भारत में कृषि प्रौद्योगिकी विकास का कालक्रम (Chronology of Agricultural technology development in India)
भारत की स्वतंत्रता (independence) से पहले भारत में कृषि को मोटे तौर पर पांच अलग-अलग कालखंडों (periods) में वर्गीकृत (classified) किया गया है।
- प्रारंभिक इतिहास (Early history) - (15000 ईसा पूर्व से पहले)
- वैदिक काल - उत्तर महाजनपद काल (Vedic period – Post Maha Janapadas period) - (1500 ईसा पूर्व - 200 ईस्वी)
- प्रारंभिक सामान्य युग - उच्च मध्य युग (Early Common Era – High Middle Ages) - (200-1200 ईस्वी)
- उत्तर मध्य युग - प्रारंभिक आधुनिक युग (Late Middle Ages – Early Modern Era) - (1200-1757 ईस्वी)
- औपनिवेशिक ब्रिटिश युग (Colonial British Era) - (1757-1947 ईस्वी)
[नोट: ईसा पूर्व (BCE) - "कॉमन एरा से पहले" (Before the Common Era), "ईसाई एरा से पहले" (Before the Christian Era), या "वर्तमान एरा से पहले" (Before the Current Era) के लिए संक्षिप्त। ईस्वी (CE) - कॉमन एरा, करंट एरा (ईसाई एरा हालांकि, एनो डोमिनी - Anno Domini के लिए भी संक्षिप्त एडी - AD है)]
पौधों की प्रारंभिक खेती (early cultivation) और फसलों और जानवरों के पालतू बनाने (domestication) के परिणामस्वरूप भारत में कृषि 9000 ईसा पूर्व शुरू हुई। कृषि के लिए विकसित किए जा रहे उपकरणों (implements) और तकनीकों के साथ जल्द ही बसा हुआ जीवन (Settled life) शुरू हो गया। दोहरे मानसून (Double monsoons) के कारण एक वर्ष में दो फसलें (harvests) काटी जाती थीं। मौजूदा व्यापारिक नेटवर्क (trading networks) के माध्यम से भारतीय उत्पाद जल्द ही दुनिया तक पहुंच गए और विदेशी फसलें भारत में पेश की गईं। भारतीय लोग पौधों और जानवरों को अपने अस्तित्व (survival) के लिए आवश्यक मानते थे, इसलिए वे उनकी पूजा और वंदना (venerated) करने लगे।
मध्य युग में भारत में सिंचाई चैनलों (irrigation channels) को परिष्कार (sophistication) के एक नए स्तर तक पहुंचते देखा गया और इस्लामी संरक्षण (Islamic patronage) के तहत दुनिया के अन्य क्षेत्रों की अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करने वाली भारतीय फसलें देखी गईं। समान विकास (uniform growth) प्रदान करने के उद्देश्य से भूमि और जल प्रबंधन (Land and water management) प्रणाली विकसित की गई थी। बाद के आधुनिक युग के दौरान कुछ ठहराव (stagnation) के बावजूद भारत का स्वतंत्र गणराज्य (independent Republic of India) एक व्यापक कृषि कार्यक्रम (comprehensive agricultural program) विकसित करने में सक्षम था।
1. प्रारंभिक इतिहास (Early history - 1500 ईसा पूर्व से पहले)
- 9000 ईसा पूर्व: भारतीय उपमहाद्वीप में गेहूं और जौ (barley) को पालतू (domesticated) बनाया गया था। इसके तुरंत बाद घोड़े, भेड़ और बकरी को पालतू बनाया गया। इस अवधि में हाथी का पहला पालतूकरण भी देखा गया।
- 8000-6000 ईसा पूर्व: मवेशियों, मुख्य रूप से भेड़ और बकरी के पालतू बनाने के साथ-साथ जौ और गेहूं की खेती मेहरगढ़ (Mehrgarh - बलूचिस्तान, अब पाकिस्तान में) में दिखाई दे रही थी। भारत में कृषि देहातीवाद (Agro pastoralism) में थ्रेसिंग (threshing), फसलों को दो या छह की पंक्तियों में लगाना और अन्न भंडार (granaries) में अनाज का भंडारण शामिल था।
- 5000 ईसा पूर्व: कश्मीर में कृषि समुदाय व्यापक (widespread) हो गए।
- 5000-4000 ईसा पूर्व: कपास (Cotton) की खेती की जाती थी। सिंधु कपास उद्योग (Indus cotton industry) अच्छी तरह से विकसित था और कपास कताई (cotton spinning) और निर्माण (fabrication) में उपयोग किए जाने वाले कुछ तरीकों का भारत के आधुनिक औद्योगीकरण (Industrialization) तक अभ्यास किया जाता रहा। आम (mango) और खरबूजे (muskmelon) जैसे विभिन्न प्रकार के उष्णकटिबंधीय फल (tropical fruit) भारतीय उप-महाद्वीप के मूल निवासी हैं। भारतीयों ने भांग (hemp) को भी पालतू बनाया, जिसका उपयोग वे नशीले पदार्थों (narcotics), फाइबर और तेल बनाने सहित कई अनुप्रयोगों (applications) के लिए करते थे। सिंधु घाटी के किसानों ने मटर (peas), तिल (sesame) और खजूर (dates) उगाई। गन्ना मूल रूप से उष्णकटिबंधीय दक्षिण एशिया (tropical South Asia) और दक्षिण पूर्व एशिया का था। संभवतः विभिन्न प्रजातियों (species) की उत्पत्ति भारत में एस. बार्बेरी (S. barberi) के साथ और न्यू गिनी (New Guinea) से आने वाले एस. एडुल (S. edule) और एस. ऑफिसिनारम (S. officinarum) के साथ अलग-अलग स्थानों पर हुई है।
- 5440 ईसा पूर्व: उत्तरी भारत के बेलन (Belan) और गंगा घाटी क्षेत्रों में जंगली ओरिज़ा चावल (Wild Oryza rice) दिखाई दिया। सिंधु घाटी सभ्यता में चावल की खेती की जाती थी।
- 4500 ईसा पूर्व: सिंधु घाटी सभ्यता में सिंचाई का विकास किया गया था। इस नवाचार (innovation) के परिणामस्वरूप सिंधु सभ्यता के आकार और समृद्धि (prosperity) में वृद्धि हुई, जिसके कारण अंततः जल निकासी (drainage) का उपयोग करते हुए अधिक नियोजित बस्तियां (planned settlements) बनीं।
- 3000 ईसा पूर्व: सिंधु घाटी सभ्यता द्वारा गिरनार (Girnar) में कृत्रिम जलाशयों (artificial reservoirs) सहित परिष्कृत सिंचाई (Sophisticated irrigation) और जल भंडारण प्रणालियां (water storage systems) विकसित की गईं।
- 2600 ईसा पूर्व: लगभग (Circa) से एक प्रारंभिक नहर सिंचाई प्रणाली (early canal irrigation system)।
- 2500 ईसा पूर्व: सिंधु घाटी सभ्यता में जानवरों द्वारा खींचे जाने वाले हल (animal-drawn plough) के पुरातात्विक प्रमाण (Archeological evidence)।
- 2000 ईसा पूर्व: कृषि गतिविधियों में कश्मीर और हड़प्पा (Harrappan) क्षेत्रों में चावल की खेती शामिल थी।
2. वैदिक काल - उत्तर महाजनपद काल (Vedic period-Post Maha Janapadas period - 1500 ईसा पूर्व - 200 ईस्वी)
- गुप्ता (Gupta - 2004) को लगता है कि ग्रीष्मकालीन मानसून (summer monsoons) अधिक लंबा रहा होगा और सामान्य खाद्य उत्पादन (food production) के लिए आवश्यक से अधिक नमी (moisture) हो सकती है। इस अत्यधिक नमी का एक प्रभाव सर्दियों की फसलों (winter crops) के लिए आवश्यक सर्दियों के मानसून की वर्षा (winter monsoon rainfall) में सहायता करना रहा होगा।
- भारत में, गेहूं और जौ दोनों को रबी (Rabi - सर्दी) की फसल माना जाता है और दुनिया के अन्य हिस्सों की तरह - सिंचाई व्यापक (widespread) होने से पहले काफी हद तक सर्दियों के मानसून पर निर्भर रहे होंगे। अत्यधिक नमी के परिणामस्वरूप संभवतः खरीफ (Kharif) फसलों के विकास को नुकसान (suffered) हुआ होगा।
- जूट (Jute) की खेती सबसे पहले भारत में की जाती थी, जहां इसका उपयोग रस्सी (ropes) और रस्सियाँ (cordage) बनाने के लिए किया जाता था।
- कुछ जानवर - जिन्हें भारतीय अपने अस्तित्व (survival) के लिए महत्वपूर्ण (vital) मानते थे - की पूजा की जाने लगी।
- पेड़ों को भी पालतू बनाया गया, पूजा की गई और वंदना की गई - विशेष रूप से पीपल (Pipal) और बरगद (Banyan)।
- अन्य को उनके औषधीय उपयोगों (medicinal uses) के लिए जाना जाने लगा और समग्र चिकित्सा प्रणाली (holistic medical system) आयुर्वेद (Ayurveda) में इसका उल्लेख मिला।
- 1000-500 ईसा पूर्व: लोहे के बार-बार संदर्भ (references) मिलते हैं। अनाज, सब्जियों और फलों की एक विस्तृत श्रृंखला (wide range) की खेती का वर्णन किया गया है। मांस और दूध उत्पाद आहार (diet) का हिस्सा थे; पशुपालन महत्वपूर्ण था। मिट्टी को कई बार जोता (ploughed) गया। बीज का छिड़काव (broadcasted) किया गया था। परती (Fallowing) और फसल के एक निश्चित क्रम (sequence of cropping) की सिफारिश (recommended) की गई थी। गाय के गोबर (Cow dung) से खाद मिलती थी। सिंचाई का अभ्यास किया गया था।
- 322-185 ईसा पूर्व: मौर्य साम्राज्य (Mauryan Empire) ने मिट्टी (soils) को वर्गीकृत किया और कृषि उपयोग के लिए मौसम संबंधी अवलोकन (meteorological observations) किए। अन्य मौर्य सुविधाओं (facilitation) में बांधों (dams) का निर्माण और रखरखाव, और घोड़े द्वारा खींचे जाने वाले रथों (horse-drawn chariots) का प्रावधान शामिल था - पारंपरिक बैलगाड़ियों (bullock carts) की तुलना में तेज।
- 300 ईसा पूर्व: ग्रीक राजनयिक (diplomat) मेगास्थनीज (Megasthenes) ने अपनी पुस्तक इंडिका (Indika) में - भारतीय कृषि का धर्मनिरपेक्ष चश्मदीद विवरण (secular eyewitness account) प्रदान किया है।
3. प्रारंभिक सामान्य युग - उच्च मध्य युग (Early Common Era – High middle ages - 200-1200 ईस्वी)
- तमिल लोगों ने चावल, गन्ना, बाजरा (millets), काली मिर्च, विभिन्न अनाज, नारियल, बीन्स, कपास, केला (plantain), इमली (tamarind) और चंदन (sandalwood) जैसी फसलों की एक विस्तृत श्रृंखला की खेती की। कटहल (Jackfruit), नारियल, ताड़, सुपारी (areca) और केले (plantain) के पेड़ भी ज्ञात थे।
- निरंतर कृषि (sustained agriculture) के लिए व्यवस्थित जुताई (Systematic ploughing), खाद डालना, निराई (weeding), सिंचाई और फसल सुरक्षा का अभ्यास किया गया था। इस अवधि के दौरान जल भंडारण प्रणाली डिजाइन की गई थी।
- कल्लनई (Kallanai - पहली-दूसरी शताब्दी ईस्वी), इस अवधि के दौरान कावेरी नदी पर बना एक बांध, दुनिया की सबसे पुरानी जल-नियमन संरचनाओं (oldest water-regulation structures) में से एक माना जाता है जो अभी भी उपयोग में है।
- भारत के मूल मसालों - जिसमें दालचीनी (cinnamon) और काली मिर्च शामिल हैं - से जुड़े मसाला व्यापार (Spice trade) ने गति पकड़ी क्योंकि भारत ने भूमध्यसागर (Mediterranean) में मसालों की शिपिंग शुरू कर दी थी।
- पुरातात्विक रिकॉर्ड (archaeological record) और पेरिप्लस ऑफ एरिथ्रियन सागर (Periplus of the Erythraean Sea) द्वारा विस्तृत (detailed) रूप से भारत के साथ रोमन व्यापार का पालन किया गया।
- चीनी रेशम उत्पादन (Chinese sericulture) ने प्रारंभिक सामान्य युग (Common Era) की सदियों के दौरान भारतीय नाविकों को आकर्षित किया।
- रामपुर से सतलुज घाटी (Sutlej Valley from Rampur) लगभग 1857
- 320-550 ईस्वी: गुप्तों के समय तक क्रिस्टलीकृत चीनी (Crystallized sugar) की खोज की गई थी और चीनी (candied sugar) का सबसे पहला संदर्भ भारत से आता है।
- 647 ईस्वी: चीनी दस्तावेज़ (documents) कम से कम दो मिशनों (missions) की पुष्टि करते हैं जो भारत में चीनी-शोधन (sugar-refining) के लिए प्रौद्योगिकी प्राप्त करने के लिए शुरू किए गए थे।
- 875-1279 ईस्वी: चोल साम्राज्य के दौरान दक्षिण भारत में कृषि समाज (agrarian society) के नोबोरू करशिमा (Noboru Karashima) के शोध से पता चलता है कि चोल शासन के दौरान भूमि हस्तांतरित (transferred) की गई थी और लोगों के एक समूह द्वारा भूमि के सामूहिक धारण (collective holding) ने धीरे-धीरे भूमि के व्यक्तिगत भूखंडों (individual plots) को रास्ता दे दिया, जिनमें से प्रत्येक की अपनी सिंचाई प्रणाली थी।
- कृषि संपत्ति (farming property) के व्यक्तिगत स्वभाव (individual disposition) के बढ़ने से सूखी खेती (dry cultivation) वाले क्षेत्रों में कमी आ सकती है।
- चोलों के पास नौकरशाह (bureaucrats) भी थे जो पानी के वितरण (distribution) की देखरेख करते थे - विशेष रूप से टैंक-और-चैनल नेटवर्क (tank-and-channel networks) द्वारा सूखे क्षेत्रों (drier areas) में पानी का वितरण।
4. उत्तर मध्य युग - प्रारंभिक आधुनिक युग (Late middle ages – Early modern era - 1200-1757 ईस्वी)
- अरबी (Arabic) और फारसी (Persian) कार्यों में भारत में जल कार्यों (water works) के निर्माण और जल प्रौद्योगिकी के पहलुओं का वर्णन किया गया है। भारतीय और फारसी सिंचाई प्रौद्योगिकियों के प्रसार (diffusion) ने सिंचाई प्रणालियों को जन्म दिया जिससे आर्थिक विकास और भौतिक संस्कृति (material culture) का विकास हुआ।
- कृषि 'क्षेत्रों' ('zones') को मोटे तौर पर चावल, गेहूं या बाजरा (millets) उत्पादक क्षेत्रों में विभाजित किया गया था।
- गुजरात में चावल का उत्पादन हावी (dominate) रहा और उत्तर और मध्य भारत में गेहूं का दबदबा रहा।
- एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका (Encyclopædia Britannica) इस व्यापक वैश्विक प्रवचन (extensive global discourse) की अवधि के दौरान भारत में पेश की गई कई फसलों का विवरण देता है।
- 1556-1605 ईस्वी: महान अकबर (Akbar the Great) के शासनकाल (regime) के दौरान भूमि प्रबंधन विशेष रूप से मजबूत था, जिसके तहत विद्वान-नौकरशाह टोडरमल (scholar-bureaucrat Todarmal) ने तर्कसंगत आधार (rational basis) पर कृषि प्रबंधन (agricultural management) के विस्तृत तरीके तैयार किए और लागू किए।
- भारतीय फसलें - जैसे कपास, चीनी और खट्टे फल (citric fruits) - पूरे उत्तरी अफ्रीका, इस्लामी स्पेन और मध्य पूर्व में स्पष्ट रूप से (visibly) फैलीं।
- यद्यपि वे भारत में इस्लाम के सुदृढ़ीकरण (solidification) से पहले खेती में रहे होंगे, लेकिन इस हालिया लहर के परिणामस्वरूप उनके उत्पादन में और सुधार हुआ, जिसके कारण शामिल क्षेत्रों के लिए दूरगामी (far-reaching) आर्थिक परिणाम सामने आए। [9]
5. औपनिवेशिक ब्रिटिश युग (Colonial British Era - 1757-1947 ईस्वी)
- सतलज नदी (Sutlej river) पर कई सिंचाई नहरें (irrigation canals) स्थित हैं।
- भारत में ब्रिटिश राज (British Raj) के तहत कुछ भारतीय व्यावसायिक फसलें (commercial crops) - जैसे कपास, इंडिगो (indigo), अफीम (opium) और चावल - वैश्विक बाजार (global market) में पहुंच गईं।
- 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध (second half) में खेती के तहत भूमि में कुछ वृद्धि देखी गई और 19वीं शताब्दी के अंत तक कृषि उत्पादन में प्रति वर्ष लगभग 1% की औसत दर (average rate) से विस्तार हुआ।
- नहर नेटवर्क (canal networks) द्वारा व्यापक सिंचाई के कारण पंजाब, नर्मदा घाटी और आंध्र प्रदेश कृषि सुधारों (agrarian reforms) के केंद्र बन गए।
- भारत में ब्रिटिश शासन ने सिंचाई कार्यों (irrigation works) की आपूर्ति (supply) की, लेकिन शायद ही कभी आवश्यक पैमाने (scale) पर।
- सिंचाई के लिए बाजार विकसित होने के कारण सामुदायिक प्रयास (Community effort) और निजी निवेश (private investment) में वृद्धि हुई।
- 1870-1920 के बीच कुछ वस्तुओं के कृषि मूल्य (Agricultural prices) लगभग तीन गुना बढ़ गए।
- प्रारंभिक ब्रिटिश युग में भारतीय कृषि की स्थिति का एक समृद्ध स्रोत (rich source) लगभग 1774 में एक ब्रिटिश इंजीनियर थॉमस बर्नार्ड (Thomas Barnard) और उनके भारतीय मार्गदर्शक, राजा चेंगल्वराय मुदलियार (Raja Chengalvaraya Mudaliar) द्वारा तैयार की गई एक रिपोर्ट है। इस रिपोर्ट में 1762 से 1766 के वर्षों में चेन्नई के आसपास के क्षेत्र के लगभग 800 गांवों में कृषि उत्पादन के आंकड़े हैं। यह रिपोर्ट तंजावुर तमिल विश्वविद्यालय (Thanjavur Tamil University) में ताड़ के पत्तों की पांडुलिपियों (palm leaf manuscripts) के रूप में तमिल में और तमिलनाडु राज्य अभिलेखागार (Tamil Nadu State Archives) में अंग्रेजी में उपलब्ध है।
- 1871: भारत सरकार ने राजस्व, कृषि और वाणिज्य विभाग (Department of Revenue, Agriculture and Commerce) बनाया जो भारत में कृषि की शुरुआत के आधार के रूप में बना।
- 1880: अकाल आयोग (Famine Commission) की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई जो कृषि विभाग (Agricultural Department) की शुरुआत का आधार थी।
- 1881: अकाल राहत कार्यों (Famine relief operations) के लिए केंद्र में कृषि का अलग विभाग।
- 1890: डॉ. जे.ए. वोएल्कर (Dr. J.A. Voelcker) को रॉयल एग्रीकल्चरल सोसाइटी (Royal Agricultural Society - इंग्लैंड) से एक सलाहकार रसायनज्ञ (consulting chemist) के रूप में नियुक्त किया गया - भारत में कृषि अनुसंधान (agricultural research) की नींव रखी।
- 1892-1903: इंपीरियल एग्रीकल्चरल केमिस्ट (Imperial Agricultural Chemist), इंपीरियल माइकोलॉजिस्ट (Imperial Mycologist) और इंपीरियल एंटोमोलॉजिस्ट (Imperial Entomologist) की नियुक्ति - कृषि में वैज्ञानिक को शामिल करने की शुरुआत का आधार।
- 1901-05: कृषि शिक्षा (agricultural education) को बढ़ाने के लिए, पुणे, कानपुर, साबौर, नागपुर, कोयंबटूर और लायलपुर (अब पाकिस्तान में) में कृषि महाविद्यालयों (Agricultural Colleges) की स्थापना।
- 1905: पूसा (बिहार) में इंपीरियल एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट (IARI) की स्थापना।
- 1929: कृषि पर रॉयल कमीशन (Royal Commission on Agriculture - 1928) की सिफारिश के आधार पर, व्यापक अनुसंधान (comprehensive research) करने के लिए इंपीरियल काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (ICAR) की स्थापना की गई थी।
- 1931-47: विभिन्न फसलों में अनुसंधान में सुधार के लिए भारतीय लाख उपकर समिति (Indian Lac Cess Committee), भारतीय केंद्रीय तंबाकू समिति (Indian Central Tobacco Committee), भारतीय केंद्रीय तिलहन समिति (Indian Central Oilseeds Committee) का गठन किया गया।
भारत गणराज्य (Republic of India - 1947 ईस्वी के बाद से)
- खाद्य और नकदी फसलों (cash crops) की आपूर्ति में सुधार के लिए विशेष कार्यक्रम (Special programs) शुरू किए गए।
- अधिक भोजन उगाओ अभियान (Grow More Food Campaign - 1940 के दशक) और एकीकृत उत्पादन कार्यक्रम (Integrated Production Programme - 1950 के दशक) क्रमशः खाद्य और नकदी फसलों की आपूर्ति पर केंद्रित थे।
- 1957: मक्का अनुसंधान (maize research - विशेष रूप से हेटेरोसिस - heterosis) का दोहन (exploit) करने के लिए अखिल भारतीय समन्वित मक्का सुधार परियोजना (All India Coordinated Maize Improvement Project) शुरू की गई (पहली समन्वित परियोजना - First coordinated project)।
- भारत की पंचवर्षीय योजनाएँ (Five-year plans) - कृषि विकास की ओर उन्मुख (oriented) - जल्द ही शुरू हुईं।
- 1963: भाखड़ा बांध (Bhakra Dam - 1963 में पूरा हुआ) भारत का सबसे बड़ा बांध है। CIMMYT, मैक्सिको से अर्ध बौनी गेहूं किस्मों (semi dwarf wheat varieties) का परिचय हरित क्रांति (green revolution) का आधार बना।
- 1966: ताइवान और फिलीपींस से अर्ध-बौनी चावल की किस्मों (semi-dwarf rice varieties) TN1 और IR 8 को पेश किया, क्रमशः हरित क्रांति के आधार के रूप में बनी।
- भूमि सुधार (Land reclamation), भूमि विकास, मशीनीकरण (mechanization), विद्युतीकरण (electrification), रसायनों (chemicals) का उपयोग - विशेष रूप से उर्वरक (fertilizers), और सरकारी देखरेख (government supervision) में जल्द ही कृषि उन्मुख 'पैकेज दृष्टिकोण' ('package approach') का विकास हुआ, जिसमें एकल पहलू को बढ़ावा देने के बजाय कार्यों का एक सेट लिया गया।
- 1960 के दशक के बाद से शुरू की गई कई 'उत्पादन क्रांतियों' ('production revolutions') में भारत में हरित क्रांति (Green Revolution), पीली क्रांति (Yellow Revolution - तिलहन: 1986-1990), ऑपरेशन फ्लड (Operation Flood - डेयरी: 1970-1996), और नीली क्रांति (Blue Revolution - मछली पकड़ना: 1973-2002) आदि शामिल हैं।
- 1979: एसएयू (SAUs) की अनुसंधान क्षमताओं (research capabilities) को मजबूत करने के लिए राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान परियोजना (National Agricultural Research Project - NARP) शुरू की गई थी।
- 1991 के आर्थिक सुधारों (economic reforms) के बाद, कृषि क्षेत्र में महत्वपूर्ण वृद्धि (significant growth) दर्ज की गई, जो अब तक पहले के सुधारों और कृषि-प्रसंस्करण (Agro-processing) और जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology) के नए नवाचारों (innovations) से लाभान्वित हो रही थी।
- 1998: स्थान विशिष्ट समस्याओं (location specific problems) पर शोध को मजबूत करने के लिए राष्ट्रीय कृषि प्रौद्योगिकी परियोजना (National Agricultural Technology Project - NATP) शुरू की गई थी। अनुबंध खेती (Contract farming) - जिसके लिए किसानों को अनुबंध (contract) के तहत एक कंपनी के लिए फसलों का उत्पादन करने की आवश्यकता होती है - और उच्च मूल्य वाले कृषि उत्पाद (high value agricultural product) में वृद्धि हुई।
- 2006: समस्याओं को हल करने के लिए एंड-टू-एंड दृष्टिकोण (End to end approach) के लिए राष्ट्रीय कृषि नवाचार परियोजना (National Agricultural Innovative Project - NAIP) शुरू की गई थी।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह स्टडी मटेरियल ICAR के मूल कंटेंट का हिंदी अनुवाद है। हम इसकी पूर्ण सटीकता के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। यह फाइल अभी केवल
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