06. ज्वार और बाजरा (Sorghum and Pearl Millet) - उत्पत्ति, भौगोलिक वितरण, आर्थिक महत्व, मिट्टी और जलवायु आवश्यकता, किस्में, कृषि पद्धतियां और उपज

ज्वार (Sorghum bicolor L.)

स्थानीय नाम

ज्वार (बंगाली, गुजराती, हिंदी), जोला (कन्नड़), चोलम (मलयालम, तमिल), ज्वारी (मराठी), जन्हा (उड़िया), जोन्नालु (तेलुगु), अन्य नाम: मिलो, चरी।

उत्पत्ति

ज्वार की उत्पत्ति के स्थान के बारे में अलग-अलग विचार हैं। वार्थ का विचार था कि इसकी उत्पत्ति भारत और अफ्रीका में हुई थी। डी कैन्डोल ने कहा कि ज्वार की उत्पत्ति अफ्रीका में हुई थी। ऐसा माना जाता है कि इसकी उत्पत्ति उत्तर-पूर्वी अफ्रीका या एबिसिनिया से हुई और दासों द्वारा इसे अमेरिका और यूरोपीय देशों में लाया गया।

भौगोलिक वितरण

यूरोप के ठंडे उत्तर-पूर्वी हिस्से को छोड़कर ज्वार दुनिया के सभी हिस्सों में उगाया जाता है। भारत में ज्वार उत्पादक क्षेत्रों (Sorghum belts) में 400-1000 मिमी वर्षा होती है। विश्व में, अफ्रीका (नाइजीरिया, सूडान) ज्वार की खेती करने वाला प्रमुख महाद्वीप है और उत्तरी अमेरिका, दक्षिण अमेरिका और एशियाई महाद्वीप भी ज्वार उगाते हैं। भारत में, मुख्य रूप से मध्य और प्रायद्वीपीय भारत जैसे महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु और गुजरात ज्वार की फसल की खेती करने वाले महत्वपूर्ण राज्य हैं।

आर्थिक महत्व

ज्वार एक अनाज की फसल है जो ज्यादातर अफ्रीका, एशिया और मध्य अमेरिका में मुख्य रूप से खाद्य असुरक्षा को कम करने के लिए उगाई जाती है। यह दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अनाज की फसल है और टन भार के मामले में अफ्रीका की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण फसल है। ज्वार ज्यादातर अर्ध-शुष्क (semi-arid) या उप-उष्णकटिबंधीय (sub-tropical) क्षेत्रों में उगाया जाता है क्योंकि इसमें कठोर मौसम की स्थिति का प्रतिरोध करने की क्षमता होती है।

ज्वार, एक अनाज, चारा या चीनी की फसल है, जो सौर ऊर्जा के रूपांतरण और पानी के उपयोग में सबसे कुशल फसलों में से एक है। ज्वार को उच्च ऊर्जा, सूखा सहिष्णु फसल कहते हैं। इसके व्यापक उपयोग और अनुकूलन के कारण "ज्वार वास्तव में अपरिहार्य फसलों (indispensable crops) में से एक है" जो मानव जाति के अस्तित्व के लिए आवश्यक है।

संयुक्त राज्य अमेरिका, दक्षिण अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में ज्वार के अनाज का उपयोग मुख्य रूप से पशुओं के चारे और एथेनॉल संयंत्रों की बढ़ती संख्या में किया जाता है। पशुधन बाजार में, ज्वार का उपयोग पोल्ट्री, गोमांस और सुअर के मांस उद्योगों में किया जाता है। तनों और पत्तियों का उपयोग हरे चारे, सूखी घास, साइलेज और चरागाह के लिए किया जाता है।

कृषि पद्धतियां

मौसम और किस्में

बीजों का चयन: रोग और कीट-मुक्त खेतों से अच्छी गुणवत्ता वाले बीज एकत्र किए जाते हैं।

बीज दर:

सिंचित स्थिति में ज्वार को सीधी बुवाई और रोपित फसल दोनों के रूप में उगाया जाता है।

रोपित फसल के लाभ:

रोपित ज्वार के लिए नर्सरी पद्धतियां (Nursery Practices for Transplanted Sorghum)

नर्सरी की तैयारी: एक हेक्टेयर में रोपाई के लिए पौधे उगाने के लिए, जल स्रोत के पास 7.5 सेंट (300 वर्ग मीटर) जगह चुनें जहाँ पानी जमा न हो।

नर्सरी में FYM का प्रयोग:

नर्सरी लगाना:

बीजों का पूर्व-उपचार (Pre-treatment of seeds):

बुवाई और बीजों को ढकना:

जल प्रबंधन:

नोट (NOTE): पौधों को नर्सरी में 18 दिनों से अधिक न रखें। यदि पुराने पौधों का उपयोग किया जाता है, तो स्थापना और उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। सिंचाई के पानी की मात्रा को ठीक से समायोजित करके नर्सरी में दरारें न पड़ने दें।

ख. मुख्य खेत की तैयारी (B. MAIN FIELD PREPARATION)

जुताई:

FYM का प्रयोग:

बिना जुते हुए खेत में 12.5 टन/हेक्टेयर FYM या कम्पोस्ट की हुई कॉयर पिथ के साथ एज़ोस्पिरिलम के 10 पैकेट (2000 ग्राम/हेक्टेयर) और फॉस्फोबैक्टीरिया के 10 पैकेट (2000 ग्राम/हेक्टेयर) या एज़ोफोस के 20 पैकेट (4000 ग्राम/हेक्टेयर) फैलाएं और खाद को मिट्टी में मिला दें। अनाज की उपज के साथ-साथ मिट्टी के भौतिक गुणों में सुधार करने के लिए 5 टन/हेक्टेयर की दर से अच्छी तरह सड़ी हुई पोल्ट्री खाद डालें।

मेड़ और कुंड बनाना:

उर्वरकों का प्रयोग:

रोपित फसल (Transplanted crop):

सीधी बोई जाने वाली फसल:

सूक्ष्म पोषक तत्व मिश्रण का प्रयोग:

रोपित फसल:

सीधी बोई जाने वाली फसल:

ज्वार की बुवाई / रोपाई (Sowing / Transplanting sorghum):

रोपित फसल:

सीधी बोई जाने वाली फसल:

खरपतवार प्रबंधन:

पौधों की छंटाई और गैप फिलिंग:

पौधों की छंटाई करें और निकाले गए पौधों से खाली जगह भरें। बुवाई के 23वें दिन पहली बार हाथ से निराई करने के बाद पौधों के बीच 15 सेमी की दूरी बनाए रखें। लोबिया को छोड़कर सभी दलहनी फसलों के लिए दलहनी फसल को पौधों के बीच 10 सेमी की दूरी तक पतला करें, लोबिया के लिए पौधों के बीच 20 सेमी की दूरी बनाए रखी जाती है।

जल प्रबंधन:

आमतौर पर ज्वार को बारानी फसल (rainfed crop) के रूप में उगाया जाता है। हालांकि, जब बारिश नहीं होती है, तो सिंचाई प्रदान की जानी चाहिए। फूल आने और दाना भरने की अवस्था के समय फसल को अधिक पानी की आवश्यकता होती है। यदि फूल आने और दाना भरने की अवस्था के समय मिट्टी में पर्याप्त नमी नहीं है, तो तुरंत सिंचाई करनी चाहिए। किसी भी स्तर पर, पौधों को मुरझाने नहीं देना चाहिए। खेत से अतिरिक्त वर्षा जल निकालने के लिए उचित जल निकासी की स्थिति प्रदान की जानी चाहिए। ज्वार की फसल उगाने के लिए लगभग 400 मिमी पानी की आवश्यकता होती है।

नोट (NOTE): मौसम की स्थिति और बारिश होने के आधार पर सिंचाई कार्यक्रम को समायोजित करें।

आकस्मिक योजना: यह उपलब्ध पानी से मिट्टी की नमी का 75% नष्ट होने से पहले किया जाना चाहिए। तनाव के समय 3% केओलिन (एक लीटर पानी में 30 ग्राम) का छिड़काव करने से इसके बुरे प्रभाव कम हो जाएंगे।

कटाई और प्रसंस्करण:

बारानी ज्वार (RAINFED SORGHUM)

वर्षा: बारानी ज्वार के लिए 250-300 मिमी की औसत और अच्छी तरह से वितरित वर्षा इष्टतम है।

वितरण

तमिलनाडु के मदुरै, डिंडीगुल, थेनी, रामनाथपुरम, तिरुनेलवेली, थूथुकुडी, विरुधुनगर, शिवगंगई, तिरुचिरापल्ली, इरोड, सलेम, नमक्कल, कोयंबटूर और धर्मपुरी जिलों में बारानी ज्वार (Rainfed sorghum) की खेती की जाती है।

मौसम

फसल को दक्षिण पश्चिम और उत्तर पूर्व मानसून के मौसम में उगाया जा सकता है बशर्ते बारिश समान रूप से वितरित हो।

खेत की तैयारी

बीज दर: 15 किग्रा/हेक्टेयर

🔄 Updated Version 2.0
अंतिम अद्यतन (Last Updated): 28 अगस्त 2026
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