Agriculture) कृषि प्रति व्यक्ति (रु. में) (Agriculture Per Capita (in Rs.))
198039704745 (56%)
199031655505 (48%)
200025596652 (42%)
2010165810865 (32%)

कृषि और सशक्तिकरण में महिलाएं (Women in Agriculture and empowerment)

भारत में महिलाएं अब शिक्षा, खेल, राजनीति, मीडिया, कला और संस्कृति, सेवा क्षेत्रों, विज्ञान और प्रौद्योगिकी (science and technology) आदि जैसी सभी गतिविधियों (activities) में भाग लेती हैं। पंद्रह वर्षों की कुल अवधि (aggregate period) के लिए भारत के प्रधान मंत्री के रूप में कार्य करने वाली इंदिरा गांधी दुनिया की सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाली महिला प्रधान मंत्री (woman Prime Minister) हैं।

भारत का संविधान (Constitution of India) सभी भारतीय महिलाओं को समानता (equality - अनुच्छेद 14), राज्य द्वारा कोई भेदभाव नहीं (no discrimination - अनुच्छेद 15(1)), अवसर की समानता (equality of opportunity - अनुच्छेद 16) और समान काम के लिए समान वेतन (equal pay for equal work - अनुच्छेद 39(d)) की गारंटी देता है। इसके अलावा, यह राज्य को महिलाओं और बच्चों के पक्ष में विशेष प्रावधान (special provisions) करने की अनुमति देता है [अनुच्छेद 15(3)], महिलाओं की गरिमा (dignity) के लिए अपमानजनक (derogatory) प्रथाओं (practices) का त्याग (renounces) करता है [अनुच्छेद 51(a) (e)], और काम की न्यायसंगत (just) और मानवीय (humane) स्थितियों को सुरक्षित करने और मातृत्व राहत (maternity relief) के लिए राज्य द्वारा प्रावधान किए जाने की भी अनुमति देता है। (अनुच्छेद 42)।

भारत में नारीवादी सक्रियता (feminist activism) ने 1970 के दशक के उत्तरार्ध में गति पकड़ी। चूंकि शराब की लत (alcoholism) अक्सर भारत में महिलाओं के खिलाफ हिंसा से जुड़ी होती है, इसलिए कई महिला समूहों ने आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उड़ीसा, मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों में शराब विरोधी अभियान (anti-liquor campaigns) शुरू किए। कई भारतीय मुस्लिम महिलाओं ने शरीयत कानून (Shariat law) के तहत महिलाओं के अधिकारों के कट्टरपंथी नेताओं (fundamental leaders) की व्याख्या (interpretation) पर सवाल उठाया है और तीन तलाक प्रणाली (triple talaq system) की आलोचना की है।

1990 के दशक में, विदेशी दाता एजेंसियों (foreign donor agencies) के अनुदान (grants) ने नए महिला-उन्मुख (women-oriented) गैर सरकारी संगठनों (NGOs) के गठन को सक्षम बनाया। सेल्फ एम्प्लॉयड विमेंस एसोसिएशन (Self Employed Women's Association - SEWA) जैसे स्वयं सहायता समूहों (Self-help groups) और गैर सरकारी संगठनों ने भारत में महिलाओं के अधिकारों में एक प्रमुख भूमिका निभाई है। कई महिलाएं स्थानीय आंदोलनों की नेता (leaders of local movements) के रूप में उभरी हैं। उदाहरण के लिए, नर्मदा बचाओ आंदोलन (Narmada Bachao Andolan) की मेधा पाटकर (Medha Patkar)।

भारत सरकार ने 2001 को महिला सशक्तिकरण का वर्ष (Year of Women's Empowerment - स्वशक्ति) घोषित किया। महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए राष्ट्रीय नीति (National Policy for the Empowerment of Women) 2001 में पारित की गई थी।

2006 में मीडिया में इमरान (Imrana) नाम की एक मुस्लिम दुष्कर्म पीड़िता (rape victim) का मामला सामने आया। इमरान के साथ उसके ससुर ने दुष्कर्म किया था। कुछ मुस्लिम मौलवियों (Muslim clerics) की घोषणा (pronouncement) कि इमरान को अपने ससुर से शादी करनी चाहिए, के कारण व्यापक विरोध प्रदर्शन (widespread protests) हुए और अंततः इमरान के ससुर को 10 साल जेल की सजा दी गई, इस फैसले (verdict) का कई महिला समूहों और अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (All India Muslim Personal Law Board) ने स्वागत किया।

2010 में 9 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (International Women's day) के एक दिन बाद, राज्यसभा ने महिला आरक्षण विधेयक (Women's Reservation Bill) पारित किया, जिसमें संसद (Parliament) और राज्य विधान निकायों (state legislative bodies) में महिलाओं को 33% आरक्षण (reservation) सुनिश्चित किया गया।

महिला सशक्तिकरण (Women empowerment) अधिक प्रासंगिक (relevant) हो जाएगा यदि महिलाएं शिक्षित (educated), बेहतर सूचित (better informed) हों और तर्कसंगत (rational) निर्णय ले सकें। अन्य लिंग (other sex) को महिलाओं के प्रति संवेदनशील (sensitize) बनाना भी आवश्यक है। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की भूमिका के संबंध में सामाजिक दृष्टिकोण (societal attitudes) और धारणाओं (perceptions) में बदलाव लाना महत्वपूर्ण है। कार्यों के पारंपरिक लिंग विशिष्ट प्रदर्शन (traditional gender specific performance) में समायोजन (Adjustments) करना होगा। समानता (equality) की चुनौतियों का सामना करने के लिए महिला का शारीरिक रूप से स्वस्थ होना जरूरी है। लेकिन अधिकांश महिलाओं विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों (rural areas) में इसका दुखद अभाव (sadly lacking) है। बुनियादी स्वास्थ्य संसाधनों (basic health resources) तक उनकी असमान पहुंच (unequal access) है।

अधिकांश महिलाएं कृषि क्षेत्र में या तो श्रमिकों (workers), घरेलू खेतों (household farms) या मजदूरी करने वालों (wageworkers) के रूप में काम करती हैं। फिर भी यह ठीक कृषि में आजीविका (livelihood) है जो हाल के वर्षों में अधिक अस्थिर (volatile) और असुरक्षित (insecure) हो गई है और महिला कृषकों (women cultivators) पर इसलिए नकारात्मक प्रभाव (negatively affected) पड़ा है। गरीबी (poverty) को कम करने减 (poverty) को कम करने के लिए सरकार की नीतियां कोई भी वांछनीय परिणाम (desirable results) देने में विफल (failed) रही हैं, क्योंकि महिलाओं को उनके श्रम के लिए उचित मजदूरी (appropriate wages) नहीं मिलती है। घर के भीतर महत्वपूर्ण मात्रा में अवैतनिक (unpaid) या गैर-विपणन (non-marketed) श्रम भी है। शहरी क्षेत्रों में मजदूरी में लैंगिक असमानता (gender disparity) में वृद्धि भी काफी चिह्नित (marked) है क्योंकि यह विभिन्न और कम भुगतान वाली गतिविधियों (lower paying activities) में महिलाओं के रोजगार के परिणामस्वरूप होती है। विभिन्न स्तरों पर उनका शोषण (exploited) किया जाता है। उन्हें उचित मजदूरी प्रदान की जानी चाहिए और पुरुषों के समान काम करना चाहिए ताकि समाज में उनकी स्थिति को ऊपर उठाया जा सके।

इस तथ्य में कोई संदेह (doubt) नहीं है कि महिलाओं का विकास स्वतंत्रता (Independence) के बाद से ही योजना का केंद्रीय फोकस (central focus) रहा है। सशक्तिकरण (Empowerment) इस दिशा में एक बड़ा कदम है लेकिन इसे एक संबंधपरक संदर्भ (relational context) में देखा जाना चाहिए। सरकार और महिलाओं दोनों से महिलाओं की मुक्ति (emancipation) के मार्ग की बाधाओं (obstacles) को दूर करने के लिए एक स्पष्ट दृष्टि (clear vision) की आवश्यकता है। भारतीय महिलाओं के प्रत्येक वर्ग को उनका उचित हिस्सा देकर उनके सर्वांगीण विकास (all round development) की दिशा में प्रयास किए जाने चाहिए।

अस्वीकरण (Disclaimer):
यह स्टडी मटेरियल ICAR के मूल कंटेंट का हिंदी अनुवाद है। हम इसकी पूर्ण सटीकता के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। यह फाइल अभी केवल सुधार और परीक्षण (Improvement Purpose) के लिए यहाँ उपलब्ध कराई गई है। बहुत जल्द हम इसे डाउनलोड करने के लिए PDF फॉर्मेट में अपडेट करेंगे।

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