06. ज्वार और बाजरा (Sorghum and Pearl Millet) - उत्पत्ति, भौगोलिक वितरण, आर्थिक महत्व, मिट्टी और जलवायु आवश्यकता, किस्में, कृषि पद्धतियां और उपज
ज्वार (Sorghum bicolor L.)
स्थानीय नाम (Vernacular Names)
ज्वार (बंगाली, गुजराती, हिंदी), जोला (कन्नड़), चोलम (मलयालम, तमिल), ज्वारी (मराठी), जन्हा (उड़िया), जोन्नालु (तेलुगु), अन्य नाम: मिलो (Milo), चरी (Chari)।
उत्पत्ति (Origin)
ज्वार की उत्पत्ति के स्थान के बारे में अलग-अलग विचार हैं। वार्थ (Warth, 1937) का विचार था कि इसकी उत्पत्ति भारत और अफ्रीका में हुई थी। डी कैन्डोल (De Candolle) ने कहा कि ज्वार की उत्पत्ति अफ्रीका में हुई थी। ऐसा माना जाता है कि इसकी उत्पत्ति उत्तर-पूर्वी अफ्रीका या एबिसिनिया (Abyssinia) से हुई और दासों (slaves) द्वारा इसे अमेरिका और यूरोपीय देशों में लाया गया।
भौगोलिक वितरण (Geographic Distribution)
यूरोप के ठंडे उत्तर-पूर्वी हिस्से को छोड़कर ज्वार दुनिया के सभी हिस्सों में उगाया जाता है। भारत में ज्वार उत्पादक क्षेत्रों (Sorghum belts) में 400-1000 मिमी वर्षा होती है। विश्व में, अफ्रीका (नाइजीरिया, सूडान) ज्वार की खेती करने वाला प्रमुख महाद्वीप है और उत्तरी अमेरिका, दक्षिण अमेरिका और एशियाई महाद्वीप भी ज्वार उगाते हैं। भारत में, मुख्य रूप से मध्य और प्रायद्वीपीय भारत (peninsular India) जैसे महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु और गुजरात ज्वार की फसल की खेती करने वाले महत्वपूर्ण राज्य हैं।
आर्थिक महत्व (Economic Importance)
ज्वार एक अनाज की फसल (cereal grain crop) है जो ज्यादातर अफ्रीका, एशिया और मध्य अमेरिका में मुख्य रूप से खाद्य असुरक्षा (food insecurity) को कम करने के लिए उगाई जाती है। यह दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अनाज की फसल है और टन भार (tonnage) के मामले में अफ्रीका की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण फसल है। ज्वार ज्यादातर अर्ध-शुष्क (semi-arid) या उप-उष्णकटिबंधीय (sub-tropical) क्षेत्रों में उगाया जाता है क्योंकि इसमें कठोर मौसम की स्थिति का प्रतिरोध करने की क्षमता होती है।
ज्वार, एक अनाज, चारा (forage) या चीनी की फसल है, जो सौर ऊर्जा (solar energy) के रूपांतरण और पानी के उपयोग में सबसे कुशल फसलों में से एक है। ज्वार को उच्च ऊर्जा, सूखा सहिष्णु (drought tolerant) फसल के रूप में जाना जाता है। इसके व्यापक उपयोग और अनुकूलन (adaptation) के कारण "ज्वार वास्तव में अपरिहार्य फसलों (indispensable crops) में से एक है" जो मानव जाति के अस्तित्व के लिए आवश्यक है।
संयुक्त राज्य अमेरिका, दक्षिण अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में ज्वार के अनाज का उपयोग मुख्य रूप से पशुओं के चारे (livestock feed) और एथेनॉल संयंत्रों (ethanol plants) की बढ़ती संख्या में किया जाता है। पशुधन बाजार (livestock market) में, ज्वार का उपयोग पोल्ट्री, गोमांस (beef) और सुअर के मांस (pork) उद्योगों में किया जाता है। तनों और पत्तियों (foliage) का उपयोग हरे चारे (green chop), सूखी घास (hay), साइलेज (silage) और चरागाह (pasture) के लिए किया जाता है।
कृषि पद्धतियां (Cultural Practices)
मौसम और किस्में (Season and Varieties)
- थाईपट्टम (जनवरी-फरवरी), चिथिरईपट्टम (अप्रैल-मई), अदिपट्टम (जून-जुलाई) और पुरातासीपट्टम (सितंबर-अक्टूबर) तमिलनाडु में ज्वार की फसल के लिए चार सामान्य मौसम हैं।
- तमिलनाडु में CO 26, CO (S) 28, CO (S) 30, BSR 1, COH 4, K tall, K 11, Paiyur 1, Paiyur 2 और APK 1 किस्मों (cultivars) का सबसे अधिक उपयोग किया जाता है।
बीजों का चयन (Selection of seeds): रोग और कीट-मुक्त खेतों से अच्छी गुणवत्ता वाले बीज एकत्र किए जाते हैं।
बीज दर (Seed rate):
- सिंचित (Irrigated): रोपित (Transplanted) - 7.5 किग्रा/हेक्टेयर; सीधी बुवाई (Direct sown) - 10 किग्रा/हेक्टेयर
- बारानी (Rainfed) (सीधी बुवाई): 15 किग्रा/हेक्टेयर
सिंचित स्थिति (irrigated condition) में ज्वार को सीधी बुवाई और रोपित फसल दोनों के रूप में उगाया जाता है।
रोपित फसल के लाभ (Advantages of transplanted crop):
- मुख्य खेत की अवधि 10 दिन कम हो जाती है।
- तना मक्खी (Shoot fly), जो पहले 3 हफ्तों के दौरान सीधी बोई गई फसलों पर हमला करती है और जिसे नियंत्रित करना मुश्किल होता है, उसे नर्सरी में ही प्रभावी और आर्थिक रूप से नियंत्रित किया जा सकता है।
- क्लोरोटिक (chlorotic) और डाउनी फफूंदी (downy mildew) के लक्षण दिखाने वाले पौधों को हटाया जा सकता है, जिससे मुख्य खेत में डाउनी फफूंदी के प्रकोप को कम किया जा सकता है।
- अनुकूलतम जनसंख्या (Optimum population) को बनाए रखा जा सकता है क्योंकि रोपाई के लिए केवल स्वस्थ पौधों का उपयोग किया जाता है।
- बीज दर को भी 2.5 किग्रा/हेक्टेयर तक कम किया जा सकता है।
रोपित ज्वार के लिए नर्सरी पद्धतियां (Nursery Practices for Transplanted Sorghum)
नर्सरी की तैयारी (Nursery preparation): एक हेक्टेयर में रोपाई के लिए पौधे उगाने के लिए, जल स्रोत के पास 7.5 सेंट (300 वर्ग मीटर) जगह चुनें जहाँ पानी जमा न हो।
नर्सरी में FYM का प्रयोग (Application of FYM to the nursery):
- 750 किलोग्राम FYM (खेत की खाद) या कम्पोस्ट डालें और बुवाई के बाद बीजों को ढकने के लिए 500 किलोग्राम कम्पोस्ट या FYM और डालें।
- बिना जुताई वाली मिट्टी पर खाद को समान रूप से फैलाएं और जुताई करके मिला लें या अंतिम जुताई से ठीक पहले डालें।
नर्सरी लगाना (Laying the nursery):
- सिंचाई के लिए भूखंडों के बीच और इकाई के चारों ओर 30 सेमी जगह के साथ 2 मीटर x 1.5 मीटर आकार की तीन अलग-अलग इकाइयाँ (units) बनाएँ।
- चैनल (channels) बनाने के लिए बीच की जगह और चारों ओर से 15 सेमी की गहराई तक मिट्टी खोदें और निकाली गई मिट्टी को क्यारी पर फैलाकर समतल करें।
बीजों का पूर्व-उपचार (Pre-treatment of seeds):
- बुवाई से 24 घंटे पहले बीजों को 2 ग्राम/किलोग्राम बीज की दर से कार्बेन्डाजिम (Carbendazim) या कैप्टान (Captan) या थीरम (Thiram) से उपचारित करें।
- चावल के मांड (rice gruel) को बाइंडर (binder) के रूप में उपयोग करके बीजों को एज़ोस्पिरिलम (Azospirillum) के तीन पैकेट (600 ग्राम)/हेक्टेयर और फॉस्फोबैक्टीरिया (phosphobacteria) के 3 पैकेट (600 ग्राम) या एज़ोफोस (Azophos) के 6 पैकेट (1200 ग्राम) से उपचारित करें।
बुवाई और बीजों को ढकना (Sowing and covering the seeds):
- क्यारी पर उंगलियों को लंबवत (vertically) घुमाकर उथली नालियाँ (rills) बनाएँ, जो 1 सेमी से अधिक गहरी न हों।
- उपचारित 7.5 किलोग्राम बीजों को क्यारियों पर समान रूप से बिखेरें (Broadcast)।
- मिट्टी के ऊपर हल्के हाथ फेरकर नालियों को समतल करके ढक दें।
जल प्रबंधन (Water management):
- प्रत्येक नर्सरी इकाई (nursery unit) में एक इनलेट (inlet) प्रदान करें।
- इनलेट के माध्यम से पानी को प्रवेश करने दें और सभी चैनलों को तब तक भरें जब तक कि उठी हुई क्यारियाँ गीली न हो जाएँ और फिर पानी बंद कर दें।
- मिट्टी के प्रकार के अनुसार सिंचाई की आवृत्ति (frequency) को समायोजित करें। यदि लाल मिट्टी है, तो 4-5 दिनों के अंतराल पर और काली मिट्टी में 5-6 दिनों का अंतराल बनाए रखना चाहिए।
नोट (NOTE): पौधों को नर्सरी में 18 दिनों से अधिक न रखें। यदि पुराने पौधों का उपयोग किया जाता है, तो स्थापना (establishment) और उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। सिंचाई के पानी की मात्रा को ठीक से समायोजित करके नर्सरी में दरारें (cracks) न पड़ने दें।
ख. मुख्य खेत की तैयारी (B. MAIN FIELD PREPARATION)
जुताई (Ploughing):
- खेत की एक या दो बार लोहे के हल से जुताई करें। ज्वार को महीन जुताई (fine tilth) की आवश्यकता नहीं होती है क्योंकि सीधी बोई जाने वाली फसल के मामले में महीन जुताई से अंकुरण (germination) और उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
- एल्फिसोल्स (Alfisols - गहरी लाल मिट्टी) में उपसतह की कठोर परत (subsoil hard pan) को तोड़ने के लिए खेत को दोनों दिशाओं में 40 सेमी की गहराई तक 0.5 मीटर के अंतराल पर चिज़लिंग (chiseling) करें, इसके बाद एक बार डिस्क हल (disc ploughing) और दो बार कल्टीवेटर की जुताई करने से ज्वार और इसके बाद आने वाली उड़द (blackgram) की फसल की उपज बढ़ाने में मदद मिलती है। मूंगफली के बाद ज्वार उगाने के मामले में भी यह सही था।
- FYM (खेत की खाद) और अनुशंसित नाइट्रोजन (N) का 100% प्रयोग भी किया जा सकता है। उपसतह की कठोर परत वाली मिट्टी में, अनुकूल भौतिक वातावरण (physical environment) बनाने के लिए फसल चक्र (cropping sequence) की शुरुआत में हर साल चिज़लिंग (chiselling) की जानी चाहिए।
FYM का प्रयोग (Application of FYM):
बिना जुते हुए खेत में 12.5 टन/हेक्टेयर FYM या कम्पोस्ट की हुई कॉयर पिथ (composted coir pith) के साथ एज़ोस्पिरिलम (Azospirillum) के 10 पैकेट (2000 ग्राम/हेक्टेयर) और फॉस्फोबैक्टीरिया के 10 पैकेट (2000 ग्राम/हेक्टेयर) या एज़ोफोस (Azophos) के 20 पैकेट (4000 ग्राम/हेक्टेयर) फैलाएं और खाद को मिट्टी में मिला दें। अनाज की उपज के साथ-साथ मिट्टी के भौतिक गुणों (physical properties) में सुधार करने के लिए 5 टन/हेक्टेयर की दर से अच्छी तरह सड़ी हुई पोल्ट्री खाद (poultry manure) डालें।
मेड़ और कुंड बनाना (Formation of ridges and furrows):
- रिजर (ridger) का उपयोग करके 6 मीटर लंबी और 45 सेमी की दूरी पर मेड़ (ridges) और कुंड (furrows) बनाएँ।
- कुंडों (furrows) के आर-पार सिंचाई चैनल बनाएँ।
- वैकल्पिक रूप से, पानी की उपलब्धता के आधार पर 10 वर्ग मीटर और 20 वर्ग मीटर आकार की क्यारियाँ (beds) बनाएँ।
उर्वरकों का प्रयोग (Application of fertilizers):
रोपित फसल (Transplanted crop):
- मिट्टी परीक्षण (soil test) की सिफारिशों के अनुसार NPK उर्वरकों का प्रयोग करें। यदि मिट्टी परीक्षण की सिफारिशें उपलब्ध नहीं हैं, तो 90 N, 45 P2O5, 45 K2O किग्रा/हेक्टेयर की सामान्य सिफारिश अपनाएँ।
- बुवाई से पहले आधार के रूप में (basal), 15 और 30 DAS (बुवाई के दिन बाद) पर 50:25:25% की दर से N डालें और P2O5 और K2O की पूरी खुराक बेसल रूप से (basally) रोपण से पहले डालें।
- मेड़ पर लगाई जाने वाली फसल के मामले में, मेड़ के ऊपर से दो तिहाई दूरी पर मेड़ के किनारे 5 सेमी गहरा कुंड खोलें और उर्वरक मिश्रण को कुंड के साथ रखें और 2 सेमी तक मिट्टी से ढक दें।
- बुवाई/रोपण से पहले एज़ोस्पिरिलम के 10 पैकेट (2 किग्रा/हेक्टेयर) और फॉस्फोबैक्टीरिया के 10 पैकेट (2000 ग्राम/हेक्टेयर) या एज़ोफोस के 20 पैकेट (4000 ग्राम/हेक्टेयर) को 25 किलोग्राम FYM + 25 किलोग्राम मिट्टी के साथ मिलाकर मिट्टी में डाला जा सकता है।
सीधी बोई जाने वाली फसल (Direct sown crop):
- उपरोक्त के अनुसार।
- दलहनी फसल (उड़द, मूंग या लोबिया) के साथ मिश्रित फसल (mixed crop) के रूप में उगाए गए ज्वार के मामले में 30 सेमी की दूरी पर 5 सेमी की गहराई तक कुंड खोलें।
- जिन दो लाइनों में ज्वार उगाया जाना है उनमें उर्वरक मिश्रण डालें और 2 सेमी तक ढक दें।
- तीसरी पंक्ति (row) छोड़ दें जिसमें दलहनी फसल उगाई जानी है और अगली दो पंक्तियों में उर्वरक मिश्रण रखें और मिट्टी से 2 सेमी तक ढक दें।
- जब एज़ोस्पिरिलम का उपयोग किया जाता है, तो सिंचित ज्वार के लिए अनुशंसित N का केवल 75% ही लागू करें।
सूक्ष्म पोषक तत्व मिश्रण का प्रयोग (Application of micronutrient mixture):
रोपित फसल (Transplanted crop):
- कृषि विभाग, तमिलनाडु द्वारा तैयार 12.5 किग्रा/हेक्टेयर सूक्ष्म पोषक तत्व मिश्रण (micronutrient mixture) को कुल 50 किलोग्राम मात्रा बनाने के लिए पर्याप्त रेत के साथ मिलाएं और मिश्रण को कुंडों (furrows) के ऊपर और मेड़ों (ridges) के ऊपरी एक तिहाई हिस्से पर डालें।
- यदि सूक्ष्म पोषक तत्व मिश्रण उपलब्ध नहीं है, तो 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट (zinc sulphate) को रेत के साथ मिलाकर कुल 50 किलोग्राम मात्रा बनाएं और कुंडों और मेड़ों के शीर्ष एक तिहाई हिस्से पर लागू करें।
सीधी बोई जाने वाली फसल (Direct sown crop):
- उपरोक्त के अनुसार।
- लोहे की कमी वाली मिट्टी के लिए 12.5 टन/हेक्टेयर FYM के साथ 50 किग्रा/हेक्टेयर FeSO4 का बेसल अनुप्रयोग (Basal application) करें।
ज्वार की बुवाई / रोपाई (Sowing / Transplanting sorghum):
रोपित फसल (Transplanted crop):
- जब पौधे 15 से 18 दिन के हो जाएं तो पौधों को उखाड़ लें।
- 40 लीटर पानी में एज़ोस्पिरिलम के 5 पैकेट (1000 ग्राम/हेक्टेयर) और फॉस्फोबैक्टीरिया के 5 पैकेट (1000 ग्राम/हेक्टेयर) या एज़ोफोस के 10 पैकेट (2000 ग्राम/हेक्टेयर) के साथ घोल (slurry) तैयार करें और पौधों की जड़ों को 15-30 मिनट तक घोल में डुबोएं और रोपाई करें।
- प्रति हिल (hill) एक पौधा लगाएं।
- पौधों को 3 से 5 सेमी की गहराई पर लगाएं।
- पौधों को मेड़ (ridge) के किनारे, मेड़ के ऊपर और नीचे से आधी दूरी पर लगाएं।
- पंक्ति (row) में पौधों के बीच 15 सेमी की दूरी बनाए रखें जो 45 सेमी की दूरी पर हों (15 पौधे/वर्ग मीटर)।
सीधी बोई जाने वाली फसल (Direct sown crop):
- ज्वार की शुद्ध फसल (pure crop) के मामले में, बीज दर 10 किग्रा/हेक्टेयर रखें।
- दलहनी फसल के साथ ज्वार की अंतर-फसल (inter crop) के मामले में, ज्वार की बीज दर 10 किग्रा/हेक्टेयर और दलहनी फसल की दर 10 किग्रा/हेक्टेयर रखें।
- ज्वार की शुद्ध फसल के मामले में, पंक्तियों (rows) में बीजों के बीच 15 सेमी की दूरी के साथ बीज बोएं जो 45 सेमी की दूरी पर हों।
- प्रति हिल (hill) एक पौधा बनाए रखें।
- यदि तना मक्खी (shootfly) का हमला होता है, तो साइड के अंकुर (side shots) हटा दें और एक स्वस्थ अंकुर (shoot) बनाए रखें।
- उन लाइनों के ऊपर बीज बोएं जहां उर्वरक रखे गए हैं।
- बीजों को 2 सेमी की गहराई पर बोएं और मिट्टी से ढक दें।
- दलहनों के साथ अंतर-फसल (intercropped) वाले ज्वार के मामले में, ज्वार की एक युग्मित पंक्ति (paired row) को दलहनों की एकल पंक्ति के साथ बारी-बारी से बोएं। ज्वार और दलहनी फसल की पंक्ति के बीच की दूरी 30 सेमी है।
- चारा लोबिया (Forage cowpea) CO 1 को ज्वार में ज्वार की युग्मित पंक्तियों के बीच चारा लोबिया की दो पंक्तियों में अंतर-फसल (inter-cropped) के रूप में उगाया जा सकता है।
खरपतवार प्रबंधन (Weed management):
- बुवाई के 3 दिन बाद 900 लीटर पानी/हेक्टेयर का उपयोग करके फ्लैट फैन नोजल (flat fan nozzle) लगे बैकपैक / नैपसैक / रॉकर स्प्रेयर (Backpack / Knapsack / Rocker sprayer) का उपयोग करके मिट्टी की सतह पर स्प्रे के रूप में उद्भव-पूर्व शाकनाशी (pre-emergence herbicide) एट्राज़िन (Atrazine) 50 WP @500 ग्राम/हेक्टेयर डालें।
- ज्वार शुरुआती चरणों में धीमी गति से बढ़ता है और खरपतवार की प्रतिस्पर्धा (weed competition) से प्रतिकूल रूप से प्रभावित होता है। इसलिए खेत को 45 दिनों तक खरपतवारों से मुक्त रखें। इसके लिए, उद्भव-पूर्व शाकनाशी के प्रयोग के बाद, बुवाई के 30-35 दिन बाद एक बार हाथ से निराई (hand weeding) की जा सकती है।
- यदि ज्वार में दलहनी फसल को अंतर-फसल के रूप में उगाना है तो एट्राज़िन (Atrazine) का उपयोग न करें।
- यदि शाकनाशियों का उपयोग नहीं किया जाता है तो रोपाई के 10वें दिन फावड़े से गुड़ाई (Hoe) और हाथ से निराई करें। रोपाई के 30-35 दिनों के बीच और यदि आवश्यक हो तो सीधी बोई गई फसल के लिए 35-40 दिनों के बीच गुड़ाई और निराई करें।
पौधों की छंटाई और गैप फिलिंग (Thinning of the seedlings and gap filling):
पौधों की छंटाई (Thin) करें और निकाले गए पौधों से खाली जगह भरें (gap fill)। बुवाई के 23वें दिन पहली बार हाथ से निराई करने के बाद पौधों के बीच 15 सेमी की दूरी बनाए रखें। लोबिया को छोड़कर सभी दलहनी फसलों के लिए दलहनी फसल को पौधों के बीच 10 सेमी की दूरी तक पतला (Thin) करें, लोबिया के लिए पौधों के बीच 20 सेमी की दूरी बनाए रखी जाती है।
जल प्रबंधन (Water management):
आमतौर पर ज्वार को बारानी फसल (rainfed crop) के रूप में उगाया जाता है। हालांकि, जब बारिश नहीं होती है, तो सिंचाई प्रदान की जानी चाहिए। फूल आने और दाना भरने (grain filling) की अवस्था के समय फसल को अधिक पानी की आवश्यकता होती है। यदि फूल आने और दाना भरने की अवस्था के समय मिट्टी में पर्याप्त नमी (moisture) नहीं है, तो तुरंत सिंचाई करनी चाहिए। किसी भी स्तर पर, पौधों को मुरझाने (wilt) नहीं देना चाहिए। खेत से अतिरिक्त वर्षा जल (excess rain water) निकालने के लिए उचित जल निकासी की स्थिति (drainage conditions) प्रदान की जानी चाहिए। ज्वार की फसल उगाने के लिए लगभग 400 मिमी पानी की आवश्यकता होती है।
नोट (NOTE): मौसम की स्थिति और बारिश होने के आधार पर सिंचाई कार्यक्रम को समायोजित (Adjust) करें।
आकस्मिक योजना (Contingent plan): यह उपलब्ध पानी से मिट्टी की नमी (soil moisture) का 75% नष्ट होने से पहले किया जाना चाहिए। तनाव के समय 3% केओलिन (Kaolin) (एक लीटर पानी में 30 ग्राम) का छिड़काव करने से इसके बुरे प्रभाव कम हो जाएंगे।
कटाई और प्रसंस्करण (Harvesting and processing):
- फसल की औसत अवधि (average duration) पर विचार करें और फसल का निरीक्षण करें। जब फसल परिपक्व (matures) हो जाती है तो पत्तियां पीली हो जाती हैं और सूखी हुई दिखाई देती हैं।
- दाने सख्त (hard) और दृढ़ (firm) हो जाते हैं। इस स्तर पर, बालियों (earheads) को अलग से काटकर फसल की कटाई करें। एक सप्ताह के बाद भूसे (straw) को काट लें, इसे सूखने दें और फिर ढेर (stack) लगा दें। लंबी किस्मों के मामले में, तने को जमीन के स्तर से 10 से 15 सेमी ऊपर काटें और बाद में बालियों को अलग करें और भूसे का ढेर लगा दें। बालियों को सुखाएं। मैकेनिकल थ्रेशर (mechanical thresher) का उपयोग करके या बालियों के ऊपर स्टोन रोलर (stone roller) चलाकर या मवेशियों (cattle) का उपयोग करके थ्रेशिंग (Thresh) करें और उपज को सुखाकर स्टोर करें।
बारानी ज्वार (RAINFED SORGHUM)
वर्षा (Rainfall): बारानी ज्वार के लिए 250-300 मिमी की औसत और अच्छी तरह से वितरित वर्षा (well distributed rainfall) इष्टतम (optimum) है।
वितरण (Distribution)
तमिलनाडु के मदुरै, डिंडीगुल, थेनी, रामनाथपुरम, तिरुनेलवेली, थूथुकुडी, विरुधुनगर, शिवगंगई, तिरुचिरापल्ली, इरोड, सलेम, नमक्कल, कोयंबटूर और धर्मपुरी जिलों में बारानी ज्वार (Rainfed sorghum) की खेती की जाती है।
मौसम (Season)
फसल को दक्षिण पश्चिम (South west) और उत्तर पूर्व (North east) मानसून के मौसम में उगाया जा सकता है बशर्ते बारिश समान रूप से वितरित हो।
खेत की तैयारी (Field preparation)
- उपरोक्त के अनुसार।
- मिट्टी की नमी को संरक्षित (conserve) करने के लिए समतल क्यारियों (flat beds) में बीज बोएं और अंतर-खेती (inter cultivation) के दौरान या बुवाई के बाद तीसरे सप्ताह के दौरान फसल की पंक्तियों के बीच कुंड (furrows) बनाएं।
बीज दर (Seed rate): 15 किग्रा/हेक्टेयर
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह स्टडी मटेरियल ICAR के मूल कंटेंट का हिंदी अनुवाद है। हम इसकी पूर्ण सटीकता के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। यह फाइल अभी केवल
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