अध्याय 15: वायरल रोग (FMD), बैक्टीरियल रोग (एंथ्रेक्स, HS, BQ), चयापचय रोग (ब्लोट, कीटोसिस, मिल्क फीवर) और मास्टिटिस
वायरल रोग (Viral Diseases)
1. खुरपका और मुंहपका रोग (Foot and Mouth Disease - FMD):
- यह द्विखुरीय जानवरों (cloven-footed animals) में होने वाली अति संक्रामक बीमारी है।
- रोगकारक जीव: परिवार: पिकोर्नाविरीडे (Picornaviridae), जीनस: एपथोवायरस (Apthovirus)। वायरस के 7 प्रकार: O, A, C, Asia I, SAT 1, 2, 3।
- संचरण: सीधे संपर्क से, पानी, खाद, चरागाह और मवेशी परिचारक के माध्यम से।
- लक्षण: ऊष्मायन अवधि 2 - 5 दिन। तापमान 40°C। लार टपकना, भूख न लगना। जीभ, मसूड़ों, खुरों के बीच, थन और टीट में छाले। खुरों के घावों के कारण लंगड़ापन।
- उपचार और रोकथाम: कोई विशिष्ट इलाज नहीं। एंटीसेप्टिक्स लगाने से अल्सर को ठीक करने में मदद मिलती है। बहुसंयोजी वैक्सीन से टीकाकरण।
2. रेंडरपेस्ट (Rinderpest - पशु महामारी):
- यह वायरस रोगों में सर्वाधिक विनाशकारी है। रोगकारक जीव: पैरामाइक्सोविरिडे (Paramyxoviridae), जीनस: मॉर्बिलीवायरस (Morbillivirus)।
- लक्षण: भूख न लगना, अश्रु स्राव, तीव्र दस्त। मुंह, होंठ और मसूड़ों में अल्सर। 10वें दिन मृत्यु।
- नोट: 1.3.1998 से तमिलनाडु को रेंडरपेस्ट से मुक्त (FREE FROM RINDERPEST) घोषित किया गया है। यही वायरस जब छोटे जुगाली करने वाले जानवरों (भेड़ और बकरी) को प्रभावित करता है तो इसे PPR कहा जाता है।
बैक्टीरियल रोग (Bacterial Diseases)
1. एंथ्रेक्स (Anthrax):
- यह मवेशियों, भेड़ों, घोड़ों और सूअरों को प्रभावित करने वाली एक अति तीव्र और घातक बीमारी है। मनुष्य भी संवेदनशील है (ऊन छांटने वालों की बीमारी - wool sorters disease)।
- रोगकारक जीव: बैसिलस एंथ्रेसिस (Bacillus anthracis)। बीजाणु अत्यधिक प्रतिरोधी होते हैं और गर्मी या कीटाणुनाशक से नहीं मरते हैं।
- लक्षण: मिनटों में मृत्यु। तेज बुखार, कंपकंपी। मृत्यु से पहले मलाशय और नथुने से खून बहता है। सभी प्राकृतिक छिद्रों से गहरा खून निकलता है जो जमता नहीं है।
- निदान और रोकथाम: एंथ्रेक्स से मृत जानवर के शव को कभी नहीं खोलना चाहिए। प्रभावित शवों को जला दिया जाना चाहिए या चूना डालकर गहरे गड्ढे में दफना दिया जाना चाहिए। वार्षिक टीकाकरण आवश्यक है।
2. ब्लैक क्वार्टर (Black quarter - BQ / लंगड़ा बुखार):
- यह एक तीव्र संक्रामक रोग है लेकिन छूत का नहीं है। बारिश के मौसम की शुरुआत में इसका प्रकोप होता है।
- रोगकारक जीव: बैक्टीरिया - क्लोस्ट्रीडियम चौवोई (Clostridium chauvoei)।
- लक्षण: पिछले और अगले पैरों में सूजन होती है, जिसे रगड़ने पर मांसपेशियों में गैस के कारण दरार की आवाज आती है। त्वचा सूखी, कठोर और काली हो जाती है।
- निदान: प्रभावित हिस्सा काला या गहरा लाल होता है और विशिष्ट बासी गंध आती है। रोकथाम के लिए बारिश के मौसम की शुरुआत से पहले टीकाकरण करें।
3. हेमोरेजिक सेप्टिसीमिया (Haemorrhagic septicaemia - HS / गलघोंटू):
- रोगकारक जीव: बैक्टीरिया - पाश्चरेला मल्टोसिडा (Pasteurella multocida)।
- लक्षण: गले, गर्दन और ब्रिस्केट में सूजन। जीभ में सूजन और बाहर निकल आना। घरघराहट के साथ सांस लेना, 106°F तापमान और मृत्यु।
- रोकथाम: बारिश के मौसम से पहले 1 साल में एक बार टीकाकरण।
मास्टिटिस (Mastitis / थनैला रोग)
यह थन की सूजन है। दूध में भौतिक और रासायनिक परिवर्तन होते हैं जिससे डेयरी उद्योग को दूध उत्पादन में कमी के कारण बड़ा आर्थिक नुकसान होता है।
- कारण: मुख्य रूप से बैक्टीरियल - स्ट्रेप्टोकोकस एगैलेक्टिया, स्टैफिलोकोकस, कोरीने बैक्टीरियम, ई-कोलाई (E-coli)।
- लक्षण: मवाद और पीले स्राव के साथ गर्म, सूजा हुआ और दर्दनाक थन। दूध खून से सना हो सकता है और उसमें मवाद हो सकता है।
- नियंत्रण: स्वच्छ उपाय महत्वपूर्ण हैं। दूध दुहने वालों को हाथ धोने चाहिए। सकारात्मक जानवरों को सबसे अंत में दुहना चाहिए। प्रत्येक थन से दूध की पहली धार को फर्श पर नहीं गिरने देना चाहिए बल्कि अलग बर्तन में इकट्ठा करना चाहिए।
चयापचय और आहार संबंधी रोग
1. दूध का बुखार (Milk fever / Parturient paresis):
- यह ब्याने के तुरंत बाद (soon after calving) गायों में होने वाला चयापचय रोग (metabolic disease) है।
- कारण: प्रसव के बाद गायों में सीरम कैल्शियम का स्तर (Serum calcium levels) गिर जाता है।
- लक्षण: ब्याने के 72 घंटों के भीतर गाय उत्तेजना, चाल में असामंजस्य दिखाती है। वह अपने सिर को अपनी कोख की ओर निर्देशित करके लेट जाती है। अंतिम अवस्था में कोमा और मृत्यु।
- उपचार: विटामिन डी3 के साथ 300-400 मिलीलीटर कैल्शियम बोरोग्लुकोनेट (calcium borogluconate) के अंतःशिरा प्रशासन से नाटकीय सुधार होता है।
2. कीटोसिस (Ketosis / Acetonaemia):
- उच्च उपज देने वाले डेयरी मवेशियों में कार्बोहाइड्रेट चयापचय की गड़बड़ी।
- कारण: रक्त में शर्करा के स्तर में कमी (हाइपोग्लाइसीमिया - hypoglycemia), और रक्त/मूत्र में कीटोन्स के स्तर में वृद्धि (ketonemia / ketonuria)।
- लक्षण: भूख न लगना, वजन कम होना और दूध की उपज में भारी कमी। घबराहट के प्रकार में डिप्रेशन, गोल-गोल घूमना, ऐंठन शामिल है। सांसों से फलों जैसी गंध आती है।
- उपचार: 5 दिनों तक 500-1000 मिली 40% ग्लूकोज का अंतःशिरा प्रशासन।
3. ब्लोट (Bloat / TYMPANY / पेट फूलना):
- यह जुगाली करने वाले जानवरों की बीमारी है जिसमें रुमेन और रेटिकुलम किण्वन की गैसों से अधिक फूल जाते हैं।
- कारण: ताजी फलियों का अधिक सेवन और उच्च अनाज का राशन झागदार सूजन का कारण बनता है।
- लक्षण: रुमेन का फैलाव जल्दी होता है, पेट बढ़ जाता है। बाईं कोख ड्रम जैसी आवाज पैदा करती है। जानवर को सांस लेने में कठिनाई होती है, जीभ बाहर निकल आती है।
- उपचार: तीव्र मामलों में गैसों को बाहर निकालने के लिए तेज चाकू या ट्रोकार और कैनुला से रुमेन को पंचर करें। 60 मिलीलीटर तारपीन के तेल को एक लीटर मूंगफली/तिल के तेल के साथ मौखिक रूप से दें।
🔄 Updated Version 2.0
अंतिम अद्यतन (Last Updated): 3 सितंबर 2026
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