अरंडी (CASTOR)

वैज्ञानिक नाम: Ricinus communis (2n = 20)

उत्पत्ति स्थान (Place of origin): इथियोपिया (Ethiopia)

वर्गीकरण (Classification)

यह एकप्ररूपी (Monotypic) है, अर्थात् अरंडी की सभी किस्में (varieties), चाहे वे विशाल बहुवर्षीय (giant perennials) हों या छोटी पोरियों वाले वामन (short internode dwarf) पौधे, सभी में समान गुणसूत्र संख्या (chromosome number) होती है।

ज़ुगोवोस्की (Zugovosky, 1962) ने Ricinus वंश (genus) में तीन प्रजातियों (species) का वर्णन किया है:

  1. R. communis
  2. R. macro carpus
  3. R. micro carpus

परन्तु इसे वनस्पतिशास्त्रियों (Botanists) द्वारा स्वीकार नहीं किया गया है।

इसकी कुछ उप-प्रजातियां (sub-species) हैं जिन्हें कृष्य प्रकार (cultivated type) की पारिस्थितिक चरम किस्में (ecological extreme varieties) अर्थात् बहुरूपी (polymorphic) माना जाता है। वे इस प्रकार हैं:

लाल अरंडी की किस्में (Red castor varieties - Popova 1930):

प्रजनन के उद्देश्य (Breeding Objectives)

  1. शुष्क भूमि (dry lands) के लिए लंबी अवधि की किस्में (Long duration varieties):
  2. सिंचित मिश्रित फसल (irrigated mixed cropping) स्थितियों के लिए उपयुक्त कम अवधि (Short duration) की उच्च उपज देने वाली किस्में:
  3. बिना झड़ने वाली (non-shattering) और कांटारहित (spineless) किस्मों का प्रजनन:
  4. कीट प्रतिरोध (insect resistance) के लिए प्रजनन:
  5. कम रिसिनिन (low ricinin content) वाली किस्मों का प्रजनन।

प्रजनन विधियां (Breeding Methods)

  1. पुरःस्थापन (Introduction):
  2. चयन (Selection):
  3. संकरण और चयन (Hybridization and selection):
  4. समष्टि सुधार (Population improvement):
  5. उत्परिवर्तन प्रजनन (Mutation breeding):
  6. संकर ओज प्रजनन (Heterosis breeding):

सूरजमुखी (SUN FLOWER)

वैज्ञानिक नाम: Helianthus annuus

उत्पत्ति स्थान: उत्तरी अमेरिका (North America)

वर्गीकरण

इस वंश में लगभग 67 प्रजातियां शामिल हैं - जो सभी अमेरिका की मूल निवासी (native) हैं। इनमें से दो की खेती की जाती है:

  1. H. annuus - द्विगुणित (diploid) 2n = 34. तिलहन फसल (Oil seed crop)।
  2. H. tuberosus - षट्गुणित (Hexaploid) 2n = 102. जेरूसलम आटिचोक (Jerusalem artichoke) - कंद (tuber) के लिए खेती की जाती है।

जंगली प्रजातियां (Wild species): H. hirsutus, H. rigidus Alternaria के प्रति मध्यम प्रतिरोधी (moderately resistant) हैं।

अनुमानित जनक (Putative parent): खरपतवार सूरजमुखी (Weed sunflower) से कृष्य सूरजमुखी की उत्पत्ति हुई। खरपतवार सूरजमुखी को H. petiolaris के साथ अंतर्मुखी संकरण (introgression) द्वारा संशोधित किया गया था।

सूरजमुखी के कृष्य प्रकार (Cultivars of sunflower)

  1. विशाल प्रकार (Giant types): 6 - 14 फीट लंबे। देर से पकने वाले (Late maturing), बड़े सिर (Large heads) 12 - 30 इंच व्यास के। बीज बड़े, सफेद या भूरे रंग के या काली धारियों वाले होते हैं। तेल की मात्रा (Oil content) बहुत कम होती है। उदाहरण: मैमोथ रशियन (Mamoth Russian)।
  2. अर्ध-बौनी किस्में (Semi dwarf varieties): मध्यम ऊंचाई - 4 ½ से 6 फीट, जल्दी पकने वाली (Early maturing)। सिर 7 - 9 इंच व्यास के। बीज छोटे, काले, भूरे या धारीदार होते हैं। उच्च तेल मात्रा 35%। उदाहरण: जुपिटर (Jupiter), पोल स्टार (Pole star)।
  3. वामन प्रकार (Dwarf types): 2 से 4½ फीट लंबे। जल्दी पकने वाले। सिर का आकार 5½ - 6½ इंच व्यास। छोटे बीज, उच्च तेल मात्रा 37%। उदाहरण: सनराइज (Sunrise), मोर्डेन (Morden), Co1, Co2।

प्रजनन के उद्देश्य

  1. शुष्क भूमि (dry land) और सिंचित (irrigated) स्थितियों के लिए उपयुक्त कम अवधि की किस्में विकसित करना: शुष्क भूमि में यह केवल काली मिट्टी (black soils) में ही सफल है। वर्षा आधारित (rainfed) लाल मिट्टी में यह सफल नहीं है।
  2. उच्च तेल मात्रा (high oil content) वाली किस्मों का प्रजनन: यह 38 से 48% तक होती है। उपज (yield) और तेल की मात्रा जटिल लक्षण (Complex character) हैं और ये नकारात्मक रूप से सहसंबंधित (negatively correlated) हैं। तेल की मात्रा बढ़ाने के लिए बीज का छिलका (shell) पतला होना चाहिए।
  3. स्व-उर्वर लाइनों (self fertile lines) के लिए प्रजनन: सूरजमुखी में पुंपूर्वता (Protoandry) और स्व-अयोग्यता (self incompatability) तंत्र कार्य करता है। इसलिए हस्त-परागण (hand pollination) आवश्यक होता है। इससे बचने के लिए स्व-उर्वर लाइनें विकसित की जा सकती हैं।
  4. रोग प्रतिरोध (disease resistance) के लिए प्रजनन: महाराष्ट्र हाइब्रिड चूर्णिल आसिता (powdery mildew) के प्रति संवेदनशील (susceptible) है। इसलिए उस पर प्रतिबंध (ban) है। रोग जैसे चूर्णिल आसिता, रतुआ (rust), चारकोल रॉट (charcoal rot), अल्टरनेरिया (Alternaria)। जंगली प्रजातियां जैसे H. hirsuta अल्टरनेरिया के प्रति मध्यम प्रतिरोधी हैं।
  5. कीटों के प्रति प्रतिरोधी (Resistant to pests): हेलियोथिस (Heliothis), टिड्डा (Grass hopper), जैसिड्स (Jassids)।

प्रजनन विधियां

  1. पुरःस्थापन: कनाडा से मोर्डेन।
  2. समूह चयन: रूस से Ec 68414। मोर्डेन से Co1 समूह चयन। उन लक्षणों के लिए उपयोगी है जो अत्यधिक वंशागत (highly heritable) होते हैं। उदाहरण: पौधे की ऊंचाई (Plant height), रोग प्रतिरोध।
  3. संकरण और चयन:
  4. उत्परिवर्तन (Mutation): Co3 (गामा किरणों / gamma rays के माध्यम से Co2 से उत्परिवर्ती)।
  5. हेड टू रो और अवशेष बीज विधि (Head to row and remnant seed method): रूस में पुस्टोवोइट (Pustovoit) द्वारा विकसित। इस विधि से तेल की मात्रा बढ़ाई जाती है। इसके चरण निम्नलिखित हैं:
    1. मुक्त परागित प्रकार (open pollinated type) से बड़ी संख्या (10,000 से 12,000) में पौधों का चयन सिर के आकार (Head size) के आधार पर किया जाता है।
    2. चयनित लाइनों में तेल की मात्रा का विश्लेषण किया जाता है और उच्च तेल मात्रा वाली लाइनों (1000 पौधों) को अलग (isolated) किया जाता है।
    3. बीज का एक भाग सुरक्षित (reserved) रखा जाता है और दूसरे भाग को उपज का अनुमान लगाने के लिए चेक (check) के साथ संतति पंक्तियों (progeny rows) में बोया जाता है।
    4. दूसरे मौसम (season) में भी परीक्षण किया जाता है। सबसे अच्छी लाइनों की पहचान की जाती है।
    5. उच्च उपज देने वाले उत्कृष्ट पौधों (elite plants) के अवशेष बीज (remnant seed) को अलगाव (isolation) में उगाया जाता है और अगले मौसम में आपस में संकरण (crossing interse) के लिए गुणा (multiplied) किया जाता है।
    6. गुणा की गई लाइनों का तेल की मात्रा के लिए भी परीक्षण किया जाता है और उच्च उपज व उच्च तेल मात्रा वाली लाइनों को अलगाव में उगाकर आपस में संकरण किया जाता है।
  6. समष्टि सुधार: समूह चयन, आवर्ती चयन (recurrent selection) और नर बंध्य लाइनों (male sterile lines) के उपयोग से समष्टि में सुधार किया जा सकता है और इसे प्रजनन के लिए उपयोग किया जा सकता है।
  7. संकर ओज प्रजनन: अंतःप्रजात लाइनों (inbred lines) का विकास और उन्हें संकर ओज (heterosis) का दोहन करने के लिए संकरण सबसे पहले 1920 में रूस में किया गया था। 1970 के दौरान जंगली प्रकारों और अप्रचलित किस्मों (obsolete cultivars) में कोशिकाद्रव्यी आनुवंशिक नर बंध्यता (cytoplasmic geneic male sterility - CGMS) की पहचान की गई थी। अब संकरों (hybrids) के उत्पादन के लिए इस प्रणाली का व्यापक रूप से उपयोग किया जा रहा है। चरण (Steps):
    1. अंतःप्रजातों (inbreds) का विकास।
    2. संयोजन क्षमता (combining ability) के लिए अंतःप्रजातों का मूल्यांकन।
    3. अंतःप्रजातों का CGMS लाइनों और R लाइनों में रूपांतरण (Conversion)।
    4. संकरों का उत्पादन।

किस्म नवीनीकरण (Varietial renovation): सूरजमुखी में, जारी की गई किस्मों को सुपर एलीट (प्रजनक बीज / Breeder seed) और एलीट बीज (आधार बीज / Foundation seed) का उत्पादन करने के लिए प्रतिवर्ष नवीनीकृत (renovated) किया जाता है।


कुसुम (SAFFLOWER)

वैज्ञानिक नाम: Carthamus tinctorius (2n = 24)

उत्पत्ति स्थान: अफ्रीका (Africa)

संबंधित प्रजातियां (Related species)

जंगली प्रजाति Carthamus oxycanthus पंजाब के कई हिस्सों में पाई जाती है। यह एक वामन झाड़ीदार पौधा (dwarf bushy plant) है, जो बहुत कांटेदार (spiny) होता है, और छोटे अकीन (achenes) बनाता है। इसमें तेल की मात्रा 15 से 16 प्रतिशत होती है।

कुसुम का वर्गीकरण (Classification of safflower)

कुसुम को दो व्यापक श्रेणियों (broad categories) में बांटा जा सकता है:

  1. बाहरी सहपत्र (involucral bracts) कांटेदार (spinose), भालाकार (lanceolate) होते हैं जो मुख्य रूप से तेल (oil) के लिए उगाए जाते हैं। फूलों का रंग पीला (yellow) होता है।
  2. सहपत्र मध्यम कांटेदार या कांटारहित होते हैं जो कांटेदार प्रकारों की तुलना में ज्यादातर रंग (dye) के लिए उगाए जाते हैं। फूलों का रंग नारंगी (orange) होता है।

प्रजनन के उद्देश्य

  1. उच्च तेल मात्रा के लिए प्रजनन: सामान्य तेल मात्रा 32% है जिसमें 72% लिनोलिक एसिड (linoleic acid) होता है, जो रक्त कोलेस्ट्रॉल (blood cholesterol) को कम करता है। तेल की मात्रा उपज के साथ नकारात्मक रूप से सहसंबंधित है। 28% तेल वाले C. oxycanthus की जंगली प्रजातियों का उपयोग उपज और तेल की मात्रा बढ़ाने के लिए संकरण कार्यक्रम (hybridization programme) में किया गया था, लेकिन सफलता नहीं मिली।
  2. उच्च तेल मात्रा वाली कांटारहित किस्मों (non-spiny varieties) के लिए प्रजनन: बहुत सीमित सफलता (limited success) प्राप्त हुई। Co1 कुसुम इसका एक उदाहरण है।
  3. पतले छिलके (thin shell) वाली किस्मों का प्रजनन: पतले छिलके वाली किस्मों में तेल की मात्रा अधिक होती है।
  4. शुष्क भूमि स्थितियों के लिए किस्मों का प्रजनन: शुष्क भूमि की स्थितियों में कांटेदार प्रकृति (spiny nature) अधिक स्पष्ट होगी। हालांकि कम स्पष्ट कांटों (less pronounced spines) वाली शुष्क भूमि की किस्में विकसित की गईं। उदाहरण: K.1।
  5. कीटों और रोगों के प्रति प्रतिरोधी (resistant to pest and diseases) किस्मों का प्रजनन: प्रोडनिया (Prodenia) और हेलियोथिस जैसे कीट महत्वपूर्ण हैं। जंगली प्रजाति C. oxycanthus कीटों के प्रति मध्यम प्रतिरोधी है। इसका उपयोग प्रजनन कार्यक्रम में किया जा रहा है।

रामतिल (NIGER)

वैज्ञानिक नाम: Guizotia abyssinica (2n = 30)

यह एक पर-परागित (cross pollinated) फसल है, इसमें तेल की मात्रा 35 से 45% होती है। इसका पुष्पक्रम (inflorescence) एक मुंडक (head) या कैपिटुलम (capitullum) है, जो विषमयुग्मजी (heterogamous) होता है और इसके पुष्पक (florets) सूरजमुखी के समान होते हैं।

इसके प्रजनन के उद्देश्य और विधियां (methods) सूरजमुखी (sunflower) के समान ही हैं।

🔄 संस्करण 2.0 अद्यतन (Version 2.0 Update)
अंतिम अद्यतन (Last Updated): 7 सितंबर 2026
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