बीज मूल्य निर्धारण (Seed pricing) में तब मूल्य निर्धारित करना शामिल है जब कोई नया उत्पाद (new product) लॉन्च किया जाता है या एक नए वितरण चैनल (distribution channel) का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा, प्रतिस्पर्धा (competition) और सामान्य बाजार की स्थिति (general market situation) के जवाब में मूल्य बदलने के लिए निर्णय लेने की आवश्यकता हो सकती है।
सार्वजनिक क्षेत्र (public sector) में कीमतें अक्सर एक आर्थिक मूल्य निर्धारण नीति (economic pricing policy) पर आधारित होती हैं। आर्थिक मूल्य निर्धारण (Economic pricing) अर्थव्यवस्था (economy) पर बीज के मूल्य (seed price) के प्रभाव पर विचार करता है, जिसमें यह ध्यान रखा जाता है कि अधिकारी क्या सोचते हैं कि किसान (farmers) कितना भुगतान कर सकते हैं और कृषि उत्पादन (agricultural production) के विकास में बीज उद्योग (seed industry) की क्या भूमिका है। आदर्श रूप से, हालांकि, सार्वजनिक क्षेत्र को एक अधिक वाणिज्यिक मूल्य निर्धारण नीति (commercial pricing policy) का पालन करना चाहिए जो सभी लागतों (costs) का हिसाब रखती है और लाभ के एक तत्व (element of profit) की अनुमति देती है।
एक बार जब कंपनी के बीज मूल्य निर्धारण उद्देश्य (seed pricing objectives) स्थापित हो जाते हैं, तो विभिन्न मूल्य निर्धारण रणनीतियों (pricing strategies) पर विचार किया जाना चाहिए। इनमें शामिल हैं:
कम मूल्य की रणनीतियों (Low price strategies) का उपयोग तब किया जाता है जब उपभोक्ता मूल्य में छोटे नीचे की ओर परिवर्तनों (small downward changes in price) के प्रति बहुत सकारात्मक रूप से प्रतिक्रिया करते हैं, लेकिन एक कंपनी को हमेशा कम मूल्य निर्धारित करने से लाभ नहीं हो सकता है क्योंकि अधिक कुशल प्रतियोगी (efficient competitors) समान मूल्य कटौती (price cuts) के साथ प्रतिक्रिया दे सकते हैं। यदि उत्पाद विशेष रूप से मूल्य के प्रति संवेदनशील (price sensitive) नहीं है तो मूल्य में कमी (price reduction) का शुद्ध प्रभाव केवल राजस्व में कमी (reduction in revenue) हो सकता है। एक कंपनी अपने मूल्य को कम करने के लिए ललचा सकती है जहाँ समान या स्थानापन्न उत्पाद (substitute products) भी बेचे जाते हैं या जब अत्यधिक आपूर्ति (oversupply) होती है। हालाँकि, बीजों को सस्ते में बेचने से उनका अवमूल्यन (devalued) हो सकता है, विशेष रूप से तब जब उत्पाद से जुड़े वास्तविक लाभ (real benefits) हों। आयातित सब्जियों के बीजों (Imported vegetable seeds) को अक्सर किसानों द्वारा स्थानीय रूप से उत्पादित किस्मों (locally produced varieties) की तुलना में इस विश्वास में चुना जाता है कि वे बेहतर हैं क्योंकि वे अधिक महंगे हैं। इसलिए कम मूल्य की रणनीति (low price strategy) अपनाते समय किसान की संभावित प्रतिक्रिया (likely response) को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
जहाँ कुछ बड़ी कंपनियाँ आपूर्ति (supply) पर हावी होती हैं, उत्पाद समान होते हैं (जिन्हें बीज उद्योग में "मी-टू" किस्में ("me-too" varieties) कहा जाता है) और कीमत की भूमिका तटस्थ (neutral) होती है, अर्थात् बाजार मूल्य (market price) स्थापित हो जाता है।
इस रणनीति का उपयोग दीर्घकालिक या अल्पकालिक नीति (long- or short-term policy) के रूप में किया जा सकता है। दीर्घकालिक नीति (long-term policy) के मामले में कंपनी उच्च गुणवत्ता (high quality), मूल्य वर्धित उत्पाद (value-added product) जैसे कि सटीक बुवाई (precision drilling) के लिए श्रेणीबद्ध और उपचारित बीज (graded and treated seed) के लिए एक बाजार खंड (market segment) की पहचान करेगी। एक उच्च मूल्य (high price) उत्पाद की अनन्य छवि (exclusive image) या वर्धित मूल्य (added value) को दर्शाएगा। एक अल्पकालिक, उच्च-मूल्य नीति (short-term, high-price policy) बाजार में पेश किए गए एक नए उत्पाद (new product) का लाभ उठाती है, जैसा कि एक नई उच्च उपज देने वाली किस्म (high-yielding variety) के मामले में हो सकता है जहाँ आपूर्ति सीमित (supply is limited) हो।
मूल्य निर्धारण (pricing) पर महत्वपूर्ण प्रभाव लागत (cost), मांग (demand), उत्पाद के मुख्य प्रतिस्पर्धियों की कीमतों (prices of the product's main competitors) और अल्पकालिक बिक्री लक्ष्यों (short-term sales targets) के होते हैं।
इस पद्धति (method) में किसी उत्पाद की इकाई लागत (unit cost) की गणना करना और एक आधार मूल्य (base price) देने के लिए उपयुक्त लाभ मार्जिन (appropriate profit margin) जोड़ना शामिल है जिसे बाद में प्रचलित बाजार स्थितियों (prevailing market conditions) के संबंध में बदला जा सकता है। हालांकि यह एक सरल दृष्टिकोण (simple approach) लगता है, तथ्य यह है कि ऐसा मूल्य निर्धारण उत्पादन उन्मुख (production oriented) है और इसलिए यह बाजार में क्या हो रहा है इसे प्रतिबिंबित नहीं कर सकता है, इसे जोखिम भरा (risky) बनाता है। लागत-प्लस मूल्य निर्धारण (cost-plus pricing) का कठोर अनुप्रयोग (rigid application) मांग कम होने पर मूल्य वृद्धि (price increases) और मांग मजबूत होने पर कटौती (reductions) को जन्म दे सकता है। यह सामान्य रूप से जो किया जाना चाहिए उसके विपरीत है।
यह लागत-प्लस मूल्य निर्धारण (cost-plus pricing) का एक रूप है जिसमें उत्पाद पोर्टफोलियो (product portfolio) बनाने वाले विभिन्न उत्पादों को अलग करना और उन्हें उनके उत्पादन (production) से जुड़ी प्रत्यक्ष लागतों (direct costs) को आवंटित करना (allocating) शामिल है। मूल्य उस स्तर पर निर्धारित किया जाता है जो इन लागतों से अधिक राजस्व (revenues in excess of these costs) उत्पन्न करेगा, जिससे व्यावसायिक ओवरहेड्स (business overheads) को पूरा करने में योगदान मिलेगा। व्यक्तिगत उत्पादों का उनकी प्रत्यक्ष लागतों (direct costs) को कवर करने और ओवरहेड्स में योगदान करने की उनकी क्षमता के संदर्भ में विश्लेषण (analysed) किया जा सकता है।
जहाँ बाजार में प्रतिस्पर्धा (market competition) है, लागत (costs) हमेशा मूल्य निर्धारण में निर्णायक कारक (determining factor) नहीं हो सकती है। यहाँ प्रतिस्पर्धा की प्रकृति और सीमा (nature and extent of competition) का कीमत पर बड़ा प्रभाव पड़ेगा। यदि किसी उत्पाद को समान उत्पादों (similar products) से प्रत्यक्ष प्रतिस्पर्धा (direct competition) का सामना करना पड़ता है, तो कीमत को नियंत्रित (restrained) किया जाएगा। इसके विपरीत, जब किसी उत्पाद को बाजार के विभिन्न क्षेत्रों के उत्पादों से अप्रत्यक्ष प्रतिस्पर्धा (indirect competition) का सामना करना पड़ता है, तो कीमत में भिन्नता (vary the price) लाने की अधिक गुंजाइश होगी। यह विभिन्न रणनीतियों (different strategies) का उपयोग करने की संभावना प्रदान करता है।
अल्पकालिक विपणन और बिक्री लक्ष्यों (short-term marketing and sales targets) को आगे बढ़ाने के लिए मूल्य निर्धारण एक उपयोगी उपकरण (useful tool) हो सकता है। जब एक नई किस्म (new variety) लॉन्च की जाती है, तो उच्च कीमतें (higher prices) निर्धारित की जा सकती हैं, जो उन किसानों से उच्च रिटर्न (higher returns) अर्जित करने का अवसर प्रदान करती हैं जो बीज के अधिक व्यापक रूप से उपलब्ध होने से पहले उच्च कीमतों का भुगतान करने को तैयार हैं। कम कीमतों को प्रचारात्मक गतिविधियों (promotional activities) से जोड़ा जा सकता है, जैसे कि स्थापित किस्मों (established varieties) की बिक्री को बढ़ावा देना, नई किस्मों में रुचि पैदा करना, उच्च स्टॉक (high stocks) को कम करना और किसानों को जल्दी खरीदने के लिए प्रोत्साहित करना।
तीन व्यापक प्रभाव (broad influences) बीज उद्योग (seed industry) के विकास और स्थिति को निर्धारित करते हैं, अर्थात्:
इन सभी कारकों को संशोधित (modified) किया जा सकता है और उनके बीच कई अंतःक्रियाएं (interactions) होती हैं जो अंततः बीज उद्योग (seed industry) के आकार, व्यवहार्यता (viability) और अन्य विशेषताओं (other characteristics) को निर्धारित करती हैं। चित्र 1 (Figure 1) इस विश्लेषण (analysis) का एक आरेखीय प्रतिनिधित्व (diagrammatic representation) प्रदान करता है, जिसमें बीज क्षेत्र (seed sector) पर विभिन्न प्रभावों को इन तीन प्राथमिक तत्वों (primary elements) द्वारा बनाए गए त्रिकोण (triangle) के भीतर दर्शाया गया है। नीति (Policy) को सबसे ऊपर रखा गया है क्योंकि इसका प्रौद्योगिकी (technology) और अर्थशास्त्र (economics) पर बड़ा प्रभाव (major impact) हो सकता है। केंद्र में उत्पादन का वातावरण (production environment) है, जो कृषि (agriculture) का आधार बनता है, और जिसे सिंचाई (irrigation) या संरक्षित खेती (protected cultivation) के अलावा काफी हद तक संशोधित नहीं किया जा सकता है।
हमें बीज नीति (seed policy) को परिवर्तन के एक प्रमुख उपकरण (major tool for change) के रूप में पहचानना चाहिए, लेकिन यह भी स्वीकार करना चाहिए कि यह कुछ भौतिक और पर्यावरणीय कारकों (physical and environmental factors) को नहीं बदल सकती है और, एक मुक्त बाजार (free market) में, यह हमेशा प्रौद्योगिकी (technology) और अर्थशास्त्र (economics) के साथ परस्पर क्रिया (interact) करेगी। बीजों के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन की गई नीति के अलावा, व्यापक सामाजिक और पर्यावरणीय नीतियों (wider social and environmental policies) का भी बीज क्षेत्र (seed sector) पर प्रभाव पड़ सकता है और ये जन जागरूकता (public awareness) से प्रेरित हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों (genetically-modified crops) के उपयोग के बारे में यूरोप में वर्तमान बहस (current debate in Europe) मुख्य रूप से बीजों के बारे में तकनीकी मुद्दों (technical issues) पर नहीं बल्कि व्यापक पर्यावरणीय और खाद्य सुरक्षा चिंताओं (wider environmental and food safety concerns) पर आयोजित की जाती है। फिर भी इसका बीज उद्योग (seed industry) पर बड़ा प्रभाव (major effect) पड़ा है।