कौटिल्य का अर्थशास्त्र, कृषि, पशुपालन, वस्तु व्यापार आदि - गाँव की विशेषताएँ (Kautilya’s Artha-Sastra, Agriculture, Animal Husbandry, Commodity Trade etc. – Features of Village)
कौटिल्य (जिन्हें विष्णुगुप्त या चाणक्य के नाम से भी जाना जाता है) (321-296 ईसा पूर्व) समय के महान विद्वान (scholar) थे। उन्होंने अर्थशास्त्र (Artha-sastra) नामक एक ग्रंथ (treatise) लिखा, जो संसाधनों के प्रबंधन (management of resources) से संबंधित है। कौटिल्य के समय कृषि, पशु प्रजनन (cattle breeding) और व्यापार को एक विज्ञान में समूहीकृत (grouped) किया गया था जिसे वार्ता (varta) कहा जाता था। कौटिल्य ने कृषि को बहुत महत्व दिया और कृषि के मुखिया (head of agriculture) के एक अलग पद का सुझाव दिया और इसे सीताध्यक्ष (Sitadhakashya) का नाम दिया। कृषि को आज सरकारी अधिकारियों से नीति और प्रशासनिक सहायता (policy and administrative support) द्वारा प्रमुख महत्व प्राप्त है। उदाहरण के लिए i) अच्छे बीजों और अन्य आदानों (inputs) की आपूर्ति ii) सिंचाई के पानी का प्रावधान iii) आईएमडी (IMD) द्वारा वर्षा की भविष्यवाणी iv) मशीनरी की खरीद में सहायता v) विपणन (Marketing) और सुरक्षित भंडारण। कौटिल्य ने अपनी पुस्तक में सभी महत्वपूर्ण पहलुओं (aspects) का उल्लेख किया है। उन्होंने कृषि में कई महत्वपूर्ण पहलुओं का सुझाव दिया जो आज अत्यधिक प्रासंगिक (relevant) हैं।
- कृषि अधीक्षक (superintendent of agriculture) ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जिसे कृषि और बागवानी (horticulture) का ज्ञान हो। ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करने का भी प्रावधान (provision) था जो विशेषज्ञ (expert) नहीं था लेकिन उसे अन्य जानकार व्यक्ति द्वारा सहायता प्रदान की जाती थी। यह आज भी लागू है, कृषि, बागवानी के निदेशकों (directors) की नियुक्ति कभी-कभी सिविल सेवक (civil servants) होते हैं जिनकी सहायता तकनीकी व्यक्तियों (technical persons) द्वारा की जाती है।
- बुवाई (sowing) से पहले जमींदारों द्वारा मजदूरों का अनुमान (Anticipation of labours)। समय पर बीज बोने के लिए दासों (Slaves) और कैदियों (prisoners) को संगठित किया गया था। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि अच्छी जुताई (thorough ploughing) किसी विशेष फसल के लिए आवश्यक अच्छी मिट्टी की बनावट (good soil texture) प्रदान करती है। आज भी पंजाब के किसान भारी मांग (heavy demand) के समय बिहार से मजदूर (labours) किराए पर लेते हैं।
- अधिक उपज (high yield) के लिए समय पर बुवाई बहुत महत्वपूर्ण है, विशेष रूप से वर्षा आधारित (rainfed) बुवाई के लिए, जिसके लिए सभी उपकरणों (implements) और सहायक उपकरण (accessories) तैयार रखने होंगे। इन व्यवस्थाओं में किसी भी देरी पर दंडात्मक कार्रवाई (punitive action) की गई।
- कौटिल्य ने सुझाव दिया कि वर्षा आधारित फसल (rainfed crop) की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए 16 द्रोण (dronas) (एक द्रोण = 40 मिमी से 50 मिमी) की वर्षा आवश्यक थी और चावल के लिए 4 द्रोण वर्षा पर्याप्त है। यह ध्यान रखना बहुत महत्वपूर्ण है कि कौटिल्य के काल में वर्षामापी (rain gauge) का उपयोग किया जाता था। यह स्पष्ट रूप से एक गोलाकार बर्तन (circular vessel) (20 उंगलियों की चौड़ाई, 8 उंगलियों की गहराई) था और बारिश को मापने की इकाई अढका (adhaka) (1 अढका = लगभग 12 मिमी) थी।
- उन्होंने फसल उगाने के मौसम के दौरान वर्षा के इष्टतम वितरण (optimum distribution) पर भी जोर दिया, आवश्यक मात्रा की एक तिहाई वर्षा बारिश के मौसम के शुरू होने और समाप्त होने वाले महीनों (जुलाई / अगस्त; अक्टूबर / दिसंबर) में होती है और बीच (अगस्त / सितंबर; अक्टूबर) में 2/3 वर्षा को बहुत समान (even) माना जाता है। यह अवधारणा आज भी लागू है, यानी वर्षा आधारित फसल (rainfed crop) के लिए समान वितरण आवश्यक है।
- मौसम में बदलाव (change in the season) के अनुसार फसलें बोई जानी चाहिए। उदाहरण के लिए साली (रोपाई वाला चावल - transplant rice), विरलु (सीधी बुवाई वाला चावल - direct sown rice), तिल (Sesame), बाजरा (millets) बारिश की शुरुआत में बोया जाना चाहिए। मौसम के मध्य में दालें (Pulses) बोई जानी चाहिए। कुसुम (Safflower), अलसी (linseed), सरसों (mustard), जौ, गेहूं बाद में बोया जाना चाहिए। यह स्पष्ट है कि आज भी हमारे वैज्ञानिक परिणाम साबित करते हैं कि अनाज (cereals), बाजरा जल्दी बोए जाते थे और तिलहन (oilseeds), गेहूं, जौ को कम पानी की आवश्यकता होती है जिसे अंत में या बारिश के बाद के मौसम (post rainy season) के रूप में बोया जा सकता है।
- उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि चावल की फसल के लिए कम श्रम व्यय (labour expense) की आवश्यकता होती है, सब्जियां मध्यवर्ती (intermediate) हैं, और गन्ना सबसे खराब है क्योंकि इसमें अधिक ध्यान और व्यय (attention and expenditure) की आवश्यकता होती है। यह आज भी सच है, 2000 वर्षों के बाद स्थिति कभी नहीं बदली है कि गन्ने में भारी श्रम और व्यय की आवश्यकता होती है।
- कुकुरबिट्स (cucurbits) जैसी फसलें नदियों के किनारे (banks of rivers) के लिए उपयुक्त होती हैं, पिप्पली (Long-peper), गन्ना और अंगूर वहां अच्छे होते हैं जहां मिट्टी की रूपरेखा (soil profile) पानी से अच्छी तरह चार्ज होती है। सब्जी को बार-बार सिंचाई (frequent irrigation) की आवश्यकता होती है, औषधीय पौधों (medicinal plants) की खेती के लिए उपयुक्त खेत की सीमाएँ (borders of field)। आज भी नदियों के किनारे कुकुरबिट (तरबूज, कद्दू) उगाने की प्रथा उत्तर में गंगा नदी से लेकर दक्षिण में पंबा नदी तक जारी है। यह निरंतर अभ्यास (sustained practice) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो नदी के किनारे उपलब्ध नमी (moisture) के उपयोग को सुनिश्चित करता है।
- कौटिल्य द्वारा सुझाए गए कुछ जैव-नियंत्रण प्रथाओं (biocontrol practices) की प्रासंगिकता आज भी है। वे हैं:
a) सात रातों तक बीजों को धुंध (mist) और गर्मी (heat) के संपर्क में रखने की प्रथा। ये प्रथाएं अब भी गेहूं में स्मट रोगों (smut diseases) को रोकने के लिए अपनाई जाती हैं। फंगल मायसेलिया (fungal mycelia) को सक्रिय करने के लिए बीज को पानी में भिगोना और कवक को मारने के लिए बीज को तेज धूप में सुखाना।
b) गन्ने के कटे हुए सिरों को शहद (honey), घी (ghee) और गोबर (cowdung) के मिश्रण से प्लास्टर किया जाता है। हाल ही में साक्ष्यों ने साबित किया है कि शहद में व्यापक रूप से रोगाणुरोधी गुण (antimicrobial property) होते हैं। घी कटे हुए सिरों को सील कर सकता है नमी के नुकसान को रोक सकता है और गोबर संभावित रोगजनकों (potential pathogens) के जैव-नियंत्रण (biocontrol) की सुविधा प्रदान करता है।
- उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि कटाई (harvesting) उचित समय पर की जानी चाहिए और खेत में कुछ भी नहीं छोड़ा जाना चाहिए, यहां तक कि भूसा (chaff) भी नहीं। कटी हुई उपज को ठीक से संसाधित (processed) और सुरक्षित रूप से संग्रहीत (safely stored) किया जाना चाहिए। जमीन के ऊपर फसल के अवशेषों (crop residues) को भी खेतों से हटा दिया गया और मवेशियों को खिलाया गया।
व्यापार और विपणन (आर्थिक नीतियां) (Trade and Marketing - Economic policies)
सभी उद्योगों (industries) को उनके स्वामित्व (ownership) के अनुसार दो समूहों में वर्गीकृत किया गया था। प्रमुख उद्योग का एक समूह राज्य द्वारा कवर किया गया था और दूसरा समूह निजी द्वारा। यह ध्यान रखना दिलचस्प है कि यह नीति आज की मिश्रित अर्थव्यवस्था (mixed economy) के मॉडल (model) से मिलती-जुलती है। कृषि उपज के उत्पादन (production), वितरण (distribution) और खपत (consumption) को राजा द्वारा अच्छी तरह से नियंत्रित किया जाता था। कृषि को निजी स्वामित्व वाले उद्योगों (privately owned industries) की श्रेणी में रखा गया था। राज्य सरकार को सभी आर्थिक पहलुओं को नियंत्रित और विनियमित करना चाहिए और बाजार की ताकतों और निजी हितों के प्रभाव से बचना चाहिए।
कौटिल्य द्वारा सुझाई गई इन प्रथाओं का भारतीय किसानों ने सदियों तक पालन किया जो अधिक टिकाऊ (sustainable) हैं और वैज्ञानिक कृषि के लिए प्रासंगिक हैं।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह स्टडी मटेरियल ICAR के मूल कंटेंट का हिंदी अनुवाद है। हम इसकी पूर्ण सटीकता के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। यह फाइल अभी केवल
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