विश्व और भारत में कृषि विकास का इतिहास। कृषि विरासत - प्राचीन भारत में कृषि

विश्व और भारत में कृषि विकास का इतिहास (History of agricultural development in the world and India)

कृपया व्याख्यान 1 (Lecture 1) के सिद्धांत नोट्स (theory notes) देखें।

कृषि विरासत (Agriculture heritage)

भारत में कृषि विरासत (Agriculture Heritage in India)

भारत में कृषि हाल ही की उत्पत्ति (recent origin) नहीं है, बल्कि इसका एक लंबा इतिहास है जो 7500-6500 ईसा पूर्व के नवपाषाण युग (Neolithic age) का है। इसने प्रारंभिक मानव की जीवन शैली (life style) को 'जंगली जामुन और जड़ों के खानाबदोश शिकारी' (nomadic hunter of wild berries and roots) से 'भूमि के कृषक' (cultivator of land) में बदल दिया। महान संतों के ज्ञान (wisdom) और शिक्षाओं से कृषि को लाभ होता है। प्राप्त ज्ञान और अपनाई गई प्रथाओं (practices) को पीढ़ियों से पारित किया गया है। पारंपरिक किसानों (traditional farmers) ने मिश्रित खेती (mixed farming), मिश्रित फसल (mixed cropping), फसल चक्र (crop rotation) आदि जैसी प्रकृति के अनुकूल (nature friendly) कृषि प्रणाली और प्रथाएं विकसित की हैं। प्राचीन भारत के महान महाकाव्य (epics) भारत के किसानों की पुरानी पीढ़ियों के पास ज्ञान की गहराई को व्यक्त करते हैं। आधुनिक समाज ने पारंपरिक ज्ञान के महत्व को खो दिया है जो अनुभव की पीढ़ियों के माध्यम से शोधन की प्रक्रिया (process of refinement) के अधीन था। अपने कृषि कार्यों में पारंपरिक किसानों द्वारा दिखाए गए पारिस्थितिक विचार (ecological considerations) आजकल जैविक कृषि (organic agriculture) के पुनरुत्थान (resurgence) में परिलक्षित (reflected) होते हैं।

उपलब्ध प्राचीन साहित्य में चार वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद), उन्नीस ब्राह्मण (कुल 19 ब्राह्मण कम से कम अपनी संपूर्णता में मौजूद हैं: दो ऋग्वेद से जुड़े हैं, छह यजुर्वेद के साथ, दस सामवेद के साथ और एक अथर्ववेद के साथ।), आरण्यक (Aranyakas), सूत्र साहित्य (Sutra literature), सुश्रुत संहिता (Susruta Samhita), चरक संहिता (Charaka Samhita), उपनिषद (Upanishads), महाकाव्य रामायण (Ramayana) और महाभारत (Mahabharata), पुराण (Puranas - 20), बौद्ध (Buddhist) और जैन साहित्य (Jain literature), और कृषि-पराशर (Krishi-Parashara), कौटिल्य का अर्थशास्त्र (Kautilya’s Arthasastra), पाणिनि का अष्टाध्यायी (Panini’s Ashtadhyayi), तमिलों का संगम साहित्य (Sangam literature), मनुस्मृति (कानून - Manusmirti), वराहमिहिर की बृहत् संहिता (गणित और ज्योतिष - Varahamihira’s Brihat Samhita), अमरकोश (Amarkosha), कश्यपीय-कृषिसूक्ति (Kashyapiya-Krishisukti) और सुरपाल का वृक्षायुर्वेद (Surapala’s Vriskshayurveda) जैसे ग्रंथ शामिल हैं। इस साहित्य की रचना 6000 ईसा पूर्व (BC) से 1000 ईस्वी (AD) के बीच होने की सबसे अधिक संभावना है। जैव विविधता (biodiversity) और कृषि (पशुपालन सहित) से संबंधित जानकारी इन ग्रंथों में उपलब्ध है।

ऋग्वेद (Rigveda) भारत का सबसे प्राचीन साहित्यिक ग्रंथ (literary work) है। इसका मानना था कि कृषकों (agriculturists) में देवता (Gods) सबसे आगे थे। अमरकोश (जैन या बौद्ध विद्वान अमरसिम्हा - Amarasimha द्वारा लिखित संस्कृत का एक थिसॉरस - thesaurus) के अनुसार, आर्य (Aryans) कृषक थे। मनु (Manu) और कौटिल्य (Kautilya) ने कृषि, पशुपालन (cattle rearing) और वाणिज्य (commerce) को आवश्यक विषयों (essential subjects) के रूप में निर्धारित किया, जिन्हें राजा को सीखना चाहिए। पतंजलि (Patanjali - योग सूत्रों के संकलक) के अनुसार देश की अर्थव्यवस्था कृषि और पशु-प्रजनन (cattle-breeding) पर निर्भर थी। 'पुराणों' में बहुत सारी जानकारी उपलब्ध है, जिससे पता चलता है कि प्राचीन भारतीयों को सभी कृषि कार्यों (agricultural operations) का गहरा ज्ञान था। भारत के कुछ प्रसिद्ध प्राचीन क्लासिक्स हैं, कौटिल्य का 'अर्थशास्त्र'; पाणिनि का 'अष्टाध्यायी'; पतंजलि का 'महाभाष्य' (Mahabhasya); वराहमिहिर की 'बृहत् संहिता'; अमरसिम्हा का 'अमरकोश' और मानसोल्लास (Manasollasa) के विश्वकोश संबंधी कार्य (Encyclopaedic works)। ये क्लासिक्स प्राचीन काल के लोगों के ज्ञान और बुद्धिमत्ता (wisdom) की गवाही (testify) देते हैं। 1000 ईस्वी में विशेष रूप से कृषि से संबंधित तकनीकी पुस्तकें ऋषि पराशर की 'कृषिपराशर' (Krishiparashara) थीं। अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथ अग्नि पुराण (Agni Purana) और कश्यप (500 ईस्वी) के लिए जिम्मेदार कृषि सूक्ति (Krishi Sukti) हैं। प्राचीन तमिल और कन्नड़ कार्यों में प्राचीन भारत में कृषि पर बहुत सारी उपयोगी जानकारी है। भारत में कृषि ने भेड़ (sheep) और बकरियों (goats), गायों और भैंसों (buffaloes), पेड़ों और झाड़ियों (shrubs), मसालों (spices) और मसालों (condiments), भोजन और गैर-खाद्य फसलों, फलों और सब्जियों के पालन में जबरदस्त प्रगति की और प्रकृति के अनुकूल कृषि प्रथाओं को विकसित किया। इन प्रथाओं के सामाजिक और धार्मिक स्वर (social and religious undertones) थे और ये लोगों के जीवन का तरीका बन गए। घरेलू संस्कार (Domestic rites) और त्यौहार अक्सर जुताई (ploughing), बुवाई (sowing), कटाई (reaping) और फसल (harvesting) के चार मुख्य कृषि कार्यों के साथ तालमेल (synchronised) बिठाते थे।

ऋग्वेद में, सैकड़ों और हजारों गायों का संदर्भ है; रथों (chariots) में जुते हुए घोड़ों का; दौड़ के मैदानों (race courses) का जहां रथ दौड़ आयोजित की जाती थी; रथों में जुते ऊंटों का; बलि के शिकार (sacrificial victims) के रूप में दी जाने वाली भेड़ और बकरियों का, और कपड़ों के लिए ऊन (wool) के उपयोग का। प्रसिद्ध काऊ सूक्त (Cow Sukta) इंगित करता है कि गाय पहले से ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था का बहुत आधार बन गई थी। एक अन्य सूक्त में, उसे वासु (Vasus), रुद्र (Rudras) और आदित्य (Adityas) की मां के रूप में परिभाषित किया गया है, साथ ही साथ अमरता की धुरी (pivot of Immortality) के रूप में भी। ऐसा प्रतीत होता है कि वैदिक आर्यों (Vedic Aryans) के पास लकड़ी (timber) प्राप्त करने के लिए बड़े जंगल थे, और औषधीय प्रयोजनों (medicinal purposes) के लिए पौधों और जड़ी-बूटियों (herbs) को युग के चिकित्सकों (physicians) द्वारा पाला गया प्रतीत होता है, जैसा कि अथर्ववेद (Atharva Veda) में दिखाई देता है। किसानों के पेशे (vocation) को उच्च सम्मान में रखा जाता था, हालांकि कृषि पूरी तरह से बारिश के देवता पर्जन्य (Parjanya) की कृपा (favours) पर निर्भर थी। उनके गर्जन (thunders) को भोजन लाने वाले (food-bringing) के रूप में वर्णित किया गया है।

चार वेद 75 से अधिक पौधों की प्रजातियों (plant species) का उल्लेख करते हैं, शतपथ ब्राह्मण (Satapatha Bhrahamna) 25 से अधिक प्रजातियों का उल्लेख करते हैं, और चरक संहिता (300 ईसा पूर्व) एक आयुर्वेदिक (Aayurvedic - भारतीय चिकित्सा) ग्रंथ (treatise) 320 से अधिक पौधों का उल्लेख करता है। सुश्रुत (400 ईसा पूर्व) 750 से अधिक औषधीय पौधों (medicinal plant) की प्रजातियों का रिकॉर्ड रखता है। सबसे पुरानी पुस्तक, ऋग्वेद (4000 ईसा पूर्व) बड़ी संख्या में जहरीले (poisonous) और गैर-जहरीले जलीय (aquatic) और स्थलीय (terrestrial), और घरेलू और जंगली जीवों (wild creatures) और जानवरों का उल्लेख करती है। पुराण लगभग 500 पौधों की प्रजातियों का उल्लेख करते हैं। वृक्ष-बागवानी (arbori-horticulture) का विज्ञान अच्छी तरह से विकसित हुआ था और सुरपाल के वृक्षायुर्वेद (Vrikshayurveda) में प्रलेखित (documented) किया गया है। प्राचीन काल में जंगल बहुत महत्वपूर्ण थे। वेदों के युग से, पारिस्थितिक संतुलन (ecological balance) के लिए वनों के संरक्षण (protection) पर जोर दिया गया था। कौटिल्य अपने अर्थशास्त्र (321-296 ईसा पूर्व) में उल्लेख करते हैं कि वनों के अधीक्षक (superintendent of forests) को वन रक्षकों (forest guards) के माध्यम से वन उपज (forest produce) एकत्र करनी होती थी। वह इस अधिकारी के अधिकार क्षेत्र (purview) में आने वाले पेड़ों, बांसों (bamboos), लताओं (creepers), रेशेदार पौधों (fibrous plants), दवाओं और जहरों (drugs and poisons), विभिन्न जानवरों की खाल (skins) आदि की किस्मों की एक लंबी सूची प्रदान करता है।

मनु (मनुस्मृति, दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व) के अनुसार जंगली जानवरों (wild animals) के संरक्षण (preservation) को प्रोत्साहित किया गया था और एक खेल के रूप में शिकार (hunting) को शासक के चरित्र (character) और व्यक्तित्व (personality) के उचित विकास के लिए हानिकारक (detrimental) माना जाता था। विशेष रूप से, पुराणों (300-750 ईस्वी) में घोड़ों पर शालिहोत्र (Shalihotra) और हाथियों पर पालकाप्य (Palakapya) के नाम पशुपालन (animal husbandry) में विशेषज्ञों के रूप में पाए गए हैं। उदाहरण के लिए, गरुड़पुराण (Garudapurana) पशु विकारों (animal disorders) के उपचार से संबंधित एक पाठ है जबकि घोड़ों के उपचार पर शास्त्रीय कार्य (classical work) अश्वशास्त्र (Aswashastra) है। अग्निपुराण का एक अध्याय पशुओं (livestock) के उपचार से और दूसरा पेड़ों के उपचार से संबंधित है।

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