संगम काल (Sangam period) (200 ईसा पूर्व से 100 ईस्वी) के दौरान, तमिल क्षेत्र (अब तमिलनाडु) की आबादी का मुख्य पेशा कृषि था। यह क्षेत्र दक्षिण में केप कोमोरिन (Cape Comorin) से उत्तर में तिरुपति (आंध्र प्रदेश में), पश्चिम में वर्तमान केरल और कर्नाटक के कुछ हिस्सों तक फैला हुआ था। इस प्राचीन काल के दौरान अपनाई जाने वाली खेती के तरीकों (methods of cultivation) का पता कई कहावतों (proverbs), गाँव के गीतों और उस समय के साहित्य से चलता है जो आज भी उपलब्ध हैं। यह काफी आश्चर्यजनक है कि लोगों को कृषि (बीज की किस्में, बीज का चयन, बीज भंडारण, जुताई, खाद, सिंचाई, निराई, फसल सुरक्षा, कीट और वानस्पतिक कीटनाशक - seed varieties, seed selection, seed storage, ploughing, manuring, irrigation, weeding, crop protection, pests, and botanical pesticides) के बारे में अच्छा ज्ञान था।
संगम काल का साहित्य लोगों के जीवन के व्यापक पहलुओं (wide aspects) को शामिल करता है, जैसे महाकाव्य (epics), नैतिकता (ethics), सामाजिक जीवन और धर्म (religion)। इस अवधि के दौरान रची गई कई कविताओं को याद रखने (memorizing) और जप (chanting) के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाया गया है और बाद में ताड़ के पत्तों (palmyara leaves) पर लिखी गई पांडुलिपियों (manuscripts) के माध्यम से। कागज और छपाई मशीनरी (printing machinery) के आगमन के साथ, श्री स्वामीनाथ अय्यर, जिन्हें लोकप्रिय रूप से "तमिल दादा" (Tamill grandfather) कहा जाता है, ने उन्हें बड़ी मेहनत से इकट्ठा किया और छपी हुई किताबों के रूप में सामने लाए। संगम काल की दो कविताएँ, अर्थात्, तोलकाप्पियम (Tholkappiyam) और तिरुक्कुरल (Thirukural), हमें उस काल की कृषि प्रथाओं की ज्वलंत तस्वीर (vivid picture) देती हैं।
तोलकाप्पियम कविता 200 ईसा पूर्व के दौरान कवि तोलकाप्पियर (Tholkappier) द्वारा लिखी गई थी। यह विभिन्न कृषि पहलुओं (agricultural aspects) का विवरण देता है और इन्हें नीचे सूचीबद्ध किया गया है।
भूमि को चार समूहों में वर्गीकृत किया गया था, अर्थात्, मुल्लई (mullai - जंगल - forest), कुरिंजी (Kurinji - पहाड़ियाँ - hills), मरुधम (marudham - खेती योग्य भूमि - cultivable lands), और नीथल (neithal - तटीय क्षेत्र - coastal areas)।
छह मौसमों (seasons) का उल्लेख है: प्रारंभिक वसंत (early spring), देर से वसंत (late spring), बादल (cloudy), बरसात (rainy), प्रारंभिक सर्दी (early winter), और देर से सर्दी (late winter)।
चावल, बाजरा (millets), गन्ना, केला, इलायची (cardamom), काली मिर्च (pepper), कपास, तिल (sesame), नारियल और अखरोट (nut) के संदर्भ हैं। किसानों को पता था कि चावल को वर्षा आधारित फसल (rainfed crops) के रूप में उगाया जा सकता है। केले और गन्ने को रतून (ratooned) किया गया था। पौधों को जीवित प्राणी माना जाता था और वे संवेदनशीलता (sensitivity) से संपन्न थे। तोलकाप्पियर ने 2700 साल पहले एकबीजपत्री (monocots) और द्विबीजपत्री (dicots) के बारे में उल्लेख किया है।
राजा कृषि विकास (agricultural development) को अपना प्राथमिक कर्तव्य (primary duty) मानते थे। उनका मानना था कि मिट्टी की उर्वरता (soil fertility) और सिंचाई की सुविधा देश की संपत्ति होनी चाहिए। बढ़ा हुआ कृषि उत्पादन देश की समृद्धि का मानदंड (yardstick of prosperity) माना जाता था। किसी साम्राज्य (kingdom) की स्थिरता सेना (army) द्वारा नहीं बल्कि कृषि और पर्याप्त फसल उत्पादन द्वारा सुनिश्चित की जाती थी। मानसून की बारिश की विफलता (Failure of monsoon rains) और अनाज की उपज में कमी का कारण राजा के पापों (king’s sins) को माना जाता था।
राजाओं ने उन स्थानों पर टैंक (tanks) खोदे जहां बारिश से पानी का बहाव प्रचुर (plentiful) था। छोटी पहाड़ियों (small hillocks) के निकट अर्धवृत्ताकार बांध (Semicircular bunds) बनाए गए और वर्तमान बांधों (dams) के समान जल भंडार (water reservoirs) बनाए और बनाए गए थे। इस प्रकार जल संचयन (water harvesting) के बारे में जागरूकता का संकेत मिलता है। राजा करिकाल चोलन (King Karikal Cholan) ने जीते हुए देश से 1000 गुलामों को लाकर कावेरी नदी के बांध बनाए। कावेरी नदी पर सदियों पहले बनाया गया पत्थर का बांध (stone dam) आज भी इंजीनियरिंग का उत्कृष्ट नमूना (master piece of engineering) माना जाता है। नदी के पानी को नहरों (channels) के माध्यम से टैंकों की ओर मोड़ा गया। यह उल्लेख किया गया है कि सिंचाई या तो सुबह जल्दी या देर शाम को दी जानी चाहिए और गर्म मध्य-दिन (hot mid-day) के दौरान नहीं।
लकड़ी के हल (wooden plough) के साथ जुताई (ploughing) के लिए भैंसों (Buffaloes) का उपयोग किया जाता था। गहरी जुताई (Deep ploughing) को उथली जुताई (shallow ploughing) से बेहतर माना जाता था। धान के खेतों को समतल (levelling) करने के लिए परंबु (parambu) नामक श्रम बचाने वाले उपकरण (labour saving tool) का उपयोग किया जाता था। कुओं, टैंकों और नदियों से पानी निकालने के लिए अमीरी (amiry), केइलार (keilar), और यट्टम (yettam) जैसे उपकरणों का उपयोग किया जाता था। बाजरे के खेतों में पक्षियों को डराने के लिए थट्टई (thattai) और कावन (kavan) नामक औजारों का इस्तेमाल किया जाता था। बाजरे के खेतों में जंगली सूअरों (wild boars) को पकड़ने के लिए जाल (Traps) का इस्तेमाल किया जाता था।
बीज का चयन उन बालियों (earheads) से किया गया जो सबसे पहले परिपक्व (matured) हुई थीं। चयनित बीज केवल बुवाई के लिए जमा (stored) किया गया था और कभी भी खाद्यान्न (food grain) के रूप में उपयोग नहीं किया गया था। ऐसा माना जाता था कि इस तरह का भटकाव (diversion) परिवार को नष्ट कर देगा।
चावल के बाद उड़द (black gram - urd) उगाकर फसल चक्र (Crop rotation) का अभ्यास किया गया था। यह इंगित करता है कि किसान निम्नलिखित चावल की फसल के लाभों के बारे में जानते थे जो अब हम जानते हैं कि उड़द की जड़ की गांठों (root nodules) में नाइट्रोजन स्थिरीकरण (nitrogen fixation) के कारण होता है। उन्होंने मिश्रित खेती (mixed cropping) का भी अभ्यास किया; उदाहरण के लिए, लोबिया (lablab) या कपास के साथ फॉक्सटेल बाजरा (foxtail millet)। आज हम जानते हैं कि संतुलित आहार (balanced diet) में स्टार्च (starch - चावल और बाजरा द्वारा आपूर्ति) और प्रोटीन (लोबिया द्वारा आपूर्ति) होना चाहिए। नारियल और कटहल के बागानों (jack fruit plantations) में, अदरक और हल्दी को अंतरफसल (intercrops) के रूप में उगाया जाता था।
चावल की कटाई के लिए सेनम (senyam) नामक उपकरण का उपयोग किया जाता था। चावल की गहाई (Threshing) हाथ से भैंस की मदद से की जाती थी (और बड़े जोतों में हाथियों द्वारा)। भूसा (chaff) निकालने के लिए हाथ से ओसाई (Hand winnowing) की जाती थी। उपज का छठा हिस्सा राजा को कर (tax) के रूप में दिया जाता था। खेत मजदूरों (Farm labourers) को वस्तु (kind) के रूप में भुगतान किया जाता था।
कटाई के बाद खेत को तुरंत जोता जाता था या ठूंठों (stubbles) को जड़ पकड़ने की सुविधा के लिए खेत में पानी की अनुमति दी जाती थी। वैज्ञानिक सिद्धांतों (scientific principles) के आधार पर आज भी इन कृषि पद्धतियों (agronomic practices) की सिफारिश की जाती है। जुताई जैसे कड़ी मेहनत वाले काम पुरुषों द्वारा किए जाते थे जबकि महिलाएं रोपाई (transplanting), निराई (weeding), पक्षियों को डराने (bird scaring), कटाई (harvesting) और ओसाई (winnowing) जैसे हल्के काम करती थीं।
कंदपुराणम् (Kandapuranam) में यह उल्लेख किया गया है कि एक राजा की बेटी वल्ली को बाजरे के खेतों में पक्षियों को डराने के लिए भेजा गया था, जहाँ भगवान मुरुगा (भगवान शिव के पुत्र) ने उनसे प्रेम किया और शादी कर ली।
उत्पादों का वजन के हिसाब से आदान-प्रदान (exchanged by weight) किया जाता था। मदुरै (संगम कवियों का मुख्यालय) में अनाज का बाजार (food grain bazaar) था जहाँ 18 प्रकार के अनाज, बाजरा और दालें बेची जाती थीं। हर दुकान के ऊपर एक बैनर फहराया (banner hoisted) गया था ताकि दूर से देखा जा सके कि यहां अनाज बेचा जाता है। नियॉन सिग्नल और नाम बोर्ड के बजाय क्या नया तरीका है! आयात और निर्यात (imports and exports) पर सीमा शुल्क (Customs duty) एकत्र किया जाता था।
इस कविता की रचना 70 ईसा पूर्व तिरुवल्लुवर (Thiruvalluvar) नामक एक प्रतिभाशाली कवि ने की थी। इसमें 1330 दोहे (1330 couplets - 133 विषय जिनमें से प्रत्येक में 10 दोहे हैं) शामिल हैं। यह संगम तमिल साहित्य (Sangam Tamil literature) का गौरव है और इसकी महानता इस तथ्य से महसूस की जा सकती है कि इसका अंग्रेजी और कई अन्य भाषाओं में अनुवाद किया गया है। यह राजनीति (politics) अध्याय के अंतर्गत कृषि के लिए एक विषय (10 दोहे) समर्पित करता है। यह स्पष्ट रूप से इस मान्यता को प्रकट करता है कि राजा का मुख्य कर्तव्य कृषि उत्पादन (agricultural production) सुनिश्चित करना है। आज भी हम जानते हैं कि जब लोग भूखे (starved) मरते हैं तो सरकार गिर जाती है। 200 साल पहले की फ्रांसीसी क्रांति (French revolution) को भोजन की कमी के कारण लुई सोलहवें (Louis XVI) के पतन के रूप में देखा जा सकता है। प्रथम विश्व युद्ध (World War I) में जर्मनी की हार का एक कारण आलू की लेट ब्लाइट बीमारी (late blight disease of potato) के कारण आलू की कमी थी। जब उपलब्ध तांबे को सेना की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए डायवर्ट किया गया, तो कॉपर सल्फेट (copper sulphate), चूना और पानी की तैयारी प्रभावित हुई और लेट ब्लाइट को नियंत्रित नहीं किया जा सका। उपलब्ध आलू को मोर्चे पर लड़ रहे सैनिकों के पास भेजा गया। इसलिए, सैनिकों के परिवारों को आलू उपलब्ध नहीं था। इसने जर्मन सैनिकों के मनोबल (morale) को बुरी तरह प्रभावित किया। हॉर्सफॉल (Horsfall) और कूलिंग (Cooling) मजाकिया लहजे में कहानी का उल्लेख निम्नलिखित पंक्तियों में करते हैं:
एक कील (nail) की कमी से, जूता खो गया।
जूते की कमी से घोड़ा खो गया।
घोड़े की कमी से सिपाही खो गया।
सिपाही की कमी से युद्ध हार गया (war was lost)।
भारत में भी, कई राज्य सरकारें गिर गई हैं जब वे सार्वजनिक वितरण प्रणाली (public distribution system) के माध्यम से खाद्यान्न की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने में विफल रहीं।
कृषि और संबंधित पहलुओं का महत्व निम्नलिखित दोहों और विवरणों में इंगित किया गया है।
"दुनिया कई उद्योगों (industries) के इर्द-गिर्द घूमती है। ऐसे सभी उद्योग कृषि के इर्द-गिर्द घूमते हैं।"
"केवल किसान ही स्वतंत्र जीवन (independent life) जीते हैं; अन्य लोग उनकी पूजा करते हैं और उनके बाद दूसरे स्थान पर हैं।"
"अगर किसान खेती करना बंद कर दें, तो ऋषि (sages) भी जीवित नहीं रह सकते।"
"यदि जमीन की गहरी जुताई की जाए और मिट्टी को सूखकर एक चौथाई वजन (one fourth weight) तक रहने दिया जाए, तो खाद (manuring) की भी आवश्यकता नहीं है।"
"जुताई से ज्यादा खाद डालना महत्वपूर्ण है: सिंचाई से ज्यादा फसल सुरक्षा (crop protection) महत्वपूर्ण है।" हरी पत्ती की खाद (Green leaf manuring), फार्मयार्ड खाद (farmyard manure), और भेड़ की पेन (sheep penning) प्रचलन (vogue) में थे, हालांकि किसानों को यह पता नहीं था कि वे फसल को नाइट्रोजन (nitrogen) की आपूर्ति करते हैं। हमारे पूर्वजों के पास कृषि ज्ञान की गहराई पर किसी को भी आश्चर्य होता है।
जल प्रबंधन की एक कुशल विधि के रूप में बेड विधि (Bed method) का पालन किया गया।
"जिस तरह किसान जड़ प्रणाली (root system) के साथ खरपतवारों (weeds) को निकालता है, उसी तरह राजा को समाज से उपद्रवियों (rowdies) को खत्म करना चाहिए।"
"यदि किसान नियमित रूप से अपने खेत में नहीं जाता है, तो फसल नहीं बढ़ेगी।"
प्राचीन तमिल साहित्य से कृषि का पूर्वगामी विवरण (foregoing account) हमारे पूर्वजों के कृषि ज्ञान (agricultural knowledge) को स्पष्ट रूप से इंगित करता है। उनके पदचिन्हों (footsteps) पर चलते हुए, कृषि वैज्ञानिकों की वर्तमान पीढ़ी ने उन्नत तकनीकों (advanced technologies) का उपयोग किया है और हमारी खाद्य आवश्यकताओं (food requirements) को पूरा करने के लिए हमारे देश में कृषि उत्पादन को स्थिर करने की कोशिश की है।