वुड एप्पल (WOOD APPLE)

Feronia limonia L.
परिवार (Family): Rutaceae

वुड एप्पल (Wood apple), जो भारत (India) और श्रीलंका (Sri Lanka) का मूल निवासी (native) है, शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों (arid and semi arid regions) के कठोर पेड़ों (hardy trees) में से एक है। फल एक कठोर खोल वाला (hard- shelled) कई बीजों वाला बेरी (many seeded berry) है जिसके गुलाबी भूरे रंग के सुगंधित खट्टे-मीठे गूदे (pinkish brown aromatic sour-sweet pulp) को खाने योग्य भाग (edible portion) के रूप में इस्तेमाल किया जाता है और बीज इसमें धंसे होते हैं। गूदे (pulp) में 18.1% कार्बोहाइड्रेट (carbohydrate), 7.1% प्रोटीन (protein), 3.7% वसा (fat), 5.0% फाइबर (fibre) और 1.9% खनिज पदार्थ (mineral matter) होते हैं। गूदा कैल्शियम (calcium) (130 mg/100g), फास्फोरस (phosphorus) (110mg/100g) और आयरन (iron) (0.48 mg/100g) का एक समृद्ध स्रोत है। एक सौ ग्राम गूदे (one hundred gram of pulp) द्वारा आपूर्ति किए जाने वाले विटामिन (vitamins) हैं - कैरोटीन (carotene) 61 μg, राइबोफ्लेविन (riboflavin) 0.17 mg, नियासिन (niacin) 0.8 mg, थायमिन (thiamine) 0.04 mg और विटामिन सी (vitamin C) 3 mg। पके फल का गूदा (ripe fruit pulp) बेहतरीन चटनी (excellent chutney) बनाता है और इसे चीनी (sugar) के साथ ताजा भी खाया जाता है। इसका उपयोग अमरूद के गूदे (pulp of guava) के साथ जेली तैयार करने (jelly preparation) में एक सहायक (adjunct) के रूप में किया जाता है।

जलवायु और मिट्टी की आवश्यकताएं (Climatic and soil requirements)

वुड एप्पल (Wood apple) को उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों (tropical and sub-tropical regions) के शुष्क इलाकों (dry tracts) में समुद्र तल (sea level) से लेकर 1400 मीटर एमएसएल (MSL) तक की ऊंचाई पर उगाया जा सकता है। यह क्षरित मिट्टी (degraded soil) सहित मिट्टी की एक विस्तृत श्रृंखला (wide range of soil conditions) के लिए अनुकूलित (adapted) है। यह कुछ हद तक लवणता (salinity) को भी सहन कर सकता है। बंजर भूमि (wasteland) में उगाने के लिए यह एक आदर्श पेड़ (ideal tree) है।

किस्में और प्रसार (Cultivars and propagation)

कोई नामित किस्में (named cultivars) उपलब्ध नहीं हैं। हालांकि खट्टे और मीठे प्रकार (sour and sweet types), बड़े फल आकार (big fruit size) वाले उच्च उपज देने वाले (high yielders) प्रकृति में परिवर्तनशील अंकुर संततियों (variable seedling progenies) में मौजूद हैं। वानस्पतिक साधनों (vegetative means) के माध्यम से प्रसार (propagation) के लिए बड़े आकार और मीठे स्वाद वाले फलों वाले उच्च उपज देने वालों (High yielders) का चयन किया जाना चाहिए। वर्तमान में हालांकि मुख्य रूप से बीज प्रसार (seed propagation) किया जाता है, अगर देर से गर्मियों (late summer) और शुरुआती मानसून (early monsoon) के दौरान किया जाए तो बडिंग (budding) के सफल होने की सूचना मिली है। बडिंग किए गए पौधे (Budded plants) बौने (dwarf) और फलने में अगेती (precocious in bearing) होते हैं। शुष्क क्षेत्रों (dry regions) में जहां सिंचाई क्षमता (irrigation potential) सीमित है, पौधों (seedlings) को खेत में लगाया जा सकता है और स्थापित पौधे (established seedling) पर इन सीटू बडिंग (in situ budding) की जानी चाहिए।

खेत की तैयारी और रोपण (Field preparation and planting)

आमतौर पर वुड एप्पल को उपजाऊ या समृद्ध मिट्टी (fertile or rich soils) में नहीं लगाया जाता है। बंजर भूमि (wasteland) में, यदि बड़े पैमाने पर रोपण (mass planting) किया जाना है, तो ढलान के आर-पार गड्ढों की रेखाएं (pit lines across the slope) खींची जाती हैं और 8M x 8M की दूरी (spacing) पर 1M x 1M x 1M आकार के गड्ढे (pits) खोदे जा सकते हैं। 20 किलोग्राम एफवाईएम (FYM), रेत (sand) और ऊपरी मिट्टी (top soil) से गड्ढे को भरने के बाद मानसून की शुरुआत (onset of monsoon) पर रोपण (Planting) किया जाना चाहिए। रोपण के तुरंत बाद बेसिन (basins) इस तरह से बनाए जाने चाहिए कि जल संचयन (water harvesting) की सुविधा हो।

अंतर-कृषि (Interculture)

सधाई (Training) सेंट्रल लीडर विधि (Central leader method) द्वारा सभी दिशाओं में अच्छी दूरी वाली शाखाओं (well spaced branches) को अनुमति देकर की जाती है। पहले 5 वर्षों के लिए बारिश के मौसम (rainy seasons) के दौरान अंतर-फसलें (Intercrops) ली जा सकती हैं। मानसून के बाद के मौसम (post monsoon season) में, बेसिनों (basins) को सूखी पत्तियों से मल्च (mulched) किया जा सकता है। प्रत्येक पेड़ के लिए मानसूनी बारिश की शुरुआत में हर साल 25 किलोग्राम एफवाईएम (FYM) डाला जाना चाहिए। इससे फलों के आकार (fruit- size) और गुणवत्ता (quality) को बढ़ाने में मदद मिलेगी। फसल के विकास के शुरुआती चरणों (early stages of crop growth) के दौरान, यदि गर्मियों के दौरान मटके से सिंचाई (pot watering) की जाती है तो यह फायदेमंद होगा। खट्टे परिवार (citrus family) का सदस्य होने के नाते, इस पर साइट्रस के पत्ती खाने वाले कैटरपिलर (leaf-eating caterpillar of citrus) द्वारा हमला किया जाता है जो पौधे को पूरी तरह से पत्तीविहीन (defoliate) कर देता है। लार्वा (larvae) को हाथ से चुनने और नष्ट करने के बाद किसी भी संपर्क कीटनाशक (contact insecticide) का छिड़काव किया जाना चाहिए।

कटाई और उपज (Harvest and yield)

बडिंग किए गए पौधे (Budded plants) रोपण के 3-4 साल बाद फलना (bearing) शुरू कर देते हैं। लेकिन इष्टतम उत्पादकता (optimum productivity) तक पहुंचने में लगभग 10 साल लगेंगे। किसी इलाके की जलवायु परिस्थितियों (climatic conditions) के आधार पर फसल में फरवरी से मई तक फूल (flowers) आते हैं और फूल आने के महीने के आधार पर फल जुलाई से दिसंबर तक उपलब्ध होंगे। एक अच्छी तरह से विकसित पेड़ 200-250 फल/वर्ष (fruits/year) देगा।

बेल (BAEL)

Aegle marmelos Corr.
परिवार (Family): Rutaceae

बेल (Beal), जो भारत में खेती किए जाने वाले सबसे पुराने फलों (oldest fruits cultivated in India) में से एक है, का एक पौराणिक महत्व (mythological significance) है, अर्थात् एक पवित्र पेड़ (sacred tree) जिसकी पत्तियों का उपयोग भगवान शिव (Lord Shiva) की पूजा के लिए किया जाता है। फल का गूदा (fruit pulp) कार्बोहाइड्रेट (carbohydrate) है। एक सौ ग्राम गूदे में 55 μg कैरोटीन (carotene), 0.13 mg थायमिन (thiamine), 1.19 mg राइबोफ्लेविन (riboflavin), 1.1 mg नियासिन (niacin) और 8 mg विटामिन सी (vitamin C) होता है। इसके गूदे से शरबत (sherbet) और सिरप (syrup) बनाया जा सकता है। इसके फलों से तैयार मर्मलेड (marmalade) का उपयोग दस्त (diarrhea) और पेचिश (dysentery) को ठीक करने में किया जाता है। तने (stem) से गोंद (gum) प्राप्त होता है। लकड़ी (wood) का उपयोग कृषि उपकरण (agricultural implements) बनाने के लिए किया जाता है। पत्तियों (leaves) का उपयोग चारे (fodder) के रूप में किया जाता है। पौधे के सभी भाग 'मारमेलोसीन' ('marmelosin') नामक पदार्थ के कारण औषधीय रूप से महत्वपूर्ण (medicinally important) हैं।

जलवायु और मिट्टी की आवश्यकताएं (Climatic and soil requirements)

गर्म शुष्क ग्रीष्मकाल (hot dry summer) और हल्की सर्दियों (mild winter) वाली उपोष्णकटिबंधीय स्थिति (subtropical condition) बेल की खेती के लिए आदर्श होगी। इसे 1200 मीटर एमएसएल (MSL) की ऊंचाई (altitude) तक भी उगाया जा सकता है और इसे -7°C जितने कम तापमान (temperature) से नुकसान नहीं पहुंचता है। चूंकि यह एक कठोर पेड़ (hardy tree) है, इसलिए यह pH 5 से लेकर pH 10 तक की मिट्टी (soil) की एक विस्तृत श्रृंखला में अच्छी तरह पनपता है जहां कई अन्य फलों के पेड़ विफल हो जाते हैं। यह बहुत क्षारीय मिट्टी (alkaline soil) के साथ-साथ पथरीली मिट्टी (stony soils) को भी सहन कर सकता है। हालांकि, अच्छी जल निकासी वाली रेतीली दोमट (well drained sandy loam) सबसे अच्छी है।

किस्में और प्रसार (Cultivars and propagation)

फलों के आकार और रूप (size and shape of fruits), फलने की आदत (bearing habit), गूदे की गुणवत्ता (pulp quality), रंग (colour), बनावट (texture), चीनी प्रतिशत (sugar percentage) आदि के लिए बीजों से उगाई गई संततियों (progenies raised from seeds) में बहुत भिन्नता (variation) देखी जाती है। 'मिर्जापुरी' ('Mirzapuri'), 'काघली' ('Kaghli'), 'गोंडा' ('Gonda') जैसी किस्में और फैजाबाद (Faizabad) से कुछ चयन जैसे केबी 11 (KB 11), केबी 1 (KB 1), धार रोड (Dhar Road) और अयोध्या (Ayodhya) बेहतर पाई गई हैं। रूट स्टॉक (Root stocks) बीजों से उगाए जाते हैं। 6 महीने पुराने पौधों (seedlings) पर जून-जुलाई के दौरान पैच बडिंग (patch budding) की जाती है।

रोपण और अंतर-कृषि (Planting and interculture)

10M x 10M की दूरी (spacing) पर 50 cm x 50 cm x 50 cm आकार के गड्ढे (Pits) खोदे जाते हैं। ऊपरी मिट्टी (top soil) को 10-15 किलोग्राम एफवाईएम (FYM) के साथ मिलाया जाना चाहिए और गड्ढों को भर देना चाहिए। रोपण (Planting) जून-जुलाई के दौरान या मानसून की शुरुआत (beginning of monsoon) में किया जा सकता है। हर साल मानसून की शुरुआत में 20-30 किलोग्राम एफवाईएम (FYM) का नियमित अनुप्रयोग किया जाना चाहिए। मानसून की विफलता (monsoon failure) होने पर युवा पौधों की सिंचाई (irrigated) की जाती है। शुरुआती वर्षों के दौरान किसी भी फलीदार या चारा फसल (legume or forage crop) को अंतर-फसल (inter crop) के रूप में लिया जा सकता है। युवा पौधों को खूंटे (stake) की मदद से प्रशिक्षित (trained) किया जाता है। कोई वार्षिक छंटाई (annual pruning) नहीं की जाती है। हालांकि, आड़ी-तिरछी, कमजोर और टूटी हुई शाखाओं (criss-cross, weak and broken branches) को समय-समय पर हटा दिया जाना चाहिए।

कटाई और उपज (Harvest and yield)

बीज से उगे पौधों (Seedlings) को फलने (bearing) में 7-8 साल लगते हैं, जबकि बडिंग किए गए पौधे (budded plants) 4-5 साल की उम्र में फलना शुरू कर देते हैं। फूल (Flowering) मई-जून में देखे जाते हैं और फल 8-10 महीनों में यानी अप्रैल-मई में तैयार हो जाते हैं। परिपक्व फलों (matured fruits) को फलों के डंठल (fruit stalk) के साथ व्यक्तिगत रूप से काटा (harvested) जाना चाहिए और उन्हें जमीन पर गिरने नहीं दिया जाना चाहिए। लगभग 12-15 साल का एक अच्छी तरह से विकसित पेड़ 300-500 फल/वर्ष (fruits/year) देता है।

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