एक क्लोन (clone) किसी जीव (organism), अंग (organ), एकल कोशिका (single cell), कोशिकांग (organelle) या वृहत अणु (macromolecule) की बिल्कुल सटीक प्रति (exact copy) होती है। जीन क्लोनिंग किसी एक जीन की कई प्रतियाँ (copies) बनाने की प्रक्रिया है। आणविक क्लोनिंग (Molecular cloning) से तात्पर्य एक विशिष्ट DNA अनुक्रम (DNA sequence) को अलग करने (isolating) और शरीर के अंदर (in vivo) उसकी कई प्रतियाँ प्राप्त करने की प्रक्रिया से है। क्लोनिंग का उपयोग मुख्य रूप से जीन वाले DNA खंडों (DNA fragments) को बढ़ाने (amplify) के लिए किया जाता है, लेकिन इसका उपयोग किसी भी DNA अनुक्रम जैसे प्रमोटर (promoters), नॉन-कोडिंग अनुक्रम (non-coding sequences), रासायनिक रूप से संश्लेषित ऑलिगोन्यूक्लियोटाइड (chemically synthesised oligonucleotides) और अनियमित रूप से टूटे हुए DNA (randomly fragmented DNA) को बढ़ाने के लिए भी किया जा सकता है। क्लोनिंग का उपयोग विभिन्न प्रकार के जैविक प्रयोगों (biological experiments) और तकनीकी अनुप्रयोगों (technological applications) जैसे बड़े पैमाने पर प्रोटीन उत्पादन (large scale protein production) में किया जाता है। इसका उपयोग अनुसंधान (research) के कई क्षेत्रों और जीन थेरेपी (gene therapy) जैसे चिकित्सा अनुप्रयोगों (medical applications) के लिए भी होता है। जीनों का चयनात्मक प्रवर्धन (selective amplification) निम्नलिखित आवश्यक प्रक्रियाओं को करने की क्षमता पर निर्भर करता है:
थर्मोस्टेबल DNA पॉलिमरेज़ (thermostable DNA polymerases) जैसे कि टैक पॉलिमरेज़ (Taq Polymerase) की खोज ने प्रयोगशाला में DNA प्रतिकृति (DNA replication) में संशोधन करना संभव बना दिया और यह पोलीमरेज़ चेन रिएक्शन (PCR) के विकास के लिए आवश्यक था। इसमें उस जीन (gene of interest) के दोनों ओर DNA के एक विशेष क्षेत्र (region) के लिए विशिष्ट प्राइमरों (primers) का उपयोग किया जाता है, और प्रतिकृति (replication) को बार-बार रोका और शुरू किया जाता है, जिससे उस जीन की लाखों प्रतियाँ बन जाती हैं। फिर इन प्रतियों को जेल इलेक्ट्रोफोरेसिस (gel electrophoresis) का उपयोग करके अलग (separated) और शुद्ध (purified) किया जा सकता है।
रेस्ट्रिक्शन एंडोन्यूक्लिज़ (restriction endonucleases) नामक एंजाइमों की खोज प्रोटीन इंजीनियरिंग के लिए बहुत आवश्यक रही है। ये एंजाइम न्यूक्लियोटाइड अनुक्रम (nucleotide sequence) के आधार पर DNA को विशिष्ट स्थानों (specific locations) पर काटते हैं। सैकड़ों अलग-अलग रेस्ट्रिक्शन एंजाइम, जो एक विशिष्ट स्थान पर DNA को काटने में सक्षम होते हैं, बैक्टीरिया (bacteria) की कई अलग-अलग प्रजातियों (strains) से अलग किए गए हैं। रेस्ट्रिक्शन एंजाइम से कटा हुआ DNA अलग-अलग आकार के कई छोटे खंड (fragments) बनाता है। इन्हें जेल इलेक्ट्रोफोरेसिस या क्रोमैटोग्राफी (chromatography) का उपयोग करके अलग किया जा सकता है।
आनुवंशिक अनुसंधान (genetic research) में अक्सर DNA के दो या दो से अधिक अलग-अलग स्ट्रैंड्स (strands) को जोड़ना आवश्यक होता है, ताकि एक लंबा स्ट्रैंड बनाया जा सके, या एक गोलाकार स्ट्रैंड (circular strand) को बंद किया जा सके जिसे रेस्ट्रिक्शन एंजाइमों से काटा गया हो। DNA लाइगेज (DNA ligases) नामक एंजाइम न्यूक्लियोटाइड श्रृंखलाओं के बीच सहसंयोजक बांड (covalent bonds) बना सकते हैं। एंजाइम DNA पॉलिमरेज़ I (DNA polymerase I) और पॉलीन्यूक्लियोटाइड काइनेज (polynucleotide kinase) भी इस प्रक्रिया में क्रमशः रिक्त स्थान को भरने, या 5' सिरों को फॉस्फोराइलेट (phosphorylating) करने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
DNA के छोटे गोलाकार टुकड़े जो बैक्टीरिया के जीनोम का हिस्सा नहीं होते हैं, लेकिन स्व-प्रतिकृति (self-replication) करने में सक्षम होते हैं, उन्हें प्लाज्मिड (plasmids) कहते हैं। सूक्ष्मजीवों (microorganisms) के बीच जीन के परिवहन (transport) के लिए अक्सर प्लास्मिड का उपयोग "वेक्टर (vectors)" के रूप में किया जाता है। जैव प्रौद्योगिकी (biotechnology) में, एक बार जीन को प्रवर्धित (amplified) करने और जीन व प्लाज्मिड दोनों को रेस्ट्रिक्शन एंजाइमों द्वारा काटने के बाद, उन्हें एक साथ जोड़ दिया जाता है जिससे रिकॉम्बिनेंट DNA (recombinant DNA) बनता है। वायरल (बैक्टीरियोफेज - bacteriophage) DNA को भी एक वेक्टर के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, साथ ही कॉस्मिड (cosmids) और बैक्टीरियोफेज जीन वाले रिकॉम्बिनेंट प्लाज्मिड का भी उपयोग हो सकता है।
प्लाज्मिड को नई होस्ट कोशिकाओं (host cells) में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया को ट्रांसफॉर्मेशन (transformation) कहा जाता है। इस तकनीक के लिए आवश्यक है कि होस्ट कोशिकाओं को हीट-शॉक (heat-shock) के संपर्क में लाया जाए, जो उन्हें प्लास्मिड DNA के प्रति "सक्षम (competent)" या पारगम्य (permeable) बनाता है। प्लास्मिड जितना बड़ा होता है, कोशिकाओं द्वारा इसे ग्रहण करने की क्षमता (efficiency) उतनी ही कम होती है। बैक्टीरियोफेज वैक्टर या कॉस्मिड का उपयोग करके बड़े DNA खंडों को अधिक आसानी से क्लोन किया जाता है।
ट्रांसफॉर्मेशन के दौरान सभी कोशिकाएं DNA नहीं ग्रहण करेंगी। यह आवश्यक है कि ऐसा करने वाली कोशिकाओं का पता लगाने की एक विधि हो। आमतौर पर, प्लाज्मिड एंटीबायोटिक प्रतिरोध (antibiotic resistance) के लिए जीन ले जाते हैं और ट्रांसफॉर्म हुई कोशिकाओं को उन जीनों की अभिव्यक्ति (expression) और उस एंटीबायोटिक वाले माध्यम (media) पर बढ़ने की उनकी क्षमता के आधार पर चुना जा सकता है। चयन के वैकल्पिक तरीके अन्य रिपोर्टर प्रोटीन (reporter proteins) की उपस्थिति पर निर्भर करते हैं जैसे कि x-gal/lacZ सिस्टम, या ग्रीन फ्लोरेसेंस प्रोटीन (green fluorescence protein), जो क्रमशः रंग और प्रतिदीप्ति (fluorescence) के आधार पर चयन की अनुमति देते हैं।
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