जूट (JUTE)
Corchorus sp (2n=14)
Tiliaceae (टिलिएसी)
Corchorus जीनस में लगभग 40 प्रजातियां (species) शामिल हैं। भारत में केवल 8 प्रजातियां पाई जाती हैं।
दो खेती योग्य (cultivated) प्रजातियां हैं:
- C.capsularis: सफेद जूट (White jute), इसमें 50 नस्लें (races) पाई जाती हैं।
- C.olitorius: टोसा जूट (Tossa jute), इसमें 8 नस्लें पाई जाती हैं।
दोनों प्रजातियां क्रॉसेबल (crossable) नहीं हैं। दोनों में से olitorius प्रति इकाई क्षेत्र में अधिक फाइबर (fibre) उपज देता है। इसका फाइबर capsularis की तुलना में महीन (finer), नरम (softer), अधिक चमकदार (lustrous) और कम जड़ वाला (less rooty) होता है।
भारत में जूट के क्षेत्रफल का लगभग 25% हिस्सा Olitorius का है। टोसा जूट की एक कमी यह है कि यदि शुरुआती मानसून की बारिश में मार्च-अप्रैल में जल्दी बुवाई की जाती है, तो इसमें समय से पहले फूल आना (pre-mature flowering) शुरू हो जाता है। समय से पहले फूल आने के कारण अत्यधिक शाखाएं (profuse branching) निकलती हैं और फाइबर की गुणवत्ता (fibre quality) में अवक्रमण आती है।
Capsularis स्ट्रेन्स (strains) की विशेषता यह है कि इनमें एकल वानस्पतिक अवधि (single vegetative period) के अंत में एक बार ही फूल (single flush of flowering) आते हैं। परिपक्वता (maturity) के आधार पर, Capsularis की किस्मों को निम्न भागों में बांटा गया है:
- अगेती (Early) - जुलाई में फूल आना
- मध्यम (Medium) - अगस्त में
- पछेती (Late) - सितंबर में
प्रजनन के उद्देश्य (Breeding objectives)
- अधिक उपज देने वाली कम अवधि की जूट की किस्मों के लिए प्रजनन (Breeding for high yielding short duration jute varieties):
अगेती किस्में आमतौर पर कम उपज देने वाली होती हैं जबकि पछेती किस्में अधिक उपज देने वाली होती हैं। इसलिए अधिक उपज (high yield) को शीघ्रता (earliness) के साथ जोड़ना मुख्य उद्देश्यों में से एक है। उपज का सकारात्मक सहसंबंध (positively correlated) पौधे की ऊंचाई, तने के बेसल व्यास (basal diameter) और फाइबर-स्टिक अनुपात (fibre-stick ratio) से होता है। 40° पर पत्ती के कोण (leaf angle), पेटियोल (petiole) की लंबाई, और लैमिना (lamina) की लंबाई और चौड़ाई में वृद्धि के साथ उच्च प्रकाश संश्लेषक क्षमता (photo synthetic capacity) भी उपज में योगदान करती है।
- गुणवत्ता वाले फाइबर के लिए प्रजनन (Breeding for quality fibre):
जूट में गुणवत्ता का उपज के साथ नकारात्मक सहसंबंध (negatively correlated) होता है। गुणवत्ता के लक्षण (quality characters) हैं:
- a) फाइबर की लंबाई (Fibre length)
- b) फाइबर की ताकत (Fibre strength)
- c) फाइबर का रंग (Fibre colour)
- d) चमक (Lustre)
- e) रेटिंग (retting) का प्रतिशत और गुणवत्ता
- f) दोषों का अनुपात (Proportion of faults) जैसे कि जड़ें, स्पेक्ट्स (spects), गांठें (knots)।
गुणवत्ता में पर्यावरण (Environment) एक प्रमुख भूमिका निभाता है। गुणवत्ता में सुधार के लिए वैकल्पिक और उतार-चढ़ाव वाली तेज धूप (fluctuating bright sunshine), आर्द्रता (humidity) और न्यूनतम स्तर पर तापमान और वर्षा अनुकूल हैं।
इसके अलावा साफ और धीमी गति से बहने वाले पानी में रेटिंग करने से अच्छी गुणवत्ता वाला फाइबर मिलता है। आम तौर पर लंबे और मोटे पौधे, छोटे और मोटे पौधे की तुलना में घटिया (inferior) फाइबर देते हैं।
- कीट और रोग प्रतिरोधी किस्मों के लिए प्रजनन (Breeding for pest and disease resistant varieties):
कीटों में, तना छेदक (stem borer) और एफिड्स (aphids) अधिक नुकसान पहुंचाते हैं और बीमारियों में मैक्रोफोमिना (Macrophomina) प्रमुख है। हालांकि अन्य संबंधित प्रजातियों में प्रतिरोध स्रोत (resistance sources) उपलब्ध हैं, लेकिन क्रॉसबिलिटी बाधा (crossability barrier) इनके स्थानांतरण को रोकती है।
- अधिक बीज उपज के लिए किस्मों का प्रजनन (Breeding varieties for high seed yield):
चूंकि जूट को 50% फूल आने की अवस्था (flowering stage) में फाइबर के लिए काटा जाता है, इसलिए बीजों के उत्पादन के लिए कुछ पौधों को आरक्षित (reserve) करना आवश्यक है। बीज की फसल (seed crop) से प्राप्त फाइबर की गुणवत्ता खराब होगी। इसलिए, गुणवत्ता के लक्षणों को खोए बिना विशेष रूप से अधिक बीज उत्पादन के लिए किस्मों का प्रजनन करना आवश्यक है।
- ऐसी ओलिटोरियस (olitorius) किस्मों के लिए प्रजनन जिनमें गैर-बिखरने वाली आदत (non-shattering habit) के साथ-साथ समय से पहले फूल न आने की आदत (non-pre flowering habit) हो:
- JRO 524
- JRO 7885
- Sudan green x JRO 632
प्रजनन विधियाँ (Breeding Methods):
- जर्मप्लाज्म का निर्माण और उपयोग (Germplasm building and Utilisation):
केंद्रीय जूट तकनीकी अनुसंधान संस्थान (Central Jute Technological Research Institute), कलकत्ता जूट के संग्रह (collections) का रखरखाव कर रहा है। यह परिवर्तनशीलता (variability) की एक विस्तृत श्रृंखला दिखाता है, इस प्रकार चयन (selection) और संकरण (hybridisation) द्वारा सुधार की एक बड़ी गुंजाइश प्रदान करता है।
- पुरःस्थापन (Introduction):
पेश की गई कम अवधि (short duration) वाली किस्में जैप ग्रीन (Jap green), जैप रेड (Jap red), और ताइचुंग सूडान ग्रीन (Jaichung sudan green) हैं।
- संकरण और चयन (Hybridization and selection):
- a) अंतर-किस्मीय (Inter varietal): olitorius और capsularis दोनों के सुधार में बहु संकरण (Multiple crossing) और चयन का पालन किया जाता है।
- olitorius में उन्नत किस्में JRO 524, JRO 7885 हैं।
- capsularis में JRL 412, JRL 919 हैं।
चूंकि उपज और गुणवत्ता नकारात्मक रूप से सहसंबंधित हैं, इसलिए उन्नत किस्मों (improved varieties) के प्रजनन में संतुलन बनाना आवश्यक है।
- b) अंतर-विशिष्ट संकरण (Inter specific cross):
अब तक सफल नहीं हुआ है। सीधे क्रॉस मिश्रित पराग विधि (straight cross mixed pollen method), स्टिग्मैटिक पेस्ट विधि (stigmatic paste method), सेल्फ एंथर पेस्ट विधि (self anther paste method), स्टिग्मा कट विधि (stigma cut method), और पॉलीप्लॉइडी ब्रीडिंग (polyploidy breeding) द्वारा प्रयास किए गए थे। लेकिन इनमें से कोई भी सफल साबित fix नहीं हुआ। इसका कारण भ्रूण और एंडोस्पर्म (embryo endosperm) के विकास में अंतर होना है।
- उत्परिवर्तन प्रजनन (Mutation breeding):
एक्स-रे (x rays) का उपयोग करके कलकत्ता JRC 7447 और रूपाली (Rupali) दो किस्मों में उपयोगी जूट म्यूटेंट (mutants) प्राप्त किए गए थे।
मेस्टा (MESTA), केनाफ (KENAF), बिमली जूट (BIMLI JUTE)
Hibiscus cannabinus
H.sabadariffa Var. altissima
Malvaceae (मालवेसी)
थाईलैंड में सियामी जूट (Siami jute) या भारत में रोसेल (Roselle) कहा जाता है।
दोनों प्रजातियां जूट के महत्वपूर्ण पूरक (supplements) हैं और जूट के विपरीत व्यापक अनुकूलन क्षमता (wide adaptability) दिखाती हैं। वर्तमान में दोनों प्रजातियों को मेस्टा के नाम से जाना जाता है।
उत्पत्ति स्थान (Place of origin):
H.cannabinus की संभावित उत्पत्ति अफ्रीका (Africa) में हुई है और H.sabadariffa की उत्पत्ति एशिया (Asia) में हुई है।
केनाफ का उपयोग रस्सियां (ropes), सुतली (twines), और मछली पकड़ने के जाल (fishing nets) बनाने के लिए किया जाता है, और इसके अलावा केनाफ के डंठल (stalks) से पेपर पल्प (paper pulp) बनाने में, विशेष रूप से बढ़िया कागज (fine paper) और संरचनात्मक बोर्ड (structural boards) बनाने में भी उपयोग होता है।
H.cannabinus : मेस्टा
जूट की तुलना में मेस्टा महीनता (fineness), चमक और रंग (colour) के मामले में गुणवत्ता में घटिया होता है। मेस्टा की किस्में कताई (spinning) में खराब प्रदर्शन दिखाती हैं क्योंकि फाइबर मोटा (coarse), सख्त (stiff), भंगुर (brittle) और अनुप्रस्थ काट (cross section) में अनियमित होता है। मेस्टा को अकेले जूट की मशीनों में तब तक नहीं काता जा सकता जब तक कि इसे जूट के साथ कुछ अनुपात में न मिलाया जाए।
H.sabadariffa var. altissima (रोसेल - Roselle)
रोसेल जूट का एक उपयोगी विकल्प (substitute) है। इसे सियामी जूट भी कहा जाता है, और इसके दो प्रकार उपलब्ध हैं:
- फाइबर के लिए खेती की जाने वाली लंबी गैर-शाखाओं (non-branching) वाली किस्में।
- बौनी (Dwarf), झाड़ीदार (bushy) जंगली किस्में, जिनका उपयोग अचार के रूप में खाने योग्य हरे कैलेक्स (calyx) के रूप में किया जाता है।
प्रजनन के उद्देश्य:
- अधिक उपज देने वाली कम अवधि की मेस्टा किस्मों का प्रजनन (Breeding of high yielding short duration mesta varieties):
(जूट के समान - Similar to Jute)
- गुणवत्ता वाले फाइबर के लिए प्रजनन:
(जूट के समान - Similar to Jute)
- कीट और रोग प्रतिरोधी किस्मों के लिए प्रजनन:
(जूट के समान - Similar to Jute)
🔄 संस्करण 2.0 अद्यतन (Version 2.0 Update)
अंतिम अद्यतन (Last Updated): 7 सितंबर 2026
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